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गला घोटिया शिक्षा का विश्वगुरु बन चुका देश

पिछले 12 सालों से देश को विश्वगुरु बनाने का जो झूठ फैलाया जा रहा था, अब उसका गुबार ऐसा फूटा है कि दुनिया भर में शर्मिंदगी का सबब बन गया है।

गला घोटिया शिक्षा का विश्वगुरु बन चुका देश
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— सर्वमित्रा सुरजन

इस सारे प्रकरण से एक बात और जाहिर हो रही है कि सरकारी विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षा संस्थानों को बर्बाद करने का नतीजा देश भुगत रहा है। आईआईटी, आईआईएम, एम्स और ऐसे ढेरों उच्च स्तरीय संस्थान, जो नेहरूजी के काल में शुरु हुए या उनकी सोच को आगे बढ़ाते हुए आगे खोले गए, उन सब को सहेजने की कितनी सख्त जरूरत है।

पिछले 12 सालों से देश को विश्वगुरु बनाने का जो झूठ फैलाया जा रहा था, अब उसका गुबार ऐसा फूटा है कि दुनिया भर में शर्मिंदगी का सबब बन गया है। दिल्ली में चल रहे एआई इम्पैक्ट समिट में गलगोटिया यूनिवर्सिटी के स्टॉल में चीन में बने एक रोबो डॉग को अपना बनाकर पेश किया गया, लेकिन गलगोटिया यूनिवर्सिटी ने इस बात पर शायद ध्यान नहीं दिया कि जमाना सोशल मीडिया का है, जहां झूठ अगर मिनटों में फैलता है, तो उसकी पोल भी उतनी ही जल्दी खुल भी जाती है। अब बड़े बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले वाले अंदाज में गलगोटिया वालों ने एआई समिट को अलविदा तो कह दिया है, लेकिन उनके कारण या यूं कहें कि मोदी सरकार के कारण दुनिया भर में जो थू थू देश की हुई है, उसे कैसे सुधारा जाएगा, ये चिंता ईमानदार नागरिकों को हो रही है।

पाठक जानते हैं कि दिल्ली के भारत मंडपम में 16 फरवरी से 20 फरवरी तक एआई समिट चल रहा है, जिसे अब तक का इस क्षेत्र में दुनिया में सबसे बड़ा आयोजन बताया जा रहा है। दिल्ली के चौक-चौराहों पर इस समिट का प्रचार करते पोस्टर्स लगे हैं, जिनमें असल में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का प्रचार हो रहा है। इस समिट के पहले दिन ही छह घंटे तक आयोजन स्थल से प्रतिभागियों को बाहर कर दिया गया क्योंकि श्रीमान मोदी पधार रहे थे और उन्हें कई एंगल्स से रील बनवानी थी, ताकि सोशल मीडिया पर प्रभाव बढ़ाया जाए। इसमें जो अराजकता और अव्यवस्था फैली, उसकी पर्याप्त चर्चा वैश्विक मीडिया में हुई, जिसकी वजह से भारत की छवि पर बट्टा लगा। लेकिन इसमें इतना काफी नहीं था कि अब बौद्धिक और रचनात्मक कंगाली दिखाते हुए गलगोटिया यूनिवर्सिटी ने चीन में बने और वहीं से खरीदे हुए एक रोबो डॉग को यूनिवर्सिटी में बनाया गया बताकर पत्रकारों को दिखाया। एक वीडियो भी सामने आया है, जिसमें यूनिवर्सिटी की शिक्षिका साफ-साफ कह रही हैं कि ये हमारे सेंटर पर बनाया गया रोबो डॉग हैं। इसमें पत्रकार से वो ये भी कह रही हैं कि ये काफी शरारती भी है। लेकिन असली शरारत कौन कर रहा है, ये चीन के मीडिया ने जाहिर कर दिया। उसने लिख दिया कि एक भारतीय यूनिवर्सिटी हमारे यहां बने रोबो डॉग को अपना बना कर पेश कर रही है।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भेद खुल गया तो यूनिवर्सिटी ने अब स्पष्ट किया है कि उन्होंने कभी यह दावा नहीं किया कि रोबो डॉग उनकी टीम ने विकसित किया है, बल्कि यह चीनी रोबोटिक्स फर्म यूनिट्री से खरीदा गया है और छात्रों के लिए लर्निंग टूल के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है। जानकारी के लिए ये भी बता दूं कि चीन ने इस रोबो डॉग का नाम यूनि ट्री जी ओ 2 दिया है। जबकि गलगोटिया यूनिवर्सिटी ने इसे ओरियान नाम दिया था। अब गलगोटिया वाले चाहें तो ये तर्क दे सकते हैं कि जब चीन हमारे पहाड़, नदियों और अन्य इलाकों को अपना बताकर उनका नया नामकरण करता है, तो हम भी ऐसा करके बदला ले सकते हैं। इसके बाद प्रधानमंत्री मोदी को भी चेहरा बचाने में मदद मिलेगी और वो गलगोटिया को राष्ट्रसेवक विश्वविद्यालय की उपाधि भी दे सकते हैं। चीन से बदला लेने का ऐसा अनूठा मौका उन्हें और कब मिलेगा।

बहरहाल, अंतरराष्ट्रीय बेइज्जती होती दिखी तो सरकार ने गलगोटिया के प्रतिनिधियों को भारत मंडपम से सामान समेटने का आदेश दे दिया। हालांकि इसका जो वीडियो सामने आया है, उसमें गलगोटिया के छात्र कह रहे हैं कि हम लंच करने जा रहे हैं, समिट से नहीं जा रहे। हालांकि उनकी शिक्षिका ने बता दिया कि विश्वविद्यालय से आधिकारिक बयान आ जाएगा। खैर इस निजी विश्वविद्यालय ने कई तरह से मोदी की सेवा की है। दो साल पहले चुनावों के वक्त कांग्रेस के घोषणापत्र के विरोध में इस विश्वविद्यालय ने अपने छात्रों को सड़क पर उतार दिया था। भला इससे ज्यादा और सेवा क्या होगी कि बच्चों से भारी भरकम फीस लेकर उन्हें भाजपा के एजेंडे का प्रचार करने में लगाया जाए।

हमें नहीं पता कि अब इस प्रकरण के बाद गलगोटिया संस्थान अपने छात्रों पर इस बात की खीझ निकालेगा या संबंधित शिक्षकों पर कोई कार्रवाई होगी। हालांकि एएनआई से चर्चा में इस संस्थान की एक शिक्षिका ने साफ कहा कि यह सब गलतफहमी और शब्दों का सही चयन न करने के कारण हुआ है। उन्होंने कहा कि हमने जो कहा, उसे शायद सामने वाले ने ठीक से नहीं समझा और अब हम पर सारा आरोप डाला जा रहा है, जो सही नहीं है। बता दूं कि गलगोटिया के रोबो डॉग को दिखाकर एनडीटीवी और दूरदर्शन ने बाकायदा रिपोर्टिंग की थी। हालांकि दूरदर्शन से अब वो वीडियो डिलीट किया जा चुका है। इस शिक्षिका का कहना है कि इस रायते के फैलने के लिए कोई एक जिम्मेदार नहीं है। यानी वो केवल विश्वविद्यालय की नहीं, मीडिया और सरकार की भी गलती बता रही हैं। अब देखना होगा कि जिन चैनलों ने गलगोटिया के रोबो बनाने की खबरें चलाई थीं और इंटरव्यू लिए थे, वो अब इस आरोप पर प्रतिक्रिया देते हैं या नहीं, क्योंकि यहां सीधे-सीधे पत्रकारों की समझ पर सवाल उठाए गए हैं कि हमने तो कुछ और बताया था लेकिन आपने कुछ और समझ लिया। साथ ही शब्दों के चयन की जो नसीहत दी गई है क्या स्वाभिमानी पत्रकार उसे सुनकर चुप रहेंगे, ये भी देखना होगा।

वैसे इस सारे प्रकरण से एक बात और जाहिर हो रही है कि सरकारी विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षा संस्थानों को बर्बाद करने का नतीजा देश भुगत रहा है। आईआईटी, आईआईएम, एम्स और ऐसे ढेरों उच्च स्तरीय संस्थान, जो नेहरूजी के काल में शुरु हुए या उनकी सोच को आगे बढ़ाते हुए आगे खोले गए, उन सब को सहेजने की कितनी सख्त जरूरत है। इस समिट में हिस्सा लेने के लिए फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों भी आए हुए हैं। और उन्होंने कम से कम सात भारतीयों की प्रशंसा की, जो वैश्विक स्तर पर अपनी तकनीकी और प्रबंधन क्षमता का लोहा मनवा चुके हैं। इनमें सुंदर पिचाई, अरविंद कृष्णा और निकेश अरोरा ने भारतीय आयकर संस्थानों (आईआईटी) में शिक्षा प्राप्त की। सत्या नडेला ने मणिपाल प्रौद्योगिकी संस्थान में अध्ययन किया, जिसकी स्थापना इंदिरा गांधी मंत्रिमंडल में रेल, भारी उद्योग और इस्पात एवं खान मंत्री रहे टी. ए. पाई के परिवार ने की थी। शांतनु नारायण ने उस्मानिया विश्वविद्यालय में अध्ययन किया, जिसकी स्थापना 1918 में हैदराबाद के पूर्व निज़ाम मीर उस्मान अली खान ने की थी। लीना नायर ने वालचंद इंजीनियरिंग महाविद्यालय में अध्ययन किया, जिसकी स्थापना 1947 में हुई थी और जिसे दशकों तक कांग्रेस की निरंतर सरकारों द्वारा संचालित किया गया। मैक्रों द्वारा प्रशंसित एक और भारतीय वसंत नरसिम्हन ही केवल अकेले हैं, जिन्होंने अपनी पूरी शिक्षा विदेश में पूरी की।

हाथ कंगन को आरसी क्या, मोदी समेत भाजपा से जुड़े वो सब नेता जो सवाल उठाते हैं कि कांग्रेस के शासनकाल ने आखिर देश को क्या दिया, उनका जवाब शायद इमैनुअल मैक्रों ने दे दिया है। सवाल ये है कि आज से 20-25 साल बाद ऐसे कितने होनहारों का नाम लिया जा सकेगा, जिन्होंने मोदी सरकार द्वारा शुरु किए गए शिक्षण संस्थानों में शिक्षा हासिल की होगी। क्योंकि अभी तो जो है उसे मिटाया जा रहा है और नया कुछ बन नहीं रहा है। बीते बरसों में सरकारी स्कूल, कॉलेज, यूनिवर्सिटीज़ को जानबूझकर बर्बाद कर शिक्षा में निजीकरण को खूब बढ़ावा मिला। नतीजा ये हुआ कि ऊंची-ऊंची फीस लेकर बच्चों को सेवन स्टार सुविधाएं तो दी जा रही हैं, लेकिन पढ़ाई का स्तर कहां पहुंचा है, ये अब नजर आ रहा है। मोदी सरकार का अतार्किक, अवैज्ञानिक और कई मौकों पर अंधविश्वासी नजरिया पहले ही देश में वैज्ञानिक चेतना को पूरी तरह दबा चुका था। नए अनुसंधान, शोधकार्य संघ की दकियानूसी सोच के चलते खत्म हो चुके हैं। सरकारी विश्वविद्यालयों को भाजपा ने अपनी राजनैतिक महत्वाकांक्षाएं पूरा करने का अड्डा बना लिया है, जिनमें धर्मांधता और जातिगत पूर्वाग्रह से संचालित लोग ऊंचे पदों पर बैठे है। दुनिया के श्रेष्ठ शिक्षण संस्थानों में तो भारत के संस्थानों का नाम आना बंद हो ही चुका है, जो थोड़ी बहुत साख बची हुई थी, वो गलगोटिया विश्वविद्यालय के इस प्रकरण ने मिट्टी में मिला दी है। राहुल गांधी ने सही लिखा है कि भारत की प्रतिभा और डेटा का लाभ उठाने के बजाय, एआई शिखर सम्मेलन एक अव्यवस्थित जनसंपर्क तमाशा बन गया है- भारतीय डेटा बिक्री के लिए पेश किया जा रहा है, चीनी उत्पादों का प्रदर्शन किया जा रहा है।

मोदी सरकार ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के मामले में भारत को वैश्विक स्तर पर हंसी का पात्र बना दिया है। वहीं शिवसेना सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने इस बारे में सरकार से एक मांग की है कि गलगोटिया विश्वविद्यालय द्वारा एआई शिखर सम्मेलन में चीनी रोबो को अपना आविष्कार बताकर प्रचार करना शर्मनाक है। चीनी मीडिया द्वारा इस पर खूब हंगामा मचाने से स्थिति और भी खराब हो गई है। अगर पवेलियन आवंटित करने से पहले कंपनियों/विश्वविद्यालयों/स्टार्टअप्स और अन्य की विश्वसनीयता की पूरी तरह से जांच की जाती तो यह सब टाला जा सकता था।

इससे भारत और शिखर सम्मेलन को भारी नुकसान हुआ है। हालांकि उन्हें अपना पवेलियन खाली करने के लिए कहना एक अच्छा कदम है, लेकिन मुझे लगता है कि उन पर कुछ सख्त दंड भी लगाया जाना चाहिए।

अब देखना होगा कि गलगोटिया यूनिवर्सिटी के साथ मोदी सरकार मामला कैसे सेट करती है, उसी से समझ आ जाएगा कि मोदी सरकार के लिए देश की प्रतिष्ठा अहम है, या चुनावों में मिलने वाला चंदा मायने रखता है।


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