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एक असफल विधेयक के पीछे की गहरी कहानी

लोकसभा में महिला रिजर्वेशन का मुद्दा सीधा-सादा होना चाहिए था। सरकार कहती है कि वह महिला आरक्षण चाहती है; विपक्ष पूरी तरह इसके साथ है।

एक असफल विधेयक के पीछे की गहरी कहानी
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जगदीश रत्तनानी

कुल मिलाकर इस पूरी कवायद की उपलब्धि यही रही कि परस्पर विश्वास टूट गया। परस्पर विश्वास का पहला हिस्सा सत्तारूढ़ वर्ग और उन्हें चुनने वाले लोगों के बीच होता है। चुने हुए लोगों पर भरोसा किया जाता है कि वे मतदाताओं की ज़रूरतें पूरी करेंगे। दूसरा हिस्सा नागरिकों के बीच का भरोसा है, जिन्हें मिलकर लोकतांत्रिक राज्य और उसकी संस्थाओं के लीवर्स पर काम करना चाहिए।

लोकसभा में महिला रिजर्वेशन का मुद्दा सीधा-सादा होना चाहिए था। सरकार कहती है कि वह महिला आरक्षण चाहती है; विपक्ष पूरी तरह इसके साथ है। फिर भी, देश को महिलाओं के लिए आरक्षण नहीं मिला बल्कि एक ऐसा विधेयक मिला जिसे फेल होने के लिए ही बनाया गया था। बिल के गिरने के बाद अब भारतीय जनता पार्टी हमलावर हो गई है। मानो इसका पूरा मकसद विपक्ष के खिलाफ राजनीतिक बातचीत को टकराव और कड़वाहट के एक नए स्तर पर ले जाना था। हाल के दिनों में भारतीय लोकतंत्र इसी बुरी हालत में पहुंच गया है। भाजपा के नेतृत्व में यह एक ऐसी संस्कृति है जिसने राजनीति को मुक्केबाजी के रिंग जैसा बना दिया है जिसमें विपक्ष को हर कदम पर हैरान, सदमे में और मैदान से बाहर होना पड़ता है। महिला आरक्षण से जुड़े मुद्दे चालबाज राजनीति का सिर्फ नया उदाहरण हैं जो राजनीतिक गर्मी बढ़ाने, भरोसे में कमी लाने और द्विपक्षीय सहमति की किसी भी गुंजाइश को खत्म करने में योगदान दे रहे हैं- जो लोकतंत्र में रोज़मर्रा के कामकाज का हिस्सा होना चाहिए।

ध्यान देने वाली बात यह है कि महिलाओं के लिए आरक्षण से जुड़ा विधेयक (131वां संविधान संशोधन विधेयक) उन महत्वपूर्ण राज्यों के चुनावों के दौरान आया है जिन पर काफी चर्चा हो रही है। जिस बिल को सदन में दो-तिहाई बहुमत की जरूरत थी उसे किसी प्रसार या सलाह-मशविरा किए बिना कुछ आश्चर्यजनक अनुच्छेद- एक नये और जल्दबाजी वाले परिसीमन के साथ लाया गया जिससे 2029 के चुनावों से पहले लोकसभा सीटें 543 से बढ़कर 850 हो जाएंगी। इनमें से 33 प्रतिशत बढ़ी हुई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी। सरकार को पता रहा होगा कि सही सलाह-मशविरे और पहले से सहमति के बिना इतना बड़ा बदलाव पारित नहीं होगा। भाजपा की चुनावी मुहिम के हिस्से के तौर पर विधेयक का अवश्यंभावी रूप से गिरना विपक्ष पर नए हमले का आधार बन गया।

साफ़ है, दक्षिणी राज्यों ने विधेयक का विरोध किया। विधेयक पास होने का मतलब था कि वे अनुपात के हिसाब से सीटें खो देंगे क्योंकि उनकी आबादी जनसंख्या नियंत्रण या जनसंख्या नियंत्रण के करीब पहुंच गई है जबकि भाजपा के कंट्रोल वाले उत्तरी राज्यों को विकास की अपर्याप्त व खराब कोशिशों के बावजूद या उसकी वजह से ज्यादा सीटें मिलेंगी। यह होना ही था क्योंकि परिसीमन का मकसद उस आबादी को सामान्य बनाना है जिनकी सेवा जनता के प्रतिनिधि करते हैं ताकि ज़्यादा जनसंख्या का मतलब लोकसभा में ज़्यादा सीटें हों। इसके अलावा जिस सरकार ने कभी विपक्ष के साथ भरोसे का माहौल नहीं बनाया उस पर कई वर्षों से लंबित परिसीमन प्रक्रिया में लोकसभा सीटों की सीमाओं को फिर से बनाने का विश्वास कैसे किया जा सकता है? ऐसे प्रयास के लिए समर्थन की कमी साफ थी।

फिर भी विधेयक पेश किया गया जो उम्मीद के मुताबिक गिर गया और ऐसा लगा कि भाजपा ने इसे एक नए हमले के लिए इस्तेमाल किया ताकि वह खुद को महिला आरक्षण का समर्थक दिखा सके और विपक्ष को बदनाम कर सके। यह दुखद घटना 18 अप्रैल को रात 8.30 बजे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के देश के नाम संबोधन से और भी खराब हो गई जिसने एक बड़े सरकारी पद को महत्वपूर्ण राज्य चुनावों के बीच एक पार्टी का हिस्सा बना दिया। यह भाषण भाजपा के लिए और भाजपा की तरफ से पर्चे बांटने जैसा था जिसमें विधेयक पर हुई गड़बड़ी के बारे में कोई सफाई नहीं दी गई।

प्रधानमंत्री ने विपक्षी पार्टियों का नाम लिया और उन पर महिलाओं के लिए आरक्षण न चाहने का आरोप लगाया जबकि मुद्दा सरकार और 2029 के चुनावों के लिए उसके शॉर्ट टर्म एजेंडे पर गहरा अविश्वास था। इस प्रक्रिया में प्रधानमंत्री मोदी के लिए एक राजनेता-नेता के तौर पर उभरने का मौका खत्म हो गया और जो विषय को समझाने, स्पष्ट करने और देश को एक साथ लाने के लिए ज़िम्मेदार था। भाजपा के हिसाब से यह हार शायद कुछ भी मायने नहीं रखती लेकिन यह भरोसे के टूटने की तरफ एक और कदम है जिससे सत्तारूढ़ और विपक्ष के बीच बातचीत की गुंजाइश और कम हो जाती है। प्रधानमंत्री के देश के नाम खास भाषण का इस्तेमाल इसके पहले कभी गाली-गलौज के लिए नहीं किया गया जिसमें खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पहले के भाषण भी शामिल हैं।

इस बीच आरक्षण का मुद्दा अब और ज़्यादा राजनीतिक हो-हल्ले में उलझा हुआ है जिससे असली सवाल हल नहीं होता। विपक्ष ने निश्चित रूप से मांग की है कि किस तरह यहीं पर (इसी विधेयक में) नए परिसीमन की प्रक्रिया और उससे जुड़े सभी विवादित मुद्दों का इंतज़ार किए बिना सरकार महिलाओं के लिए आरक्षण लागू करने के लिए रास्ते ढूंढ सकती है। सप्ताहांत में द्रमुक ने बिना परिसीमन या जनगणना रिपोर्ट के मौजूदा लोकसभा सदस्यों के आधार पर महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटों का आरक्षण लागू करने के लिए एक निजी सदस्य संविधान संशोधन विधेयक पेश किया। यह ध्यान देने वाली बात है कि लोकसभा में मौजूदा सदस्यों के प्रतिशत के तौर पर तृणमूल कांग्रेस में महिलाओं की संख्या सबसे ज़्यादा- 38 फीसदी (29 में से 11 महिलाएं) है जबकि भाजपा में यह सिर्फ़ 13 प्रति सैकड़ा (240 में से 31 महिलाएं) हैं।

कुल मिलाकर इस पूरी कवायद की उपलब्धि यही रही कि परस्पर विश्वास टूट गया। परस्पर विश्वास का पहला हिस्सा सत्तारूढ़ वर्ग और उन्हें चुनने वाले लोगों के बीच होता है। चुने हुए लोगों पर भरोसा किया जाता है कि वे मतदाताओं की ज़रूरतें पूरी करेंगे। दूसरा हिस्सा नागरिकों के बीच का भरोसा है, जिन्हें मिलकर लोकतांत्रिक राज्य और उसकी संस्थाओं के लीवर्स पर काम करना चाहिए ताकि नियमों को नियंत्रण में रखने के लिए उन पर नजर रखी जा सके और ज़रूरी दबाव डाला जा सके। इस तरह का संतुलित लेन-देन एक लोकतांत्रिक व्यवस्था की जान है। लेकिन जैसे-जैसे हिंसा की भाषा हावी होती है और तीखी आवाज़ों को बढ़ावा मिलता है, वे नागरिकों के बीच शिष्ट संवाद के लिए जगह कम करते हैं और लोकतांत्रिक आवाज़ों को कम करते हैं। इसका नतीजा यह होता है कि कम हुआ भरोसा एक गिरती हुई लोकतांत्रिक व्यवस्था का संकेत देता है जो इस समय देश के लिए सबसे बड़ी चिंता होनी चाहिए। इस तरह फेल हुआ यह विधेयक भारतीय लोकतंत्र में धीरे-धीरे साफ तौर पर दिखाई देने वाले क्षेत्रों में और कभी-कभी कई अनदेखे तरीकों से जो कुछ भी गलत हो रहा है, उसकी गहरी कहानी बताता है।

ऊपर से जो टोन सेट किया जाता है, उसे पार्टी के नेता और कार्यकर्ता नीचे भी कॉपी कर सकते हैं ताकि देश भर में सौ दूसरे तरीकों से हिंसक भाषा, धमकियों या दादागिरी का वही मिश्रण इस्तेमाल किया जा सके जो शायद कभी सुर्खियों में न आएं लेकिन लोकतंत्र को तोड़ने और लोगों को नाराज़ करने के लिए छोटे-छोटे वार करेगा। भाजपा आज अपनी बेहतर आर्थिक स्थिति के साथ जीत का दावा कर सकती है लेकिन उसके काम उस देश की लोकतांत्रिक भावना पर बड़ा झटका है जो आज भी देश के लिए पहले खास भाषण- 'ट्रिस्ट विद डेस्टिनीÓ को याद करता है जिसने न केवल भारत बल्कि दुनिया को प्रेरित किया।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। सिंडिकेट:द बिलियन प्रेस)


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