सरकार हिन्दू-मुसलमान से बनती है बच्चों की पढ़ाई लिखाई से क्या मतलब!
शिक्षा की नींव ही गलत रखी। गांव-गांव स्कूल खुलवाने से लेकर उच्च शिक्षा तक एक मजबूत ढांचा बनवा कर बेवजह समस्याएं बढ़वाईं।

शिक्षा की नींव ही गलत रखी। गांव-गांव स्कूल खुलवाने से लेकर उच्च शिक्षा तक एक मजबूत ढांचा बनवा कर बेवजह समस्याएं बढ़वाईं। ढांचा इतना मजबूत है कि उसे तोड़ने में ही सारी ताकत लग रही है। यह पढ़ाई-लिखाई हटे तो हमें मूर्खता फैलाने के और रास्ते मिलें। ज्ञान विज्ञान झूठ और अफवाहें फैलाने में मुख्य बाधा है।
रकार जब पढ़ा नहीं सकती तो परीक्षाएं क्यों ले? और परीक्षाओं का काम क्या है? पास होकर सिलेक्ट होकर क्वालिफाई कहलवाकर सीट मांगेंगे, नौकरी मांगेंगे!
नेहरू के रास्ते पर नहीं जाना। इसलिए स्टूडेंट चाहे जितना चिल्लाएं, परेशान हों, उनके अभिभावक परेशान हों मोदी सरकार को कोई मतलब नहीं है। क्या करें?
केन्द्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान ने कह दिया। क्या करें? जब पेपर बनाने वाले ही उसे लीक कर रहे हैं। कितना अच्छा जवाब है। इससे पहले तो पेपर ऊपर से बन कर आते थे? कोई व्यक्ति नहीं बनाता था। इसलिए लीक नहीं होते थे। अब यह सरकार अपने आदमियों को लेकर आई है। उनसे बनवाती है और वहीं बेच देते हैं। तो इसमें कितनी ईमानदारी से धर्मेंन्द्र प्रधान ने कह दिया क्या करें!
धर्मेन्द्र प्रधान से इस्तीफा मांग रहे लोगों को समझना चाहिए कि वे एक छोटे मोहरे भर हैं। वैसे ही जैसे मुख्य चुनाव आयुक्त हैं। क्या एक बार में उनका नाम याद आ जाता है? नहीं उनके पिछले वाले का याद आ जाता है। दोनों नाम गड्डमड्ड हो जाते हैं। क्यों? क्योंकि उन नामों का कोई महत्व ही नहीं है।
जैसे गणित के सवालों में ए बी सी कहा जाता है। या और भी विषयों में उदाहरण देने के लिए वैसे ही यहां व्यक्ति नहीं ए बी सी हैं। धर्मेन्द्र प्रधान को खुश होना चाहिए कि आज उनका नाम बच्चा-बच्चा जान गया। नहीं तो केन्द्र सरकार में नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के अलावा और कोई नाम किसी को पता नहीं है। सरकार को बच्चों को फेल ही करना है तो यह प्रयोग करके देखे कि उनसे पूछे कि किस मंत्रालय के कौन मंत्री है? सब फेल हो जाएंगे।
हां, जो सवाल पूछने वाले हैं उनके सामने भी लिखकर रखना होगा कि किस मिनिस्ट्री में कौन है? नाम उन्हें भी याद नहीं होंगे। तो बदनाम होंगे तो क्या नाम न होगा! धर्मेन्द्र प्रधान को लोग लंबे समय तक याद रखेंगे। स्टूडेंट का जैसा इम्तहान उन्होंने लिया है। मानसिक प्रताड़ना देकर वैसा इतिहास में कभी नहीं हुआ।
हां, गोदी मीडिया चाहे तो वह बता सकती है कि नेहरू के राज में भी यह हुआ था और सारी व्यवस्था उन्हीं की बिगाड़ी हुई है। ये आईआईटी एम्स और दूसरे वैज्ञानिक और शिक्षण संस्थान सब गलत बनाए। नेहरू इसके बदले अगर पकौड़े की दुकान खोलने को स्टूडेंट और युवाओं को प्रोत्साहित करते तो अब यह परीक्षा वगैरह की जो बात हो रही है वह ही नहीं होती। कड़ाही, कलछा, तेल में ही सब उलझे रहते।
शिक्षा की नींव ही गलत रखी। गांव-गांव स्कूल खुलवाने से लेकर उच्च शिक्षा तक एक मजबूत ढांचा बनवा कर बेवजह समस्याएं बढ़वाईं। ढांचा इतना मजबूत है कि उसे तोड़ने में ही सारी ताकत लग रही है। यह पढ़ाई-लिखाई हटे तो हमें मूर्खता फैलाने के और रास्ते मिलें। ज्ञान विज्ञान झूठ और अफवाहें फैलाने में मुख्य बाधा है।
यह टीचर लोग सरकारी तो बिचारे बोल नहीं पाते मगर इन कोचिंग वाले सरों ने तो हमारे झूठ की मुख्य फैक्ट्री गोदी मीडिया की ही धज्जियां उड़ा दीं। सारा दोष पढ़ाई-लिखाई का है। न यह कोचिंग वाले टीचर इतने पढ़े-लिखे होते न इन पर स्टूडेंट का इतना विश्वास होता तो न वह गोदी मीडिया के एंकरों से कहने की हिम्मत कर पाते कि हम पढ़े-लिखों पर उंगली उठा रहे हो अनपढ़ एंकरों।
पढ़ाई-लिखाई व्यक्ति में हिम्मत पैदा करती है। इसलिए पढ़ाई-लिखाई का सारा सिलसिला बंद किया जा रहा है। पहले कहा जाता था पढ़ना- लिखना सीखो ए मेहनत करने वालों अब कहा जा रहा है-नफरत करना सीखो ए पढ़ने-लिखने वालों!
सरकार का मुख्य काम है हिन्दू-मुसलमान करना। 12 साल से वोट इसी के नाम पर मिल रहे हैं तो फिर यह मेडिकल का नीट, सीबीएसई की कापियां जांचने में भारी लापरवाही फिर उसके पुनर्मूल्याकंन में और ज्यादा गड़बड़ी। इस स्तर तक कि सवाल उठाने वाले 17 साल के स्टूडेंट को पाकिस्तानी बता देने, विश्वविद्यालयों में प्रवेश का सीयूईटी यूजी और दूसरे तमाम टेस्टों पर ध्यान लगाने की सरकार को जरूरत क्या है?
शनिवार को उच्च शिक्षा के लिए जो ऊपर बताया कि जिसका जाल देश भर में नेहरू ने बिछाया, जिसमें देश ने सबसे ज्यादा नाम किया उसमें एडमिशन के लिए हुए टेस्ट सीयूईटी- यूजी में परीक्षा तक समय पर नहीं ले सके। सुबह 9 बजे का टाइम था। पैरेंट बच्चों को लेकर पहुंचे मगर परीक्षा साढ़े ग्यारह बजे शुरू की। करते रहो बैठे रहो। कोई मतलब नहीं। दूसरी पारी का शाम तीन के बदले चार बजे हुआ। कुछ जगह तो पहली शिफ्ट की परीक्षा रद्द कर दी।
कभी किसी को याद है पहले ऐसा हुआ हो। लेकिन हां, जरूरत पड़ेगी तो गोदी मीडिया ऐसी तमाम कहानियां लेकर आ जाएगा कि तब हुआ और तब हुआ। पाकिस्तान का उदाहरण दे सकते हैं। कहो मुगलों तक चले जाएं। नासा का नाम लेकर मंगल और दूसरे ग्रहों के दावे तो वे करते ही रहते हैं। बोल सकते हैं वहां भी हुआ था।
सरकारी आंकड़ें हैं कि 2019 से लेकर अब तक 65 बड़ी परीक्षाओं के पेपर लीक हुए हैं। यह सारे मामले या तो केन्द्र सरकार के हैं या डबल इंजन सरकार के। अब इसका इलाज सरकार ने क्या ढूंढा? एक एयर फोर्स के जहाजों से पेपर पहुंचाए जाएंगे। खुद धर्मेंन्द्र प्रधान केन्द्रीय शिक्षा मंत्री कह रहे हैं कि पेपर लीक बनाने वाले ही कर रहे हैं तो फिर यह एयर फोर्स से पहुंचाने का क्या मतलब? क्या रास्ते में लूटे गए हैं कभी?
अरे सेना का ही इस्तेमाल करना था तो उससे पेपर बनवा लेते। वहां मेडिकल कोर (योग्य और प्रतिष्ठित डाक्टरों का विभाग) भी है। मेडिकल की फिर से होने वाली परीक्षा नीट 21 जून के लिए ही यह एयर फोर्स और आर्मी भी इस्तेमाल करने की बात कही है।
दूसरे दिल्ली की भाजपा सरकार ने और बड़ी घोषणा की। नीट के लिए जाने वाले परीक्षार्थियों को डीटीसी (दिल्ली की सरकारी बस सेवा) में फ्री यात्रा करने की सुविधा मिलेगी। कैसा मजाक है? मांग रहे हैं कि पेपर लीक न हो, समय पर परीक्षा शुरू हो जाए सरकार कह रही है कि डीटीसी की बस फ्री कर दी।
आर्थिक दबाव से मुक्ति का बड़ा उपकार। मीडिया इसे कहती है भाजपा सरकार का गिफ्ट। कितना किराया होता है? 5, 10, 15, 20 रुपए। यह हैं टिकट की दर। 5 से लेकर 20 रुपए बचा लेंगे! बसों की हालत इतनी खराब है। भीड़ है। इतनी देर-देर में आती हैं। फिर स्टाप पर रुकती है, नहीं रुकती! कोई जाएगा? और मान लो परीक्षार्थी गया तो उसका एडमिट कार्ड कंडक्टर देखेगा। दस बार उलटा-पलटी करेगा। चार सवाल भी।
परीक्षा देते छात्र पर क्या गुजरेगी? और इससे भी मजेदार बात। साथ गए मां-बाप को टिकट लेना होगा।
फुल नाटक। केवल प्रचार। स्टूडेंट की कीमत पर भी। महिलाओं के लिए पहले डीटीसी फ्री थी। मगर अब जिन्होंने इसके लिए अप्लाई करके कार्ड बनाया हो सिर्फ उनके लिए। और वह भी आधार से बनते हैं केवल दिल्ली निवासी। एनसीआर की महिलाओं के लिए नहीं। महिला परीक्षार्थी के लिए तो मान लिया फ्रीहै। मगर साथ में मां होगी तो क्या उसके पास दिल्ली में भाजपा सरकार आने के बाद लागू नई व्यवस्था का पास होगा?
मगर गोदी मीडिया ने घोषणा कर दी बड़ी राहत। उस दिन ट्रैफिक जाम न हो यह देख लें। परीक्षा समय से शुरू हो जाए। पंखे, पानी की व्यवस्था हो और सबसे बड़ी बात पेपर लीक न हो।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार है)


