भाजपा अब हर चुनाव बंगाल की तर्ज पर ही लड़ेगी
पांच राज्यों के चुनाव नतीजों में अगर तमिलनाडु को छोड़ दें तो कोई भी नतीजा चौंकाने वाला नहीं है।

अनिल जैन
पश्चिम बंगाल में एसआईआर के साथ-साथ चुनाव की घोषणा के तुरंत बाद बड़े पैमाने पर राज्य भर में अर्द्धसैनिक बलों और मनचाहे प्रशासनिक अफसरों की तैनाती का प्रयोग भी किया गया, जो भाजपा की जीत में कारगर रहा। यह सही है कि बंगाल में 15 साल से सत्ता पर काबिज ममता बनर्जी को स्वाभाविक रूप से एंटी इंकम्बेंसी का सामना भी करना पड़ रहा था।
पांच राज्यों के चुनाव नतीजों में अगर तमिलनाडु को छोड़ दें तो कोई भी नतीजा चौंकाने वाला नहीं है। इन पांच में से दो राज्य तमिलनाडु और केरल ही ऐसे थे, जहां भारतीय जनता पार्टी कहीं मुकाबले में नहीं थी। बाकी तीन राज्यों- पश्चिम बंगाल, असम और पुड्डुचेरी के चुनावी नतीजे वैसे ही आए हैं जैसे भाजपा चाहती थी। यह मानने में किसी को भी किसी तरह का संदेह नहीं होना चाहिए कि आगे भी जहां-जहां चुनाव होने हैं, वहां भाजपा जैसे चाहेगी वैसे ही नतीजे आएंगे।
वैसे तो 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद सिर्फ हरियाणा और महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के नतीजे ही आम लोगों को चौंकाने वाले रहे, क्योंकि इन दोनों राज्यों में लोकसभा चुनाव में भाजपा को करारी हार का सामना करना पड़ा था लेकिन कुछ ही महीनों बाद वहां हुए विधानसभा चुनावों में भाजपा और उसके सहयोगी दलों ने भारी भरकम जीत हासिल की। उसके बाद 2025 में दिल्ली और बिहार विधानसभा के चुनाव उसने बहुत आसानी से जीत लिए।
दरअसल 2024 के लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनकी पार्टी का 400 सीटें जीतने का सपना ध्वस्त होने और 240 पर ही अटक जाने के बाद मोदी और अमित शाह उस नतीजे से मायूस होकर चुप नहीं बैठ गए थे। असल में वे अपने को मिली 240 सीटों की हकीकत से भी अच्छी तरह से वाकि़फ थे। उन्हें अहसास था कि इन 240 में भी 70 से ज्यादा सीटें ऐसी हैं जो चुनाव आयोग और चुुनाव कार्य में लगे वफादार प्रशासनिक अधिकारियों की तिकड़मों से मिली हैं। खुद मोदी भी वाराणसी में जैसे-तैसे जीत पाए थे। वे 2019 में पौने पांच लाख वोटों से जीते थे लेकिन 2024 में उनकी जीत का अंतर महज डेढ़ लाख वोटों पर सिमट गया।
इस पूरी स्थिति से सतर्क होकर मोदी और शाह छोटे-छोटे दलों की समर्थन रूपी बैसाखियों के सहारे तीसरी बार सरकार बनाने के बाद यह सुनिश्चित करने में जुट गए कि आगे से ऐसा कोई नतीजा लोकसभा या किसी भी राज्य के विधानसभा चुनाव में दोबारा न आए। चुनाव आयोग, प्रवर्तन निदेशालय यानी ईडी, सीबीआई, कॉरपोरेट नियंत्रित मीडिया सहित पूरा तंत्र तो पूरी आक्रामकता और निर्लज्जता के साथ उनकी सेवा में जुटा ही था, 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद न्यायपालिका भी पूरी तरह से इस तंत्र का हिस्सा बन गई। इस स्थिति से यह सुनिश्चित हो गया कि भाजपा अब किसी छोटे-मोटे राज्य में सिर्फ वहीं हारेगी, जहां वह खुद हारना चाहेगी।
चुनाव जीतने की बहुआयामी योजना बनी, जिसके तहत चुनाव वाले राज्य में चुनाव से ठीक पहले जनहितैषी योजनाओं के नाम महिलाओं, युवाओं और बुजुर्गों के खाते में सरकारी खजाने से नकद राशि ट्रांसफर करने की योजनाएं घोषित करने और उनकी किस्तें चुनाव के दौरान भी जारी करने का काम शुरू हुआ। आदर्श चुनाव आचार संहिता के खिलाफ़ इस काम पर चुनाव आयोग और न्यायपालिका ने रोक लगाने से इनकार कर दिया। जहां भाजपा सत्ता में नहीं थी वहां उसने ऐसी योजनाएं शुरू करने का वादा किया। यह योजना हरियाणा और महाराष्ट्र के बाद दिल्ली और बिहार में भी कारगर रही। यह और बात है कि दिसल्ली में ऐसी किसी योजना पर अभी तक अमल नहीं हुआ है।
नकदी ट्रांसफर के अलावा जीत सुनिश्चित करने के लिए चुनाव आयोग के माध्यम से मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर के नाम पर एक नई योजना भी शुरू की गई, जिसकी शुरूआत दिल्ली से हुई और बाद में बिहार में भी लागू की गई। दोनों राज्यों में एसआईआर के नाम पर मनमाने तरीके से लक्षित लोगों के नाम मतदाता सूचियों से हटाए गए। इससे दोनों राज्यों भाजपा और उसके सहयोगी दलों को आसानी से जीत हासिल हो गई। दिल्ली और बिहार में एसआईआर के हथियार को अभी चुनाव हुए पांच राज्यों सहित नौ राज्यों में भी लागू किया गया और सभी जगह चुनाव आयोग ने मनमाने तरीके से लाखों लोगों के नाम मतदाता सूचियों से हटा दिए।
पश्चिम बंगाल में एसआईआर के साथ-साथ चुनाव की घोषणा के तुरंत बाद बड़े पैमाने पर राज्य भर में अर्द्धसैनिक बलों और मनचाहे प्रशासनिक अफसरों की तैनाती का प्रयोग भी किया गया, जो भाजपा की जीत में कारगर रहा। यह सही है कि बंगाल में 15 साल से सत्ता पर काबिज ममता बनर्जी को स्वाभाविक रूप से एंटी इंकम्बेंसी का सामना भी करना पड़ रहा था, लेकिन एसआईआर की विवादास्पद प्रक्रिया से ममता बनर्जी की पार्टी के लिए मुकाबले का धरातल बेहद असमान हो गया।
बंगाल में एसआईआर के नाम पर 90 लाख से ज्यादा मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से हटा दिए गए। इन 90 लाख में से 32 लाख से ज्यादा तो ऐसे रहे जिनके पास सभी आवश्यक दस्तावेज भी थे लेकिन चुनाव आयोग ने 'तार्किक विसंगतिÓ के नाम पर उनके नाम काट दिए। मामला सुप्रीम कोर्ट में गया तो वहां से भी बेहद चलताऊ जवाब मिला कि, 'क्या हुआ अगर इस चुनाव में नाम कट गया तो?भविष्य में जुड़ जाएगा।Ó 32 लाख से ज्यादा लोगों के नाम काटे जाने का मतलब औसतन प्रति विधानसभा सीट पर करीब 17 हजार वोट कम हो जाना। एक विधानसभा सीट पर 17 हजार लक्षित वोट कम हो जाने का मतलब क्या होता है- यह आसानी से समझा जा सकता है। पूर्व जज, सेना के रिटायर्ड अफसर से लेकर समाज के कई प्रतिष्ठित लोग तक एसआईआर की चपेट में आकर अपना मताधिकार गंवा बैठे। यही नहीं, 65 ऐसे मुस्लिम सरकारी कर्मचारी जो चुनाव ड्यूटी में लगे हुए थे, उनके भी नाम मतदाता सूचियों से हटा दिये गये। अंदाजा लगाया जा सकता है कि चुनाव आयोग ने किस तरह एसआईआर की प्रक्रिया को अंजाम दिया होगा। ये सारे पहलू तृणमूल कांग्रेस पर भारी पड़े। उसकी यह उम्मीद कमज़ोर जमीन पर खड़ी नजर आई कि बांग्ला अस्मिता की प्रतिनिधि के रूप में खुद को पेश कर वह 'हिंदुत्व-हिंदीÓ की पहचान वाली भाजपा को जीतने से रोक देगी। असम में ऐसी सोच एक दशक पहले ही गलत साबित हो चुकी थी।
असम में अब भाजपा ने जीत की हैट-ट्रिक बनाई है। इस बार वह और बड़े बहुमत से सत्ता में लौटी है। यह इस समझ की पुष्टि है कि मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के नेतृत्व में उग्र हिंदुत्व और नकदी ट्रांसफर के जरिए मतदाताओं को लुभाने की रणनीति वहां कामयाब बनी हुई है। इसके अलावा राज्य में हुए विधानसभा सीटों के विवादास्पद परिसीमन का लाभ भी भाजपा को मिला है।
जहां तक तमिलनाडु की बात है, वहां करीब छह दशक बाद ऐसा हुआ है, जब द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (डीएमके) या अन्ना डीएमके के अलावा कोई पार्टी सत्ता की दावेदार बनी है। 1967 में पहली बार डीएमके सत्ता में आई थी। फिर 1972 में एमजी रामचंद्रन ने उससे अलग होकर अन्नाडीएमके का गठन किया। 1967 से 2021 तक डीएमके ने सात बार और अन्ना डीएमके ने पांच बार सरकारें बनाईं। 2026 में यह सिलसिला टूट गया है। फिल्म अभिनेता के रूप मे सफल कैरियर के बाद राजनीति में आए 51 वर्षीय चंद्रशेखरन जोसेफ विजय पहले ही दांव में अपनी पार्टी टीवीके- तमिल वेट्री कड़गम (तमिल विजय संघ) को सबसे बड़ा दल बनवाने में सफल रहे हैं। विजय ने 2024 में टीवीके का गठन किया था। वे खुद को ईवी रामास्वामी नायकर पेरियार की विरासत से जोड़ते हैं और भारतीय संविधान को अपनी 'आस्था का दस्तावे•ाÓ मानते हैं। कहा जा सकता है कि तमिलनाडु ने सिर्फ चेहरा बदला है, राजनीतिक विचारधारा नहीं। जहां तक केरल की बात है, वहां कांग्रेस नीत मोर्चे का जीतना कोई हैरानी वाली बात नहीं है। वहां वैसे भी हर चुनाव में सत्ता बदलती है। पिछली बार जरूर यह क्रम टूटा था और वाम मोर्चा ने लगातार दूसरी बार सरकार बनाई थी।
बहरहाल बंगाल और असम में भाजपा ने जिन हथकंडों के जरिये मनचाहे नतीज़े हासिल किए हैं, उनकी आड़ लेकर कांग्रेस या अन्य विपक्षी दलों को जनता से दूर रहते हुए सियासत करने की अपनी कमजोरी को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। उन्हें यह समझना होगा कि उनका मुकाबला बुलडोजर जैसी एक चुनावी मशीनरी से है, जो जीत की राह में किसी नैतिक बाधा से बंधी हुई नहीं है। अगले वर्ष सात राज्यों- उत्तर प्रदेश, गुजरात, पंजाब, उत्तराखंड, गोवा, मणिपुर और हिमाचल प्रदेश में विधानसभा के चुनाव होने हैं। इन राज्यों में भी भाजपा बंगाल और असम की तज़र् पर चुनाव लड़ेगी और उसके बाद लोकसभा का चुनाव भी उसी तरह लड़ा जाएगा। अब विपक्षी दलों को सोचना है कि वे भाजपा का मुकाबला किस तरह करेंगे या हारने के लिए चुनाव लड़ते रहेंगे।
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)


