Top
Begin typing your search above and press return to search.

निर्वाचन आयोग के बुनियादी उद्देश्य और जन अपेक्षाएं

पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल, असम और पुड्डुचेरी के विधानसभा चुनावों के अंतर्गत पिछले माह संपन्न हुए मतदान के बाद उसके परिणाम सोमवार को घोषित हो रहे

निर्वाचन आयोग के बुनियादी उद्देश्य और जन अपेक्षाएं
X
  • नीतीश कुमार सिंह

चुनाव-दर-चुनाव दुनिया की निगाहें विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र- भारत पर हैं। इसके पीछे की ताकत यहां की जनता ही है, जो केंद्र और राज्यों में सरकारों के बनने का मार्ग प्रशस्त करती है। इनके साथ देश में लोकतंत्र की बहाली के लिए एक 'निर्वाचन आयोग' पूरे समय काम करता है।

पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल, असम और पुड्डुचेरी के विधानसभा चुनावों के अंतर्गत पिछले माह संपन्न हुए मतदान के बाद उसके परिणाम सोमवार को घोषित हो रहे हैं। इस दौरान निर्वाचन आयोग विभिन्न कारणों से चर्चा के केंद्र में बना रहा। एक खालिस संवैधानिक निकाय 'निर्वाचन आयोग' निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव के साथ ही मतदाताओं से बिना किसी डर, भय और पक्षपात के उनके मताधिकार का प्रयोग कराता है। ऐसे में कई चुनावी राज्यों में बढ़े मत प्रतिशत सुरक्षित और हरेक समुदाय के मतदाताओं के जनतंत्र के प्रति विश्वास को जाहिर करता है। फिर भी कई सवाल इसके निर्माण काल से लेकर अब तक उठते रहे हैं।

चुनाव-दर-चुनाव दुनिया की निगाहें विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र- भारत पर हैं। इसके पीछे की ताकत यहां की जनता ही है, जो केंद्र और राज्यों में सरकारों के बनने का मार्ग प्रशस्त करती है। इनके साथ देश में लोकतंत्र की बहाली के लिए एक 'निर्वाचन आयोग' पूरे समय काम करता है।

आजादी के बाद से ही इस संवैधानिक संस्था को लेकर मंथन शुरू हो गया था। इसकी सबसे कड़ी कसौटी यह रही कि कार्यपालिका के किसी हस्तक्षेप के बिना यह संस्था काम करे और करोड़ों लोगों की आकांक्षाओं की प्रतिनिधि संस्था साबित हो।

देश में जब पहली बार साल 1949-1950 में निर्वाचन संबंधी नियमावली का निर्माण हो रहा था, तब निर्वाचन से संबंधित कई सवाल उठे थे। यद्यपि निर्वाचन आयोग स्वयं उस दौरान निर्माण प्रक्रिया से गुजर रहा था। मसौदा समिति और केंद्रीय सरकार के सामने एक मसला आया था। उसमें प्रमुख सवाल था कि उस दौरान कुछ प्रांतों में कार्यपालिका यानी सरकार ने कुछ लोगों को जिनका मूल वंश, भाषा और संस्कृति वहां के बहुसंख्यक लोगों से भिन्न है, उनको निर्वाचन नियमावली में स्थान नहीं दे रहे हैं। इस पर डॉ. बाबा साहेब आंबेडकर ने संविधान सभा में कहा था- 'मैं आशा करता हूं कि यह सभा समझती है कि मताधिकार ही जनतंत्र का आधार स्तंभ है।

इसी क्रम में उन्होंने कहा कि ऐसे लोगों को वयस्क मताधिकार के रूप में सर्वोच्च नामावली (मतदाता सूची) में स्थान दिया जा सकता है। यदि स्थानीय सरकार विद्वेष के कारण या किसी पदाधिकारी की सनक के कारण इस अधिकार से इन्हें वंचित करती है, तो लोकतंत्र के मूल पर ही आघात होगा।' इस तरह के सवाल आज भी उठते हैं।

उल्लेखनीय है कि संविधान सभा ने चुनावी प्रक्रिया में कार्यपालिका के हस्तक्षेप को लेकर पुरजोर परहेज किया। सभा के सदस्यों ने बार-बार जोर देकर अपने वक्तव्यों में कहा कि चुनाव आयोग कार्यपालिका से मुक्त एक स्वतंत्र संवैधानिक निकाय होगा। मुख्य निर्वाचन आयुक्त स्थायी होगा और उसकी नियुक्ति राष्ट्रपति करेगा। साथ ही कार्यपालिका स्वेच्छा से मुख्य चुनाव आयुक्त के पद व प्रतिष्ठा को विघटित न कर सके, इसका भी पूरा ख्याल रखा गया। उन्हें उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों के बराबर दर्जा दिया गया। उस समय एक ही मुख्य चुनाव आयुक्त रखा गया था, लेकिन संशोधनों के बाद वर्तमान में तीन सदस्यीय चुनाव आयोग कार्य करता है जिनमें एक मुख्य चुनाव आयुक्त होता है।

वहीं संविधान की बहसों पर गौर करें तो पहले-पहल विचार आया था कि केंद्रीय विधान मंडल यानी संसद के लोकसभा और राज्यसभा सरीखी दोनों सभाओं के निर्वाचन के लिए एक आयोग हो और राज्य के लिए पृथक। इसे राज्यपाल या राज्य का प्रमुख नियुक्त करे। इस पर काफी बहस के बाद इस विचार को खारिज कर दिया गया।

आगे चलकर संविधान सभा ने निर्वाचन के लिए एक ही आयोग बनाया और इसी विचार को आगे बढ़ाया गया। तय हुआ कि केंद्रीय निर्वाचन आयोग के अधीक्षण और नियंत्रण के साथ ही राज्यों के निर्वाचन आयोग कार्य करेंगे।

इस बारे में के एम मुंशी का तर्क था कि, '1833 से 1935 तक के भारत सरकार अधिनियम के प्रावधान ने केंद्रीय सत्ता को मजबूती प्रदान की, जिसके कारण भारत एकजुट रहा। चुनाव आयोग भी एक केंद्रीय निकाय के तौर पर देश में कारगर साबित होगा।Ó उनका मानना था कि प्रांतीय स्तर पर विभिन्न विषयों के बीच केंद्रीय चुनाव आयोग की आवश्यकता है।

गौरतलब है कि संविधान निर्माताओं ने संविधान सभा के बैठने के छह महीने के भीतर ही चुनाव और उससे संबंधित विषयों की चर्चा शुरू कर दी थी। निर्वाचन आयोग का विचार साल 1947 के शुरू में ही स्वीकार कर लिया गया था। उसी साल के जनवरी-फरवरी के महीने में तब तक देश के विभाजन का सवाल निश्चित नहीं हुआ था- मूल अधिकार समिति ने यह विचार रखा था और परामर्शदात्री समिति ने इसे स्वीकार किया था।

इसी क्रम में 15 जून, 1949 को डॉ. आंबेडकर ने चुनाव आयोग से संबंधित एक प्रस्ताव रखा, जिसमें पांच प्रमुख बिंदु थे- मतदाता सूची, निर्वाचन आयोग का गठन, राज्यों में चुनाव आयुक्त, निर्वाचन आयुक्तों की सेवा शर्त और निर्वाचन आयोग को कार्य निष्पादन के लिए कर्मचारी। जो आज भी चुनाव आयोग के मूल आधार हैं।

यह मौलिक सोच धीरे-धीरे उपजी और संविधान की किताब में भाग-15 के अनुच्छेद 324 से लेकर 329 तक में दर्ज है। यह विचार कनाडा के 1920 के निर्वाचन अधिनियम से प्रेरित है। इस पर बहस और संशोधनों के बाद संविधान सभा के सदस्यों ने इसे स्वीकार किया था। इस बहस में प्रस्तावक आंबेडकर को करीब दो दर्जन बार विभिन्न सवालों के जवाब देने पड़े थे और उन्होंने लोकतांत्रिक ढंग से अपनी बात रखी थी।

आजादी के बाद देश में चुनाव आयुक्तों की लंबी फेहरिस्त है। इसमें खास तौर पर 10वें मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन को फोटोयुक्त वोटर आईडी कार्ड, आदर्श आचार संहिता, खर्च की सीमा, बूथ कैप्चरिंग, बाहुबल व भ्रष्टाचार आदि पर लगाम कसने के लिए याद किया जाता है। उन्होंने संविधान के मूल विचारों से प्रेरित होकर इस संवैधानिक संस्था का इक़बाल कायम किया था। ऐसे में चुनाव आयोग के नींव में पत्थर टटोलने भर की जरूरत है और बुलंद भारत की इमारत बनते देर नहीं लगेगी।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार और राजनीति शास्त्र के शिक्षक हैं)


Next Story

Related Stories

All Rights Reserved. Copyright @2019
Share it