भीषण गर्मी में 'एमएसपी' की अहमियत
फसलों के मूल्यों में वृद्धि एक सकारात्मक और स्वागतयोग्य कदम है, लेकिन यह वर्तमान कृषि पारिस्थितिकी संकट का आंशिक समाधान मात्र है।

नीलेश देसाई
फसलों के मूल्यों में वृद्धि एक सकारात्मक और स्वागतयोग्य कदम है, लेकिन यह वर्तमान कृषि पारिस्थितिकी संकट का आंशिक समाधान मात्र है। 48°C की तपिश में झुलसती भारतीय खेती को केवल ऊंचे आंकड़ों के सहारे नहीं छोड़ा जा सकता। किसान और देश की वास्तविक सुरक्षा तब सुनिश्चित होगी, जब मूल्य सुरक्षा को पानी की उपलब्धता और गारंटीड खरीद के मजबूत धरातल पर टिकाया जाएगा।
केंद्र सरकार ने खरीफ 2026-27 के लिए 'न्यूनतम समर्थन मूल्य' (एमएसपी) का ऐलान कर दिया है। बाजरे का 'एमएसपी' रुपए 125 बढ़कर रुपए 2,900 प्रति क्विंटल, धान का रुपए 2,441, मक्का का रुपए 2,560 और अरहर का रुपए 8,000 प्रति क्विंटल तय हुआ है। सरकार का आकलन है कि इससे लागत पर 50प्रतिशत से 75 प्रतिशत तक का लाभ मिलेगा- विशेषकर बाजरे में लगभग 56 प्रतिशत और रागी में 75 प्रतिशत तक का रिटर्न बताया गया है।
यह घोषणा स्वागतयोग्य है, लेकिन व्यावहारिक दृष्टि से एक बड़े विरोधाभास को रेखांकित करती है। जिस दिन यह ऐलान हुआ, उसी दिन उत्तरप्रदेश के बांदा में तापमान 48.2 डि.से. तक पहुंच गया था, जिसने इसे देश के अत्यंत गर्म स्थानों में शामिल कर दिया। इसी दौरान विश्व के सबसे गर्म शहरों की सूची में भारत के कई शहरों का नाम आया। यह जमीनी हकीकत एक बुनियादी सवाल खड़ा करती है: जब 'चरम मौसम' के कारण खेत ही भट्टी बन जाएं, तो केवल कागजी मूल्य किसान को कितनी सुरक्षा दे पाएगा?
दाम का सच -वर्तमान में सरकार ÒAw+FL' फॉर्मूले पर 'एमएसपी' तय करती है - यानी केवल नकद खर्च और पारिवारिक मजदूरी। इस आधार पर बाजरे की लागत रुपए 1,860 मानकर रुपए 2,900 का मूल्य तय किया गया है, परंतु व्यावहारिक कृषि और 'एमएस स्वामीनाथन आयोग' की सिफारिशों के अनुसार, मूल्य निर्धारण Cw+50% फॉर्मूला (जमीन का काल्पनिक किराया + लगाई गई पूंजी पर ब्याज) के आधार पर होना चाहिए। यदि Cw+50% सूत्र को लागू किया जाए, तो धान का 'एमएसपी' रुपए 2,441 की जगह लगभग रुपए 3,200 के करीब होना चाहिए था। पिछले एक दशक में डीजल (लगभग 78प्रतिशत वृद्धि) और डीएपी (लगभग 90 प्रतिशत वृद्धि) जैसी लागतों में आया उछाल देखते हुए, वर्तमान मूल्य वृद्धि किसानों की वास्तविक आर्थिक सुरक्षा के लिए अपर्याप्त महसूस होती है।
भट्टी बनते खेत- पिछले 51 साल के ऐतिहासिक डेटा और 563 जिलों की हालिया 'क्रॉप रिस्क असेसमेंट- क्लाइमेट स्टडी' ने हमारी पारंपरिक प्राथमिकताओं को झकझोर दिया है। इस अध्ययन के अनुसार, तापमान में महज 1°C की वृद्धि होने पर बाजरे की पैदावार में लगभग 19.1 प्रतिशत की गिरावट हो सकती है; कुछ शुष्क जिलों में यह नुकसान 38.5 प्रतिशत तक पहुंच जाता है। गेहूं (-5.4प्रतिशत) और चावल (-7.1प्रतिशत) की तुलना में बाजरा- जिसे हम पारंपरिक रूप से सूखा प्रतिरोधी मानते थे- चरम गर्मी में सबसे अधिक संवेदनशील साबित होता है।
इसे बुंदेलखंड या मध्यप्रदेश के झाबुआ अलीराजपुर जैसे अर्ध शुष्क अंचलों के उदाहरण से समझें, जहां तापमान आज 40°C से 48°C के बीच बना हुआ है। बाजरे के लिए आदर्श तापमान लगभग 35°C माना जाता है। तापमान में इस भारी वृद्धि के कारण, यदि फसल खेत में ही झुलसकर नष्ट हो जाती है, तो 'एमएसपी' बेअसर हो जाएगा। किसान की जेब में आय तब पहुंचेगी, जब फसल बाजार तक पहुंचने के लिए बचेगी।
घटती मांग-'नीति आयोग' और विभिन्न राष्ट्रीय सर्वेक्षणों के आंकड़े बताते हैं कि देश के कुल लगभग 6 प्रतिशत किसानों को ही 'एमएसपी' का वास्तविक लाभ मिल पाता है। उदाहरण के लिए, बाजरे का 'एमएसपी' भले ही रुपए 2,900 प्रति क्विंटल घोषित हो, लेकिन स्थानीय मंडियों में वास्तविक व्यापार रुपए 2,100 से रुपए 2,400 के बीच सिमट जाता है। छत्तीसगढ़ के महासमुंद जैसे क्षेत्रों में, जो भीषण गर्मी की चपेट में हैं, न तो पर्याप्त सरकारी खरीद केंद्र उपलब्ध हैं और न ही वैज्ञानिक भंडारण की व्यवस्था। दलहन और तिलहन की स्थिति भी इससे अलग नहीं है, जहां सरकारी खरीद का स्तर अक्सर बेहद कम हो जाता है।
इन पर्यावरणीय चुनौतियों के सामने स्पष्ट है कि भारतीय कृषि को अब केवल मूल्य घोषणा (एमएसपी) के सीमित दायरे से बाहर निकलना होगा। देश की खाद्य और आर्थिक सुरक्षा के लिए हमें एक त्रिआयामी कृषि नीति का मुख्य आधार बनाना होगा।
प्रथम कवच- दाम में सुधार ('Cw+50%' का वैधानिक ढांचा)कागजी मुनाफे के स्थान पर वास्तविक वित्तीय सुरक्षा देने के लिए 'Cw+50%' फॉर्मूले को मूल्य निर्धारण का वैधानिक आधार बनाया जाए। इसके साथ ही, लागतों (डीजल, खाद, बीज) की वास्तविक महंगाई के अनुपात में प्रतिवर्ष 'एमएसपी' को गतिशील रूप से अपडेट करने की व्यवस्था होनी चाहिए। इससे 'एमएसपी' के वार्षिक आंकड़े केवल राजनीतिक घोषणा न होकर वास्तविक लागत सुरक्षा का उपकरण बन सकते हैं।
द्वितीय कवच- पानी और जलवायु सुरक्षा 'क्रॉप रिस्क असेसमेंट- क्लाइमेट स्टडी' में चिन्हित देश के सबसे अधिक जलवायु संवेदनशील जिलों के किसानों को फसल के जोखिम की भरपाई के लिए घोषित 'एमएसपी' के ऊपर रुपए 200 प्रति क्विंटल का प्रत्यक्ष 'क्लाइमेट बोनस' दिया जाए। शुष्क और अर्ध शुष्क क्षेत्रों में टपक (ड्रिप) और स्प्रिंकलर सिंचाई प्रणालियों पर 90त्न तक की सब्सिडी दी जाए। इसके अलावा, पंचायत स्तर पर जल-पुनर्भरण के लिये खेत तालाबों, चैक-डैमों और सघन वृक्षारोपण को अनिवार्य नीति का हिस्सा बनाया जाए, क्योंकि सिंचाई का तंत्र ही फसलों को चरम तापमान से बचा सकता है।
तृतीय कवच- गारंटीड खरीद और मांग सृजन
मोटे अनाजों (श्रीअन्न) और दलहन तिलहन के लिए हर जिले में विकेंद्रीकृत सरकारी खरीद केंद्र स्थापित कर शत-प्रतिशत खरीद की गारंटी दी जाए। इस उत्पादन को खपाने और बाजार में स्थायी मांग पैदा करने के लिए 'सार्वजनिक वितरण प्रणाली,' आंगनबाड़ियों और 'मध्यान्ह भोजन योजना' में मोटे अनाजों को अनिवार्य रूप से शामिल किया जाए। निजी व्यापारियों की गुटबाजी को रोकने के लिए बाजार में एक 'फ्लोर प्राइस' का नियामक ढांचा हो, जो मध्यप्रदेश की 'भावांतर भुगतान योजना' के दोषों से सीखते हुए किसान के हितों की रक्षा करे।
फसलों के मूल्यों में वृद्धि एक सकारात्मक और स्वागतयोग्य कदम है, लेकिन यह वर्तमान कृषि पारिस्थितिकी संकट का आंशिक समाधान मात्र है। 48°C की तपिश में झुलसती भारतीय खेती को केवल ऊंचे आंकड़ों के सहारे नहीं छोड़ा जा सकता। किसान और देश की वास्तविक सुरक्षा तब सुनिश्चित होगी, जब मूल्य सुरक्षा को पानी की उपलब्धता और गारंटीड खरीद के मजबूत धरातल पर टिकाया जाएगा। सरकार को अब अखबारों की हेडलाइन से आगे बढ़कर 'खेत की लाइफलाइन' को मजबूत करने वाले इस त्रिआयामी रोडमैप को अपनाना होगा, तभी हम एक आत्मनिर्भर, टिकाऊ और समृद्ध कृषि भविष्य की नींव रख पाएंगे।
(लेखक झाबुआ जिले के 'संपर्क' संस्था के संस्थापक निदेशक हैं। )


