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परीक्षा पर चर्चा का झांसा

पाठक जानते हैं कि सीबीएसई बारहवीं बोर्ड परीक्षा के नतीजे इस बार सात सालों में सबसे खराब रहे, केवल 85.20 प्रतिशत बच्चे ही उत्तीर्ण हो पाए।

परीक्षा पर चर्चा का झांसा
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पाठक जानते हैं कि सीबीएसई बारहवीं बोर्ड परीक्षा के नतीजे इस बार सात सालों में सबसे खराब रहे, केवल 85.20 प्रतिशत बच्चे ही उत्तीर्ण हो पाए। और उसमें भी कई बच्चे अपने अंकों से संतुष्ट नहीं थे। खासकर उन छात्रों की चिंता बढ़ गई है, जो जेईई मेन्स में तो शानदार परसेंटाइल ले आए, लेकिन बोर्ड में 75प्रतिशत का मानदंड पार नहीं कर पाए। दरअसल इस बार ऑनस्क्रीन मार्किंग यानी ओएसएम प्रणाली को अपनाया गया। इसमें शिक्षकों के सामने छात्रों की हस्तलिखित उत्तरपुस्तिका नहीं आई।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मन में अगर सत्ता की भूख के अलावा जिम्मेदारी के अहसास के लिए रत्ती भर जगह भी बची है, तो उन्हें फौरन मन की बात और परीक्षा पर चर्चा जैसे बेतुके, निरर्थक कार्यक्रम बंद कर देना चाहिए। जनता पर यह जुल्म क्यों हो कि उसे उसके ही धन का बेजा इस्तेमाल कर बेवजह प्रवचन सुनने के लिए मजबूर किया जाए। क्योंकि प्रधानमंत्री इन दोनों कार्यक्रमों में किसी संत-महात्मा की तरह उपदेश तो सुना जाते हैं, लेकिन अपने जीवन में उनका रंचमात्र भी अमल में नहीं लाते। अभी आने वाले रविवार को फिर एक मन की बात मोदी सुनाएंगे और अनुमान लगाया जा सकता है कि इस बार उनका जोर प्यासों को पानी पिलाने और बिजली का यथासंभव कम इस्तेमाल करने पर रहेगा। इस बारे में वे सोशल मीडिया पर पोस्ट तो कर ही चुके हैं। हालांकि मोदी यह कभी नहीं बताएंगे कि तापमान बढ़ाने, जलसंकट, बिजली संकट पैदा करने में उनकी सरकार का कितना बड़ा हाथ है। विकास परियोजनाओं के नाम पर लाखों पेड़ बेरहमी से काटे जा चुके हैं, जिसका खामियाजा आज की पीढ़ी तो भुगत ही रही है, आने वाली नस्लों के लिए जब बंजर धरती ही विरासत के तौर पर रह जाएगी, तो सुजलाम, सुफलाम, शस्य श्यामला मातरम का गान कैसे होगा, इस पर वंदे मातरम का नारा बुलंद करने वालों को विचार कर लेना चाहिए।

परीक्षा पर चर्चा जैसा कार्यक्रम भी नरेन्द्र मोदी के लिए सत्ता पर पकड़ बनाए रखने के लिए है, यह बात समझना कठिन नहीं है। इस बार बोर्ड परीक्षाओं के पहले मोदी ने परीक्षा पर चर्चा कार्यक्रम में असम का गमछा पहना हुआ था, क्योंकि असम में चुनाव थे। इस कार्यक्रम के लिए देश भर से बच्चों का चयन किया जाता है, फिर सरकारी खर्च पर उन्हें दिल्ली लाया जाता है, प्रधानमंत्री के साथ बातचीत की वीडियो रिकार्डिंग होती है, अलग-अलग सेटअप में रिकार्डिंग्स होती हैं। जो बच्चे नरेन्द्र मोदी से मिलने के लिए चयनित होते हैं उनके मां-बाप को स्वाभाविक तौर पर खुशी होती है, क्योंकि प्रधानमंत्री से मिलना आम जनता के लिए बड़ी बात ही होती है। हालांकि इस बात पर विचार किया जाना चाहिए कि नाबालिग बच्चों को किस तरह भाजपा राजनीतिक फायदे का जरिया बना रही है। कैच दैम यंग, बाजारवाद का पुराना नारा है, यानी पकड़ बनानी है तो बाल्यावस्था, किशोरावस्था में अपने उपभोक्ताओं को प्रभावित किया जाए, ताकि उसका लाभ आगे जाकर मिले। भाजपा इसी नीति पर काम कर रही है। परीक्षा पर चर्चा करने का मोदी का एक छिपा मकसद शायद दिवंगत प्रधानमंत्री पं.नेहरू और दिवंगत राष्ट्रपति एपीजे कलाम से होड़ लेना भी हो सकता है, ये दोनों हस्तियां बच्चों से चर्चा करने का आनंद लेती थीं और बातचीत में ही उन्हें जीवन के अलग-अलग पहलुओं से परिचित कराती थीं। नरेन्द्र मोदी नि:स्वार्थ भाव से ऐसा करते तो शायद उनके इरादे पर संदेह नहीं होता। लेकिन अब सीबीएसई बारहवीं बोर्ड परीक्षा परिणामों की भारी गड़बड़ी पर उनकी चुप्पी बता रही है कि छात्रों से चर्चा का मकसद केवल अपने लिए वोट सुनिश्चित करना था, उससे ज्यादा कुछ नहीं। कम से कम इस मोड़ पर आकर उन अभिभावकों को सावधान होना चाहिए जो इस बात पर खुश थे कि उनके बच्चे ने प्रधानमंत्री के साथ परीक्षा पर चर्चा कार्यक्रम में हिस्सा लिया। और उन अभिभावकों को भी सतर्क रहना होगा जिनके बच्चे अभी बोर्ड परीक्षा देने वाले हैं। क्योंकि जो जुआ इस साल खेला गया वह अगले साल नहीं खेला जाएगा, इसकी कोई गारंटी नहीं दी गई है।

पाठक जानते हैं कि सीबीएसई बारहवीं बोर्ड परीक्षा के नतीजे इस बार सात सालों में सबसे खराब रहे, केवल 85.20 प्रतिशत बच्चे ही उत्तीर्ण हो पाए। और उसमें भी कई बच्चे अपने अंकों से संतुष्ट नहीं थे। खासकर उन छात्रों की चिंता बढ़ गई है, जो जेईई मेन्स में तो शानदार परसेंटाइल ले आए, लेकिन बोर्ड में 75प्रतिशत का मानदंड पार नहीं कर पाए। दरअसल इस बार ऑनस्क्रीन मार्किंग यानी ओएसएम प्रणाली को अपनाया गया। इसमें शिक्षकों के सामने छात्रों की हस्तलिखित उत्तरपुस्तिका नहीं आई, बल्कि कंप्यूटर स्क्रीन पर उसकी डिजिटल प्रति आई, जिसे जांचा गया। परीक्षा केंद्रों से एकत्र की गई उत्तरपुस्तिकाओं को हाई-रिजॉल्यूशन स्कैनर्स से स्कैन करके डिजिटल रूप में बदला गया। इसके बाद इन डिजिटल कॉपियों को जांचकर्ताओं को कंप्यूटर पर भेजा गया। उन्होंने स्क्रीन पर उत्तरों को पढ़ा और बोर्ड की मार्किंग स्कीम के आधार पर सीधे सिस्टम में ही नंबर दिए। सुनने में यह व्यवस्था बड़ी अच्छी लगती है। लेकिन जब कई छात्रों को उनकी उम्मीद के अनुरूप अंक नहीं मिले तो उन्होंने फिर से जांच के लिए आवेदन किया। जिसके लिए प्रति विषय सौ रूपए का शुल्क लिया गया। इसमें छात्रों को उनकी उत्तरपुस्तिकाओं की स्कैन प्रति भी भेजी गई। छात्रों को बड़ा झटका तब लगा, जब उन्होंने देखा कि जो उत्तरपुस्तिका उनकी बताई जा रही है, वह असल में उनकी है ही नहीं। किसी को पहला पृष्ठ उसका मिला, बाकी किसी और का। किसी को काली स्याही वाली उत्तरपुस्तिका मिली, जबकि उसने काली स्याही का इस्तेमाल ही नहीं किया था। वेदांत नामक छात्र ने तो इसकी शिकायत बाकायदा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर भी उठाई, जिसके लिए उसे पाकिस्तानी, देशद्रोही, जॉर्ज सोरोस का एजेंट न जाने क्या-क्या कहा गया। हालांकि सीबीएसई ने वेदांत की शिकायत पर माना कि उनसे गलती हुई है। इसके बाद कुछ और छात्रों ने ऐसी ही शिकायत दर्ज की और अब ये सिलसिला बढ़ता जा रहा है। सीबीएसई इनमें से कितने छात्रों के सामने कबूल करेगा कि उससे गलती हुई है, यह कहा नहीं जा सकता। क्योंकि इस सरकार में गलती स्वीकारने और जिम्मेदारी लेने का कोई चलन है ही नहीं। जैसी सरकार, वैसे अफसर। शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान तो नीट पेपर लीक होने के बाद भी अपने पद पर आराम से बने हुए हैं, जबकि कई छात्रों ने आत्महत्या कर ली है। जिन लोगों की अंतरात्मा जागी हुई होती है, वे ऐसी घटनाओं पर विचलित होते हैं और फौरन अपनी नैतिक जिम्मेदारी लेकर त्यागपत्र की पेशकश करते हैं। लाल बहादुर शास्त्री ने ऐसा ही किया था। यह कोई किंवदंती नहीं है, 1965 की बात है।

लेकिन 2026 में जिम्मेदारी लेने की जगह पीड़ित को ही कटघरे में खड़े करने का चलन मोदी सरकार ने बना लिया है। इसलिए अपने ही देश के बच्चे को पाकिस्तानी कहने में दूरदर्शन के पत्रकार अशोक श्रीवास्तव को हिचक नहीं हुई। धर्मेन्द्र प्रधान को भी ग्लानि नहीं हुई कि लाखों बच्चों का भविष्य उनके मंत्रालय ने दांव पर लगा दिया। और इन सबके सिरमौर प्रधानमंत्री मोदी भी आराम से प्रवचन देने में लगे हुए हैं।

प्यासे को पानी पिलाओ, घर के बाहर मटका रखो जैसी पोस्ट मोदी कर रहे हैं, नितिन गडकरी के लिए जन्मदिन की शुभकामनाएं सोशल मीडिया पर प्रेषित कर रहे हैं, लेकिन नीट पेपर लीक से जिन अभ्यर्थियों को तकलीफ हुई, जिन होनहार नौजवानों ने हताशा में अपने प्राण ले लिए, उनके लिए कोई अफसोस नहीं जताया। अशोक श्रीवास्तव के घर में शादी समारोह में शिरकत करने वाले नरेन्द्र मोदी उन्हें फटकार नहीं सके कि मेरे देश के बच्चे को पाकिस्तानी कहने की हिमाकत कैसे की। सीबीएसई को नरेन्द्र मोदी ने कोई प्रवचन नहीं दिया कि बिना किसी तैयारी के ओएसएम जैसी व्यवस्था क्यों लागू की गई। अब गड़बड़ी सामने आई है तो इसे कैसे सुधारा जाएगा, इस बारे में भी कोई सवाल-जवाब नहीं हुआ। मोदी की तरह समूचे भाजपाई कुनबे ने इस तरफ से चुप्पी साध रखी है। जाहिर है उन्हें 18 लाख बच्चों के भविष्य की धेले भर परवाह भी नहीं है। उनके अपने बच्चे अंबानी के स्कूलों में पढ़ लेंगे या फिर विदेश चले जाएंगे। बाकी आम जनता के बच्चे पढ़ें न पढ़ें, धार्मिक जुलूसों में उपद्रव करने के लिए उन्हें दिहाड़ी पर तो शामिल कर ही लिया जाएगा। भाजपा ने इतनी पूंजी आखिर ऐसे ही इस्तेमाल के लिए तो शायद जमा की है।

जिन लोगों ने आज तक अच्छे दिनों की आस में इकतरफा भाजपा के लिए वोट किया और नरेन्द्र मोदी में अपना उद्धारक देखा, उन्हें गौर करना चाहिए कि किसी के भी साथ अन्याय होता है तो आवाज विपक्ष उठाता है, भाजपा चुप ही रहती है। इस समय भी नीट पेपर लीक से लेकर सीबीएसई रिजल्ट घोटाले तक कांग्रेस ने पुरजोर आवाज उठाई है। राहुल गांधी ने छात्रों के साथ खड़े होने का वादा किया है। एक बड़ा आरोप भी राहुल गांधी ने लगाया है कि सीबीएसई ने कोएम्प्ट नाम की कंपनी को ऑनस्क्रीन मार्किंग की जिम्मेदारी दी, जो पहले ग्लोब एरिना नाम से तेलंगाना में ऐसा ही काम कर चुकी है। 2019 में उसने के.चंद्रशेखर राव की बीआरएस सरकार में परीक्षा में ऑनस्क्रीन मार्किंग की थी, जिसमें परिणाम गड़बड़ आए तो कम से कम 23 छात्रों ने आत्महत्या कर ली थी। राहुल गांधी ने पूछा है कि कोएम्प्ट को सीबीएसई का ठेका क्यों और किसके कहने पर दिया गया? कौन-कौन से नियम और प्रक्रिया दरकिनार करके इस कंपनी को ये ठेका दिया गया? कोएम्प्ट पहले ग्लोब एरिना के नाम से विवादों में घिर चुकी है, ये सीबीएसई को क्यों नहीं पता चला? बैकग्राउंड चेक्स क्यों नहीं किए गए? कोएम्प्ट प्रबंधन और मोदी सरकार के बीच आखिर क्या संबंध हैं? राहुल गांधी ने इसके साथ ही इस पूरे घोटाले के असली दोषियों को सामने लाने के लिए स्वतंत्र न्यायिक जांच और एसआईटी का गठन तत्काल किए जाने की मांग की है।

अब इस बारे में सीबीएसई को जवाब देना चाहिए कि राहुल गांधी ने जो आरोप लगाए हैं, क्या वो सही हैं, आखिर किस कंपनी को जांच का ठेका दिया गया और क्या पूरी पड़ताल की गई या नहीं। सरकार तो शायद ही एसआईटी गठित करे। लेकिन क्या सर्वोच्च न्यायालय इस बारे में स्वत: संज्ञान लेकर कोई निर्देश देगा, यह भी देखना होगा।

बाकी मन की बात और परीक्षा पर चर्चा के झांसे में आने का क्या अंजाम हुआ है, यह लाखों मां-बाप आज समझ पा रहे होंगे।


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