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नेपाल में वाद का बोझ घटा है, समस्याओं का नहीं

नेपाल चुनाव और उसके नतीजों की व्याख्या कई तरह से की जा रही है। यह स्वाभाविक है

नेपाल में वाद का बोझ घटा है, समस्याओं का नहीं
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ऐसे बड़े और साफ जनादेश के बाद बालेंदु शाह के लिए तात्कालिक राजनैतिक चुनौतियां तो कम होंगी लेकिन उनको वापस लौटने में देर नहीं लगती। जिस तरह लोगों ने पुरानी राजनीति को ठुकराया है वैसा ही बदलाव एक अन्य मामले में दिखता है। के पी ओली और उनकी पार्टी की हार उनकी मौकापरस्त राजनीति के साथ नेपाल की राजनीति में चीनी दखल की कूटनीति को नकारना भी है।

नेपाल चुनाव और उसके नतीजों की व्याख्या कई तरह से की जा रही है। यह स्वाभाविक है। लेकिन चुनाव की प्रक्रिया के दौरान वहां जो कुछ दिखा उसकी चर्चा कम हुई। चुनाव घोषणा होते ही हर बड़े दल में उठापटक हुई और कई टूट-फूट तथा विलय भी देखने में आये। कई दलों ने अपने 'अराध्य' का नाम लेना पाप समझा तो नेपाली कांग्रेस ने नेपाल के जेन जी आंदोलन और मुख्य ताकत बनाकर उभर रही राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी को देखते हुए नया नेता चुना। तब भी पार्टी चारों खाने चित्त हुई। हर दल नौजवानों को आगे करने का प्रयास जरूर किया लेकिन स्थापित पुराना नेतृत्व नतीजों के पहले मैदान छोड़ने को तैयार न था। 'न था' कहना शायद गलती है इसे 'नहीं है' कहना चाहिए। जिस समानुपातिक प्रणाली से नेपाल संसद का एक बड़ा हिस्सा भरने की विलक्षण व्यवस्था की गई है उसके लिए पार्टियों के नामांकन की सूची चुनाव उम्मीदवार चुनने से पहले बनी। और उसे बनाने के क्रम में ही असली झगड़े हुए और आप पाएंगे कि इतने साफ जनादेश के बावजूद जब इस व्यवस्था वाले सांसद आएंगे तो काफी पिटे पिटाए चेहरे दिखने में आएंगे। नेपाल कांग्रेस की आंतरिक लड़ाई पार्ट दो शुरू होगी और संभव है बुरी तरह पिटकर कम्युनिष्ट पार्टियां भी एकजुट होने की कोशिश करें।

लेकिन नेपाल के लोगों ने जितना साफ जनादेश दिया है उसे समझने की जरूरत है और वह पूरी पुरानी राजनीति को लगभग सीधे नकारने जैसा है। कौन-कौन पूर्व प्रधानमंत्री चुनाव में हारा और किसने चुनाव लड़ने की हिम्मत न की यह सूची पर्याप्त बड़ी है। लेकिन इतना कहने में हर्ज नहीं है कि नेपाली मतदाता ने सारे 'वादों' अर्थात विचारधारा का नाम लेकर राजनैतिक नौटंकी करने वालों को ठुकराया है। इसमें कम्युनिष्ट खेमे के की दल तो हैं ही, दक्षिणपंथी और राजा समर्थक दल भी हैं। एक पार्टी तो सीधे राजतन्त्र की वापसी के नाम पर इस लोकतान्त्रिक प्रक्रिया में हिस्सा ले रही थी। एक सीधे चीन समर्थक पार्टी थी। ज्यादा दिलचस्प मामला मधेश और पहाड़ या किसी जाति और क्षेत्र का नाम लेकर राजनीति करने वालों की दुर्गति भी रही। खुद बालन शाह के मैथिली बयान या मधेशी होने का सवाल भी उठाया गया लेकिन लगता नहीं कि मतदाता इन बातों से किसी भी तरह प्रभावित हुआ। राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी को दो तिहाई बहुमत का मतलब बहुत बड़ा है और वह नए कानून बनाने से लेकर इस पर्वतीय राष्ट्र की किस्मत बनाने- बिगाड़ने के लिए कोई भी कदम उठा सकती है। पर उसकी अपनी राजनीति भी है और प्रधानमंत्री बनने जा रहे बालेंदु उर्फ बालेन शाह और पार्टी अध्यक्ष रबी लामछिने के बीच भी दोस्ती चुनाव के पहले ही हुई है। लामछिने के खिलाफ कई गंभीर आरोप भी हैं।

35 साल के बालेंदु शाह ने अभी तक पर्याप्त समझदारी दिखाई है लेकिन काठमांडू शहर के शासन और नेपाल के शासन में फरक है। उम्मीद करनी चाहिए कि उनका उत्साह और नई ऊर्जा इस जवाबदेही को बहुत बढ़िया ढंग से पूरा करने में मदद देगी। चुनावी वायदों का पिटारा काफी बड़ा यही लेकिन आंख से दिखती मुश्किलों का पहाड़ वास्तविक पहाड़ों से कम ऊंचा नहीं है। बालेंदु शाह के साथ किसी वाद का तमगा नहीं है ना ही उन्होंने इस तरह के 'फार्मूले' वाले ज्यादा वायदे किए हैं। लेकिन वे विचारधारा से मुक्त होंगे और स्वतंत्र पार्टी का मतलब किसी किस्म की मूल्यगत निष्ठा से स्वतंत्र होना नहीं है। बेरोगजारी, गरीबी, प्राकृतिक संसाधनों का कुप्रबंध या लूट, भारत और चीन जैसे दो बड़े पड़ोसी देशों के बीच संतुलन साधते हुए आगे बढ़ने की चुनौती और लोकतान्त्रिक व्यवस्था में ही दिखी कमजोरियों को दुरुस्त करने का काम इतना बड़ा है कि इन पड़ोसियों से किसी किस्म की होड़ लेने या दांव-पेंच दिखाने की फुरसत नहीं होगी। अभी तक लोकतान्त्रिक व्यवस्था से चुने गए अधिकांश सरकारों ने नेपाल की खास भौगोलिक अवस्थिति का लाभ अपने स्वार्थ साधने में किया।

इस बार नेपाली राजनीति के तीन सूरमा, के पी ओली, शेर बहादुर देउबा और प्रचंड एकदम हाशिये पर आ गए हैं-देउबा जी को तो उनकी पार्टी नेपाली कांग्रेस के नए नेताओं ने ही घर बैठा दिया तो ओली की बुरी तरह पराजय हुई है। प्रचंड जरूर चुनाव जीते हैं लेकिन उनकी पार्टी दूसरे स्थान पर भी नहीं रह पाई। यह जगह गिरते-पड़ते नेपाल कांग्रेस को ही मिली है। फिर बाबूराम भट्टराई जैसे पूर्व सहयोगी के अलग दल बनाने से भी प्रचंड की पार्टी कमजोर हुई है। संभव है सारी कम्युनिस्ट पार्टियां फिर से एकजुटता का स्वर बुलंद करें लेकिन दुनिया में साम्यवाद की हालत और नेपाल में कम्युनिस्ट नेताओं द्वारा सत्ता संभालने का बुरा अनुभव लोगों को उन पर फिर विश्वास का मौका देगा यह कहना जल्दबाजी होगी। गगन थापा और शेर बहादुर देउबा की लड़ाई से नेपाल कांग्रेस बंटी पड़ी है लेकिन जब समानुपातिक प्रणाली से सीटें भरने का अवसर आएगा तब देउबा फिर ताकतवर होंगे क्योंकि चुनाव आयोग को नाम भेजने का काम उनके समय ही हुआ है। अब चुनावी धुलाई के बाद जल्दी से राजशाही समर्थक पार्टी या अनेक नामधारी लेकिन अलग-अलग जातीय प्रभाव वाले मधेशी दलों में भी कितना टिक पाएंगे यह देखने की चीज होगी।

ऐसे बड़े और साफ जनादेश के बाद बालेंदु शाह के लिए तात्कालिक राजनैतिक चुनौतियां तो कम होंगी लेकिन उनको वापस लौटने में देर नहीं लगती। जिस तरह लोगों ने पुरानी राजनीति को ठुकराया है वैसा ही बदलाव एक अन्य मामले में दिखता है। के पी ओली और उनकी पार्टी की हार उनकी मौकापरस्त राजनीति के साथ नेपाल की राजनीति में चीनी दखल की कूटनीति को नकारना भी है। सौभाग्य से इस बार भारत की तरफ से या किसी भारतीय दल की तरफ से कोई ज्यादा नुकसानदेह बयानबाजी या बकवास नहीं किया गया। बालन शाह का एकाध भारत विरोधी बयान चलाने की कोशिश हुई तो यह तथ्य आने में देर नहीं हुई कि वह किसी और चीज/गलती की प्रतिक्रिया थी। नए आदमी के लिए राजनयन भी कोरे पन्ने के साथ शुरू हो तो अच्छा रहता है। लेकिन मुख्य मसला देसी ही रहने वाला है क्योंकि नेपाल के पास अपनी समस्याओं की कमी नहीं है और समस्याओं में असली समस्या नेताओं और जिम्मेवार लोगों का भ्रष्टाचार या भाई भतीजावाद की रही है। लोकतंत्र आने के बाद से गिनती के नेताओं का आचरण ही शक-शुबहे से ऊपर रहा है और उनकी चलने नहीं दी गई। इस बार जनता ने ऐसे सारे झमेले किनारे कर के बालेंदु शाह को सत्ता सौंपी है। सितंबर में हुई बगावत अपनी समस्याओं के साथ नेताओं के आचरण के खिलाफ थी, इस बात को शाह से बढ़िया कौन जानता है?


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