Top
Begin typing your search above and press return to search.

ललित सुरजन की कलम से तालाब सुखाने और पेड़ काटने का सुख

रायपुर से बिलासपुर के एक सौ पन्द्रह किलोमीटर लम्बे रास्ते पर कुछ बातें नोट करने लायक लगीं।

ललित सुरजन की कलम से तालाब सुखाने और पेड़ काटने का सुख
X

'कुछ दिन पहले दो दिन के लिए बिलासपुर जाना हुआ। रायपुर से बिलासपुर के एक सौ पन्द्रह किलोमीटर लम्बे रास्ते पर कुछ बातें नोट करने लायक लगीं। सड़क किनारे के अनेक गांवों के तालाब पानी से लबालब थे। आज से पन्द्रह-बीस बरस पहले भी जब छत्तीसगढ़ के गांवों में जाना होता था तो दो तरह के तालाब दिखाई देते थे। एक तो वे जिन्हें हमारे पुरखों ने सौ-दो सौ-चार सौ साल पहले बनाया होगा। इन तालाबों के चारों ओर आम, पीपल, डूमर इत्यादि छायादार वृक्ष निश्चित रूप से होते थे। किसी-किसी तालाब की पार पर गांव के इष्ट देवता की मढ़िया भी दिख जाती थी और इन तालाबों में जेठ-बैसाख की गर्मी में भी पानी बराबर भरा होता था जिससे गांव की जीवनचर्या चलती थी। दूसरे किस्म के तालाब वे जिन्हें सरकारी तालाब कहा जा सकता है। ये तालाब गर्मी आते-आते तक सूख जाते थे और एक तरह से गांव के परिदृश्य में उदासी भरते थे। अभी जिन तालाबों को लबालब देखा वे अधिकतर सरकारी तालाब ही थे। तालाब के पास बोर खोदकर उसका पानी इनमें भरा जाता है। इस अनुमान की पुष्टि एक-दो जानकारों ने की है। ठीक है कि अभी काम चल रहा है, लेकिन क्या इससे भूजल के स्तर में गिरावट नहीं आ रही होगी?Ó

(देशबन्धु में 17 मई 2018 को प्रकाशित)

https://lalitsurjan.blogspot.com/2018/05/blog-post_17.html


Next Story

Related Stories

All Rights Reserved. Copyright @2019
Share it