राज्य चुनावों से पहले ईडी के फिर अति सक्रिय होने पर रहस्य गहराया
भारत में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा विपक्षी नेताओं और प्रवर्तन निदेशालय से जुड़े हाई-प्रोफाइल राजनीतिक-कानूनी मामलों की सुनवाई कोई नई बात नहीं है।

— डॉ. ज्ञान पाठक
यह सही समय है कि सर्वोच्च न्यायालय को ईडी की कार्रवाई के साथ-साथ पूरे राजनीतिक पृष्ठभूमि और सत्ताधारी दल द्वारा जांच एजेंसी के संभावित दुरुपयोग पर भी विचार करना चाहिए। सभी राजनीतिक दलों के लिए चुनावों के दौरान समान अवसर के लिए कुछ दिशानिर्देश होने चाहिए, और सत्ताधारी दल को तथाकथित कानूनी कार्रवाई के माध्यम से विपक्षी राजनीतिक अभियानों को पटरी से उतारने और चुनावी परिणामों को प्रभावित करने से रोका जाना चाहिए।
भारत में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा विपक्षी नेताओं और प्रवर्तन निदेशालय से जुड़े हाई-प्रोफाइल राजनीतिक-कानूनी मामलों की सुनवाई कोई नई बात नहीं है। हालांकि, 15 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने जिस मामले की सुनवाई की, उसका अप्रैल-मई 2026 में होने वाले पांच राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के राज्य चुनावों से पहले खास महत्व है। ईडी ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस के साथ काम करने वाली राजनीतिक कंसल्टेंसी फर्म आईपैक पर छापे के दौरान चोरी और रुकावट डालने का आरोप लगाया है।
यह एक खुला रहस्य है कि ईडी राष्ट्रीय और राज्य चुनावों से पहले अति सक्रिय हो जाती है और विपक्षी नेताओं के खिलाफ आक्रामक कार्रवाई शुरू कर देती है, उन्हें नोटिस भेजती है, उन्हें अपने समक्ष पेश होने के लिए कहती है, उनके ठिकानों पर छापे मारती है, और यहां तक कि उनके महत्वपूर्ण दस्तावेज और वित्त भी जब्त कर लेती है, जिससे विपक्षी पार्टियां कमजोर हो जाती हैं, उनके राजनीतिक अभियान पटरी से उतर जाते हैं और सीटों के मामले में उनके राजनीतिक प्रदर्शन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। यह सत्ताधारी भाजपा और एनडीए को सत्ता हथियाने और विपक्ष को आसानी से हराने में मदद करता है। यहां तक कि सर्वोच्च न्यायालय ने भी ईडी पर कई बार प्रतिकूल टिप्पणी की है और कहा है कि यह केंद्र सरकार के एक उपकरण के रूप में काम नहीं कर सकता। यह सवाल अभी तक तय नहीं हुआ है कि क्या ईडी प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सत्ताधारी व्यवस्था के राजनीतिक हथियार के रूप में काम करता है? पूरा विपक्ष तो ऐसा ही आरोप लगाता है, और अनेक लोग कहते हैं कि मोदी सरकार ने केन्द्रीय अपराध अन्वेषण विभागों को विपक्षी नेताओं के पीछे लगा रखा है।
पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु उन पांच राज्यों में से हैं जहां अप्रैल-मई 2026 में चुनाव होने हैं, और हम देख रहे हैं कि ईडी कितनी सक्रिय हो गई है। दोनों राज्यों से विपक्षी नेताओं के खिलाफ ईडी की कई कार्रवाइयों की खबरें आ रही हैं। 8 जनवरी को ईडी ने सॉल्ट लेक में राजनीतिक कंसल्टेंसी फर्म आईपैक के ऑफिस और इसके निदेशक प्रतीक जैन के कोलकाता स्थित आवास पर एक पुराने कोयला तस्करी मामले के सिलसिले में छापा मारा था। चूंकि आईपैक टीएमसी के लिए काम करती है, इसलिए यह साफ है कि पार्टी का संवेदनशील राजनीतिक डेटा उनके पास है, जो ममता बनर्जी के लिए लगातार तीसरी बार चुनाव जीतने के लिए महत्वपूर्ण है। भाजपा राज्य में टीएमसी से सत्ता छीनने की कोशिश कर रही है, और प्रधानमंत्री और केंद्रीय गृहमंत्री ने बार-बार कहा है कि पश्चिम बंगाल उनका टॉप टारगेट है। इसलिए ईडी की कार्रवाई राजनीतिक रूप से संवेदनशील है। ईडी के इस आरोप पर है कि आईपैक ऑफिस और उसके डायरेक्टर के ठिकानों पर छापे के दौरान उन्हें पश्चिम बंगाल सरकार और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से रुकावट का सामना करना पड़ा, न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्र और विपुल पंचोली की सर्वोच्च न्यायालय की बेंच ने इसे 'बहुत गंभीर' बताया, और कहा कि वे नोटिस जारी करके मामले की जांच करेंगे। उन्होंने मौखिक रूप से टिप्पणी की, 'यह बहुत गंभीर मामला है; हम नोटिस जारी करेंगे। हमें इसकी जांच करनी होगी।'
इस मामले पर 9 जनवरी को कलकत्ता हाई कोर्ट में भी हंगामा हुआ था, जिस पर बेंच ने कहा कि ईडी छापे मामले की सुनवाई के दौरान कलकत्ता हाईकोर्ट में हुए हंगामे से वे बहुत परेशान हैं। गौरतलब है कि हंगामे के बाद, कलकत्ता हाई कोर्ट ने कोर्टरूम के अंदर बेकाबू अराजकता का हवाला देते हुए, राजनीतिक कंसल्टेंसी फर्म आईपैक से जुड़े ठिकानों पर ईडी के तलाशी और जब्ती अभियान से संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई 14 जनवरी तक के लिए स्थगित कर दी थी।
जांच एजेंसी के छापे के दौरान पश्चिम बंगाल सरकार का 'हस्तक्षेप और रुकावट' एक बहुत ही चौंकाने वाला पैटर्न दिखाता है, ईडी की ओर से पेश हुए सोलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बेंच से कहा। उन्होंने कहा कि इससे दूसरों को बढ़ावा मिलेगा और केंद्रीय बलों का मनोबल गिरेगा तथा 'राज्यों को लगेगा कि वे छापामारी के दौरान घुस सकते हैं, चोरी कर सकते हैं, और फिर धरने पर बैठ सकते हैं। एक मिसाल कायम की जानी चाहिए, जो अधिकारी वहां मौजूद थे, उन्हें निलंबित किया जाना चाहिए।'
कलकत्ता हाईकोर्ट में हुए हंगामे के बारे में, श्री मेहता ने कहा कि सुनवाई के दौरान बड़ी संख्या में वकील और अन्य लोग कोर्ट में घुस गए, जिसके कारण सुनवाई स्थगित करना पड़ी, और कहा, 'ऐसा तब होता है जब लोकतंत्र की जगह भीड़तंत्र ले लेता है।'
वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने ईडी की याचिका का विरोध किया और कहा कि मामले की सुनवाई पहले हाईकोर्ट में होनी चाहिए। उन्होंने कहा, 'यह सरासर झूठ है कि सभी डिजिटल डिवाइस ले लिए गए। यह आरोप कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सभी डिवाइस ले लिए, झूठ है, जिसकी पुष्टि ईडी के अपने पंचनामे (तलाशी रिकॉर्ड) से होती है।' उन्होंने यह भी कहा, 'कोयला घोटाले में आखिरी बयान फरवरी 2024 में दर्ज किया गया था; तब से ईडी क्या कर रही थी? चुनावों के बीच इतनी जल्दबाजी क्यों?'
हालांकि ईडी ने दावा किया है कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी परिसर में घुसीं और जांच से जुड़े 'अहम' सबूत ले गईं, ममता ने केंद्रीय एजेंसी पर अपनी हद पार करने का आरोप लगाया है, और पश्चिम बंगाल पुलिस ने भी ईडी अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी है। मुख्यमंत्री ममता की तरफ से पेश होते हुए श्री सिब्बल ने कहा, 'हम सब जानते हैं कि आईपैक पश्चिम बंगाल में चुनावों का काम देखती है। आईपैक और टीएमसी के बीच एक फॉर्मल कॉन्ट्रैक्ट है।' उन्होंने आगे कहा, 'चुनाव का डेटा गुप्त होता है और वह सब वहीं रखा जाता है। उम्मीदवारों वगैरह के बारे में बहुत सारी जानकारी होगी। एक बार जब आपके पास जानकारी आ जाएगी, तो हम चुनाव कैसे लड़ेंगे? ममता बनर्जी को विरोध करने का अधिकार है कि वह इसकी रक्षा करें और इसलिए वे वहां गयीं।'
इस पूरे मामले को सिर्फ प्रशासनिक मुद्दा नहीं माना जा सकता। ईडी की कार्रवाई हमेशा पूरी तरह से प्रशासनिक नहीं होती, खासकर चुनावों से पहले या उसके दौरान उनकी अति सक्रिय भूमिका को देखते हुए, और वह भी मुख्य रूप से विपक्षी नेताओं के खिलाफ। 2014 से, 95 प्रतिशत मामले विपक्षी नेताओं के खिलाफ दर्ज किए गए हैं, जबकि जुलाई 2025 तक भ्रष्टाचार के मामलों में सिर्फ 0.1 प्रतिशत दोषसिद्धि हुई है। इससे पता चलता है कि ईडी के पास विपक्षी नेताओं के खिलाफ पर्याप्त सुबूत नहीं होते हैं।
आम चुनाव 2024 से पहले भी, कई नेताओं को ईडी की कार्रवाई का सामना करना पड़ा, जिसमें आप नेता और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, झामुमो नेता और झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन, और कांग्रेस नेता सोनिया गांधी और राहुल गांधी शामिल हैं।
सरकार का रुख है कि वे 'भ्रष्टों के झुंड' (जैसा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विपक्षी नेताओं और इंडिया गठबंधन को कहा है) के खिलाफ कार्रवाई करने पर तुले हुए हैं। कोर्ट ने भी कई बार कहा है कि राजनीतिक पद कानूनी कार्रवाई से छूट नहीं देता, भले ही गिरफ्तारियां चुनावों के करीब हों, लेकिन उन्होंने यह भी कहा है कि ईडी को सत्ताधारी दल के राजनीतिक हथियार के रूप में काम नहीं करना चाहिए।
यह सही समय है कि सर्वोच्च न्यायालय को ईडी की कार्रवाई के साथ-साथ पूरे राजनीतिक पृष्ठभूमि और सत्ताधारी दल द्वारा जांच एजेंसी के संभावित दुरुपयोग पर भी विचार करना चाहिए। सभी राजनीतिक दलों के लिए चुनावों के दौरान समान अवसर के लिए कुछ दिशानिर्देश होने चाहिए, और सत्ताधारी दल को तथाकथित कानूनी कार्रवाई के माध्यम से विपक्षी राजनीतिक अभियानों को पटरी से उतारने और चुनावी परिणामों को प्रभावित करने से रोका जाना चाहिए।


