दतिया का एकता मॉडल कांग्रेस दूसरे राज्यों में लागू करे
मोदी 12 साल में देश में और उनसे पहले के नेता 23 साल में जिसमें अटल और आडवानी का शासन भी रहा यह काम नहीं कर पाए हैं।

- शकील अख्तर
पूरे देश में ऐसा ही माहौल है। लोग कांग्रेस को चाहते हैं। मगर उसके नेता ही उसकी जड़ें खोदते हैं। मोदी 12 साल में देश में और उनसे पहले के नेता 23 साल में जिसमें अटल और आडवानी का शासन भी रहा यह काम नहीं कर पाए हैं। राहुल अगर अपने नेताओं पर नियंत्रण कर लें तो उनकी जीत का सिलसिला शुरू हो सकता है।
राहुल गांधी को दतिया जाना चाहिए। देखें कि किस तरह कांग्रेस के पक्ष में माहौल है। मध्य प्रदेश में 23 साल से कांग्रेस सत्ता के बाहर है। मगर फिर भी लोग कांग्रेस से जुड़े हैं। यह कांग्रेस की गहरी जड़ें हैं।
पूरे देश में ऐसा ही माहौल है। लोग कांग्रेस को चाहते हैं। मगर उसके नेता ही उसकी जड़ें खोदते हैं। मोदी 12 साल में देश में और उनसे पहले के नेता 23 साल में जिसमें अटल और आडवानी का शासन भी रहा यह काम नहीं कर पाए हैं।
राहुल अगर अपने नेताओं पर नियंत्रण कर लें तो उनकी जीत का सिलसिला शुरू हो सकता है। दतिया इसका मॉडल बन सकता है। और राहुल के विश्वासपात्र जीतू पटवारी इसके ब्रांड अम्बेसडर।
समस्या क्या है कि प्रदेश के नेता पहली बात तो राहुल का नेतृत्व नहीं मानते हैं। दूसरी बात खुद को ही इतना समर्थ ओर लोकप्रिय मान लेते हैं कि कांग्रेस से आगे खुद को रखने लगते हैं।
मध्य प्रदेश के उदाहरण से ही शुरू करते हैं। यहां 2018 का विधानसभा चुनाव कांग्रेस ने जीता था। राहुल गांधी के नेतृत्व में। राहुल उस समय कांग्रेस अध्यक्ष थे। और उन्होंने केवल मध्य प्रदेश ही नहीं जीता था। उसके साथ होने वाले छत्तीसगढ़ और राजस्थान के चुनाव भी जीते थे। और इनसे पहले 2017 में गुजरात विधानसभा में भाजपा को हार के कगार पर ला खड़ा किया था। सौ से कम सीटों पर रोक दिया था। मुकाबला कितना कांटे का ले आए थे इससे समझ लीजिए कि 182 की विधानसभा में कांग्रेस को 80 और बीजेपी को 99 सीटें मिली। 45 साल के गुजरात के इतिहास में यह कांग्रेस का बेस्ट प्रदर्शन था। पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी थे और उन्होंने गुजरात में धुआंधार चुनाव प्रचार किया था।
तो यही सिक्वेंस मध्य प्रदेश तक भी आया था। और 23 साल में यह उसकी एकमात्र जीत थी। लेकिन उस समय के प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ यह समझे कि यह उनकी व्यक्तिगत जीत है। अहंकार में तो पहले ही रहते थे और इस जीत के बाद तो उनका दिमाग सीधा आसमान में पहुंच गया। कार्यकर्ताओं को छोड़िए बड़े-बड़े नेताओं को मिलने का समय नहीं। जीत में मुख्य भूमिका निभाने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया को चैलेंज कर दिया कि जाओ सड़क पर उतर जाओ।
गंवा दी अपनी सरकार। कांग्रेस में कमलनाथ भी अपने तरीके के एक ही केस हुए हैं। 2018 विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस ने कमलनाथ को प्रदेश अध्यक्ष बनाया। जिस समय उनको अध्यक्ष बनाने की बात चल रही थी तो हमने कांग्रेस के कुछ बड़े नेताओं से पूछा कि अरुण यादव उस समय के अध्यक्ष अच्छा काम कर रहे हैं अचानक कमलनाथ को अध्यक्ष बनाने की बात कैसे?
जो जवाब हमें मिला वह भारी हैरान कर देने वाला था। बताया गया कि वे पैसा खर्च करेंगे। कांग्रेस जैसी पार्टी में प्रदेश अध्यक्ष का निर्धारण इस बात पर कि वे पैसा खर्च करेंगे बहुत ही अनोखी बात थी। मगर उसके बाद उन्हें अध्यक्ष के साथ मुख्यमंत्री का चेहरा भी बताना और भी ज्यादा आश्चर्यजनक था। कांग्रेस में पहले से किसी को मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित नहीं किया जाता है।
खैर कमलनाथ की कथा अनंत है। उन्होंने कांग्रेस का बहुत नुकसान किया। लेकिन उनके बाद आने वाले प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी ने कांग्रेस की मजबूत जड़ें उसके कार्यकर्ता हैं इसको पहचाना और उन्हें मजबूत करने और हिम्मत भरने का काम शुरू किया।
दतिया इसकी मिसाल है। वे यहां पहले तो कांग्रेस के प्रत्याशी धनश्याम सिंह का नामांकन भरवाने आए और उसके बाद फिर वापस आकर गांव-गांव के दौरे किए। इसमें सबसे ज्यादा चर्चा में उनके पांच पंजे छा गए।
कार्यकर्ताओं के साथ जनता में हौसला भरने के लिए उन्होंने सार्वजनिक मंच से अपना फोन नंबर बताते हुए कहा कि कोई डराए-धमकाए, परेशान करे तो यह नंबर नोट कर लो। मुझे फौरन फोन करना। उन्होंने अपना नंबर बताते हुए कहा कि यह यह और यह और फिर पांच पंजे। मतलब पांच बार फाइव।
दतिया में यह पांच पंजे चर्चा का विषय बन गए। कार्यकर्ताओं के साथ जनता के लोग भी एक दूसरे से पूछकर और उस सभा का वीडियो देखकर सही नंबर सेव कर रहे हैं। कार्यकर्ता जनता में हौसला ऐसे ही बनता है। चुनाव का माहौल खड़ा हो गया।
कांग्रेस के हर राज्य में आपसी फूट और गुटबाजी है। हरियाणा, राजस्थान में इसकी वजह से चुनाव हारे। पंजाब, उत्तराखंड में अभी हैं। छह महीने के अंदर। लेकिन दोनों जगह गुटबाजी ने कार्यकर्ताओं को निराश कर रखा है।
दोनों कांग्रेस की संभावनाओं वाले राज्य माने जा रहे हैं। लेकिन गुटबाजी कांग्रेस की जड़ें खोद रही है।
राहुल को इसलिए दतिया का दौरा करके देखना चाहिए कि वहां किस तरह प्रदेश नेतृत्व ने स्थितियों को नियंत्रण में लिया है। और जीत का माहौल खड़ा किया है।
प्रत्याशी की घोषणा के बाद यहां कांग्रेस में दूसरे टिकट के उम्मीदवारों में नाराजगी थी। मगर कांग्रेस में ऐसा कम होता है कि टिकट के दावेदार सभी बाद में अधिकृत प्रत्याशी के पक्ष में काम करने लगें। जीतू पटवारी ने यह कारनामा किया।
इसके बरअक्स भाजपा में भारी फूट दिखाई दे रही है। यहां नरोत्तम मिश्रा का टिकट काट कर आरएसएस के एक प्रचारक आशुतोष तिवारी को टिकट दिया है। दतिया में यह दूसरा मौका है जब भाजपा ने इस तरह का प्रयोग किया हो।
पहला तो असफल साबित हुआ था। 1977 विधानसभा में जनता पार्टी ने कई प्रमुख दावेदारों को नजरअंदाज करके एक अनाम आरएसएस के प्रचारक हरिहर निवास श्रीवास्तव को टिकट दिया था। और वे उस समय के कांग्रेस प्रत्याशी अभी जिन राजेन्द्र भारती की विधायकी रद्द हो जाने के बाद यह उपचुनाव हो रहा है उनके पिता श्यामसुंदर श्याम से हारे थे। और बाद में हरिहर कांग्रेस में भी आ गए थे।
अब यह दूसरा प्रयोग है जब आशुतोष को जिनकी कोई राजनीतिक पहचान नहीं है उन्हें नरोत्तम जैसे भारी नेता के बदले चुनाव मैदान में उतारा गया है। उनकी जीत की संभावनाएं क्या हैं?
खुद नरोत्तम ने कहा कि अगर भाजपा के कार्यकर्ता लग गए तो? मतलब भाजपा के कार्यकर्ताओं के उनके पक्ष में लगने पर सवाल है।
भाजपा के कार्यकर्ता नरोत्तम के पक्ष में जिस तरह खुल कर सामने आए थे उसने तो इतिहास बना दिया। भाजपा में आज तक ऐसा नहीं हुआ कि जिला अध्यक्ष सहित पूरी कार्यकारिणी और पंचायतों, नगरपालिका सबके अध्यक्षों ने पार्टी से ही इस्तीफा दे दिया हो।
भाजपा पूरी तरह बंटी हुई है। मुख्यमंत्री मोहन यादव के लिए बड़ी खतरे की घंटी। इससे पहले एक विधानसभा उपचुनाव उनके मुख्यमंत्री बनने के बाद भाजपा हार चुकी है। विजयपुर। इसी ग्वालियर चंबल संभाग में है जहां दतिया है। वहां मोहन यादव के मंत्री हारे थे। इसलिए दतिया उपचुनाव मोहन यादव के लिए प्रतिष्ठा का सवाल बन गया है।
फिलहाल नतीजा कुछ भी हो यादव को हटाया नहीं जाएगा। क्योंकि छह महीने से कम समय में उत्तरप्रदेश में चुनाव है। यहां मोहन यादव को हटाने का असर वहां यादवों पर जाएगा। उत्तर प्रदेश में भाजपा अखिलेश यादव को कमजोर करने के लिए यादव वोटों पर खास जोर लगाए हुए है और इस समय यादव नेता के नाम पर उसके पास मोहन यादव ही सबसे बड़े नेता हैं।
राहुल को दतिया अपने साथ अखिलेश यादव को भी लाना चाहिए। यहां यादव वोट काफी बड़ी तादाद में हैं। अखिलेश के आने से बड़ा फर्क पड़ेगा साथ ही दतिया बिल्कुल यूपी से लगा हुआ है। यहां की जीत वहां असर डालेगी।
राहुल को एक स्टडी केस की तरह दतिया को लेना चाहिए और इस कांग्रेस एकता के मॉडल को पूरे देश में लागू करना चाहिए।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार है)


