Top
Begin typing your search above and press return to search.

पिंजड़ों को तोड़ना ही होगा

राहुल गांधी की एक महत्वपूर्ण पहल को केवल राजनैतिक खांचे में फिट करके उसे खराब करने की कोशिश भाजपा कर रही है।

पिंजड़ों को तोड़ना ही होगा
X

राहुल गांधी की एक महत्वपूर्ण पहल को केवल राजनैतिक खांचे में फिट करके उसे खराब करने की कोशिश भाजपा कर रही है। महिला आरक्षण विधेयक संसद में 2023 में कांग्रेस समेत तमाम दलों के समर्थन से पारित हो चुका है, जिसे आज तक मोदी सरकार ने लागू नहीं किया है। और मनुस्मृति की ज्यादातर बातें महिला विरोधी हैं, यह भी जगजाहिर है।

22 अगस्त को राहुल गांधी ने पुणे में छात्रों की गूंज कार्यक्रम किया, जो आजाद भारत में एक ऐतिहासिक घटना के तौर पर दर्ज हो चुका है। अमूमन महिला सशक्तीकरण और महिला अधिकारों पर बड़े मंचों से बात करने के लिए आठ मार्च का इंतजार किया जाता है। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर घिसे-पिटे जुमलों और भाषणों की बाढ़ आ जाती है। ये 21वीं सदी है, जिसमें महिलाएं पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर चल रही हैं, ऐसे वाक्यों से भाषणों या लेखों की शुरुआत होती है, और आगे बताया जाता है कि जीवन के तमाम क्षेत्रों में महिलाओं ने कामयाबी का परचम गाड़ा है। हालांकि इसमें एक बड़ी भूल की तरफ ध्यान नहीं दिया जाता कि कामयाबी और समानता दोनों शब्दों के अर्थ अलग-अलग हैं। महिलाएं पुरुषों की तरह कई क्षेत्रों में कामयाब हो सकती हैं, लेकिन क्या उन्हें घर और बाहर हर जगह बराबरी है, इसी सवाल का जवाब समाज को देना है, जो आज तक अनुत्तरित है। अक्सर इस सवाल के जवाब में यही कहा जाता है कि महिलाओं के लिए अब कई बंधन खत्म किए गए हैं, कानून ने उन्हें ये दिया है, वो दिया है। मगर बात वही है कि महिलाओं को ये सब देने की जरूरत क्यों पड़ी। इसलिए पड़ी क्योंकि पहले जो कुछ उनके पास था, यानी समान अधिकार वो समाज ने ही छीने। और अब खुद को उदार होने का दिखावा करते हुए महिलाओं को देने का तथाकथित बड़प्पन दिखाया जा रहा है।

लैंगिक समानता के इसी ढकोसले पर राहुल गांधी ने पुणे में प्रहार किया, जब उन्होंने मनुस्मृति में लिखी बातों का विरोध किया। लड़कियों से कहा कि उनका अपने पिता, पति और बेटे से रिश्ता है, लेकिन वो उनकी जागीर नहीं हैं। राहुल गांधी की इस बात का विरोध करने के लिए भाजपा के तमाम नेता अब मनुस्मृति की बाकी बातों को निकाल कर सामने ला रहे हैं कि इसमें ये अच्छी बात है, वो अच्छी बात है। जो ऐसा नहीं कर पा रहे, वो राहुल से सवाल कर रहे हैं कि आप महिला समानता की बात करते हैं तो महिला आरक्षण विधेयक पारित करने में मोदी सरकार का साथ क्यों नहीं देते।

जाहिर है राहुल गांधी की एक महत्वपूर्ण पहल को केवल राजनैतिक खांचे में फिट करके उसे खराब करने की कोशिश भाजपा कर रही है। महिला आरक्षण विधेयक संसद में 2023 में कांग्रेस समेत तमाम दलों के समर्थन से पारित हो चुका है, जिसे आज तक मोदी सरकार ने लागू नहीं किया है। और मनुस्मृति की ज्यादातर बातें महिला विरोधी हैं, यह भी जगजाहिर है। असल बात यह है कि सस्ती राजनीति के लिए राहुल गांधी का विरोध किया जा रहा है, जिसमें नुकसान कांग्रेस या राहुल गांधी का नहीं समाज का हो रहा है। क्योंकि लैंगिक असमानता राजनीति से पहले समाज की समस्या है। इसका ताजा उदाहरण आभूषण बनाने वाली कंपनी जीवा के रक्षाबंधन के लिए बनाए विज्ञापन में देखने मिला। इस विज्ञापन को विवादों के बाद कंपनी ने हटा लिया है। दरअसल इसमें अभिनेत्री कृति सेनन को उनके कपड़ों के कारण ट्रोल किया जा रहा था। उन्होंने बिना बांहों वाला टॉप पहना था और इसमें उनके भाई को राखी बांधने के दौरान उनका पालतू कुत्ता भी नजर आया। इन्हीं सब पर संस्कृति के ठेकेदारों की भावनाएं आहत हो गईं। जीव मात्र पर दया और प्रेम रखने की भारतीय परंपरा चली आई है, हिंदू धर्म के कई भगवानों के वाहन पशु हैं, लेकिन अगर त्योहार से जुड़े विज्ञापन में पालतू कुत्ता नजर आया तो इसे अपमान माना गया। जहां तक अभिनेत्री के कपड़ों की बात है, तो ऐसे कपड़े टीवी धारावाहिकों और फिल्मों से लेकर आम समाज तक पहने जाते हैं। इसमें कुछ भी आपत्तिजनक नहीं है। जिन्हें लड़कियों के कपड़ों में खोट नजर आता है, असल में खोट उनकी अपनी नजरों और नजरिए का होता है। लेकिन शुरु से रवायत यही चली आई है कि लड़की को ही कटघरे में खड़ा करना है, तो जाहिर तौर पर कृति सेनन का विरोध होने लगा। जिसके बाद कंपनी ने विज्ञापन हटाते हुए लिखा- 'हम भारतीय संस्कृति, परंपराओं और त्योहारों का बहुत सम्मान करते हैं। एक ब्रांड के तौर पर, हम हमेशा पूरे परिवार के साथ इन खुशियों भरे पलों को मनाने में विश्वास रखते हैं और इस बार हम अपने पालतू जानवरों तक भी यह प्यार और जश्न पहुंचाना चाहते थे। अगर हमारे हालिया विज्ञापन से अनजाने में समाज के कुछ वर्गों की भावनाएं आहत हुई हैं, तो हमारा ऐसा कोई इरादा बिल्कुल नहीं था। सम्मान के तौर पर, हमने उस विज्ञापन को सभी मीडिया प्लेटफॉर्म से हटा लिया है। इस त्योहार के मौसम में आप सभी को ढेर सारा प्यार और पॉजिटिविटी मिले।'

कंपनी को कारोबार करना है, लिहाजा विवाद से उन्होंने जल्द पीछा छुड़ाना बेहतर समझा। लेकिन इस पूरे प्रकरण में वही पिंजड़ा खड़ा हुआ दिखाई दिया, जिसे राहुल गांधी ने तोड़ने का आह्वान पुणे से किया था। ऐसा नहीं है कि राहुल गांधी ने केवल एक कार्यक्रम में अपनी बात कही और फिर उस मुद्दे को वहीं छोड़ दिया। बल्कि सच्चे नारीवादी होने का परिचय देते हुए राहुल गांधी कृति सेनन के साथ खड़े हुए। दरअसल भाजपा सांसद और अभिनेत्री कंगना रानौत ने एक पोस्ट में कृति सेनन को घेरते हुए लिखा था कि 'हमारी अलमारियां तरह-तरह के कपड़ों से भरी हैं, आज की महिला ग्लोबल महिला है। कॉकटेल ड्रेस से लेकर लहंगा-चोली, जींस से लेकर साड़ी, बिकिनी से लेकर सलवार-कमीज तक, आज हमारे पास इतने सारे विकल्प हैं, तो फिर आप बिकिनी/अधोवस्त्र पहनकर अपने भाई को राखी क्यों बांधेंगी? आपके स्टाइलिंग ऑप्शन कहां गए? यह विज्ञापन जानबूझ कर अजीब और डरावना लगता है!'

ऐसा नहीं है कि कंगना रानौत केवल साड़ी या सलवार कुर्ते ही पहनती हैं। वे भी अभिनेत्री हैं और अपनी फिल्मों से लेकर अवार्ड समारोहों तक उन्होंने कई मौकों पर ऐसे कपड़े पहने हैं, जिनमें शरीर का बड़ा हिस्सा खुला दिखाई देता है। मगर अब अपनी पार्टी भाजपा की तर्ज पर उन्हें तथाकथित हिंदुत्व की संस्कृति का बचाव करना है, तो संकुचित मानसिकता के लोगों की तरह उन्होंने भी कृति सेनन का विरोध किया। जबकि कायदे से उन्हें नैतिक बल दिखाते हुए कृति सेनन का साथ देना चाहिए था। क्योंकि यहां मामला केवल कपड़ों का नहीं, एक लड़की की अपनी मर्जी का है। कृति सेनन ने तो अपने बचाव में लिखा कि 'त्योहारों का असली मतलब आपके पहने हुए कपड़ों में नहीं, बल्कि परंपराओं के प्रति आपकी भावनाओं और उनके महत्व में होता है। रक्षाबंधन सुरक्षा का बंधन है। मैं और मेरी बहन एक-दूसरे को राखी बांधते हैं। हम जानते हैं कि हम एक-दूसरे की सुरक्षा वैसे ही कर सकते हैं जैसे कोई भाई करता। हम एक-दूसरे की सेहत, खुशी और लंबी उम्र के लिए प्रार्थना करते हैं। हम यह प्रार्थना और वादा हमारे डॉग्स के लिए भी करते हैं! आखिर, वे भी तो परिवार का हिस्सा हैं! साथ ही, हम महिलाओं को यह बताना कब बंद करेंगे कि उन्हें क्या पहनना चाहिए? एथनिक फैशन में समय के साथ काफी बदलाव आया है, लेकिन आज भी किसी महिला के अपनी संस्कृति के प्रति सम्मान को सिर्फ उसके कपड़ों से ही आंका जाता है!! संस्कृति और परंपराएं उसके दिल में होती हैं, न कि उसके कपड़ों की नेकलाइन में!'

और उनके समर्थन में राहुल गांधी ने लिखा- 'एक महिला क्या पहनती है, क्या करती है और कहां जाती है, यह उसकी मर्जी है। महिलाओं को उनकी आजादी का इस्तेमाल करने के लिए ट्रोल करना बंद करिए। इसके बाद उन्होंने स्मैश द पैट्रियार्की यानी पितृसत्तात्मकता को खत्म करो का आह्वान किया। हालांकि इसके बाद राहुल गांधी पर कंगना रानौत ने फिर हमला करके बता दिया कि उन्हें महिलाओं की आजादी से ज्यादा सत्ता की जी हुजूरी मंजूर है।

बहरहाल, रक्षाबंधन जैसे खूबसूरत त्योहार पर एक विज्ञापन को लेकर अनावश्यक कड़वाहट पैदा करने की कोशिश धर्म और संस्कृति के जबरिया ठेकेदारों ने की है। पहले भी कभी होली, कभी दीवाली पर हिंदू-मुस्लिम एकता वाले विज्ञापन बने, तो उसमें भी ऐसे ही ट्रोलिंग शुरु हो गई। ऐसी सारी घटनाएं समाज के पतन की गवाह बन रही हैं। क्योंकि इनमें हिंदुस्तान की सदियों से पहचान रही स्वतंत्रचेता को नकार कर उसे कुंठित और संकुचित समाज में बदलने की कोशिश दिखाई दी है। ऐसी कोशिशों को रोकने के लिए पिंजड़ों को तोड़ना ही पड़ेगा।


Next Story

Related Stories

All Rights Reserved. Copyright @2019
Share it