भालू जाग गए हैं, जनता सोई पड़ी है
उत्तराखंड से एक चौंकाने वाली खबर आई है। शीतकाल में कम से कम चार महीने गुफा में जाकर शीतनिद्रा (हाइबरनेशन) में जाने वाले भालू अब सो नहीं रहे हैं

- सर्वमित्रा सुरजन
कितनी अजीब बात है कि देश में भालू जाग गए और जनता सोई पड़ी है। जनता को इस बात से कोई फर्क ही नहीं पड़ रहा है कि उसके साथ कुछ गलत हो रहा है तो वह जागे। हर वक्त, हर किसी के साथ सब कुछ सही नहीं होता। देश में पहले भी गलत होने पर जनता ने आवाज उठाई है। गुलामी के दौर से आजादी के मिलने के कई साल बाद तक देश में आंदोलन होते रहे। इन आंदोलनों में जनता का व्यापक हित गूंजता था। इसमें दलगत राजनीति भी हावी होती थी, फिर भी चेतना का एक माहौल नजर आता था।
उत्तराखंड से एक चौंकाने वाली खबर आई है। शीतकाल में कम से कम चार महीने गुफा में जाकर शीतनिद्रा (हाइबरनेशन) में जाने वाले भालू अब सो नहीं रहे हैं। मौसम के बदलने से और मनुष्य की बनाई गलत व्यवस्थाओं से उनके व्यवहार में बदलाव देखा जा रहा है। गौरतलब है कि हाइबरनेशन जानवरों द्वारा प्रतिकूल परिस्थितियों (जैसे अत्यधिक ठंड या भोजन की कमी) में ऊर्जा बचाने के लिए अपनाई जाने वाली एक गहरी निष्क्रियता की अवस्था है, जिसमें उनके शरीर का तापमान, हृदय गति और श्वसन दर नाटकीय रूप से धीमी हो जाती है, जिससे वे महीनों तक जीवित रह सकते हैं। वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि भालू पूरी सर्दी अपनी गुफा में ही व्यतीत करते हैं। लेकिन, इस बार वह शीत निद्रा में जाने की जगह आबादी वाले क्षेत्रों में रुख कर रहे हैं। इसका सीधा मतलब है कि उनकी नींद में गंभीर खलल पड़ रहा है। अब भालू आबादी वाले क्षेत्रों की तरफ बढ़ रहे हैं, तो इंसानों पर अपना गुस्सा भी निकाल रहे हैं। भालू पढ़े-लिखे नहीं हैं। नैतिक-अनैतिक की परिभाषाएं नहीं जानते। लेकिन वो इतना जानते हैं कि जब उनके साथ गलत हो तो उन्हें सोना नहीं है। अपनी गुफाओं से बाहर निकलना है और गलत करने वालों को उनकी भूल का अहसास कराना है। और फिर भी सामने वाला अपनी गलती न माने तो पंजों और दांतों का जो पैनापन प्रकृति ने उन्हें दिया है, उसका इस्तेमाल करना है, गलती करने वाले को अपनी आक्रामकता दिखानी है। जानवर है, लिहाजा हिंसा उसकी प्रकृति में है। इंसान को हिंसक नहीं होना चाहिए, लेकिन इतना कायर, संवेदनहीन, लाचार या निस्पंद भी नहीं होना चाहिए कि अपने साथ और अपने आस-पास वालों के साथ जो हो रहा है, उससे कोई फर्क ही नहीं पड़े।
कितनी अजीब बात है कि देश में भालू जाग गए और जनता सोई पड़ी है। जनता को इस बात से कोई फर्क ही नहीं पड़ रहा है कि उसके साथ कुछ गलत हो रहा है तो वह जागे। हर वक्त, हर किसी के साथ सब कुछ सही नहीं होता। देश में पहले भी गलत होने पर जनता ने आवाज उठाई है। गुलामी के दौर से आजादी के मिलने के कई साल बाद तक देश में आंदोलन होते रहे। इन आंदोलनों में जनता का व्यापक हित गूंजता था। इसमें दलगत राजनीति भी हावी होती थी, फिर भी चेतना का एक माहौल नजर आता था। लेकिन 2011 से आंदोलनों का चरित्र भी बदल गया। अन्ना आंदोलन ने देश को जगाने के नाम पर ऐसा सुलाने का काम किया कि अब बुरे से बुरे हालात में भी दो-चार आवाज़ें सामने आती हैं। बाकी सब ऐसे मुंह में दही जमाकर बैठते हैं कि हमें क्या, हमारा तो कुछ नहीं बिगड़ रहा। शाहीन बाग आंदोलन और किसान आंदोलन देश में नहीं होते तो ऐसा लगता कि पूरा देश ही हाइबरनेशन में चला गया है। पता नहीं कौन से अच्छे दिनों की आस में हम अपनी ऊर्जा बचाने के लिए गहरी निष्क्रियता दिखा रहे हैं।
इस साल के ही कुछ उदाहरण देख लें। अप्रैल में पहलगाम में आतंकी हमला हुआ और बड़ी बेदर्दी से पर्यटकों को मार दिया गया। इसके बाद सरकार ने ऑपरेशन सिंदूर शुरु किया, जिसमें सेना की काबिलियत से सफलता भी मिली। लेकिन इसे एकदम से रोक दिया गया क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि लड़ाई रोको वर्ना मैं व्यापार रोक दूंगा। ये बात एक नहीं पचास से ज्यादा बाद ट्रंप दोहरा चुके हैं। नरेन्द्र मोदी एक बार भी इसका प्रतिवाद नहीं कर पाए। और जनता को भी इससे कोई फर्क नहीं पड़ा कि दूसरे देश का राष्ट्रपति हमें निर्देश दे रहा है। ये हमारी संप्रभुता का अपमान था और हमने इसे बर्दाश्त किया, क्योंकि हम सो रहे हैं। अमेरिका के बाद अब चीन भी दावा कर रहा है कि उसने युद्धविराम करवाया। कायदे से मोदी सरकार को एक वैश्विक टेंडर निकाल देना चाहिए कि आओ भाई और किस-किस को युद्धविराम का श्रेय लेना है, हम सबको बराबरी का मौका देंगे। ये शुभकार्य अडानी या अंबानी किसी के जरिए हो तो कहने ही क्या।
खैर, विदेश नीति आम लोगों को जटिल लगती हो तो धर्म की बात कर लें। इस साल की शुरुआत में ही प्रयागराज के कुंभ में भगदड़ हुई और कितनी जानें गईं, इसकी कोई गिनती ही नहीं है, क्योंकि मानवीय गरिमा के नाते लाशों के साथ जो सम्मानजनक व्यवहार किया जाता है, वो भी यहां नदारद रहा। लाशों की गिनती कम करने के लिए आंकड़ों पर लीपापोती की गई, इससे मुआवजा हड़पने की सुविधा भी हुई। ऐसा ही हाल नई दिल्ली रेलवे स्टेशन की भगदड़ पर भी रहा। इंसानी जिंदगी कीड़े-मकोड़ों की तरह कुचल कर खत्म हो गई, इतनी त्रासदी काफी नहीं थी जो उसके बाद सरकार के बढ़ाए एक बाबा ने कहा कि इससे उन्हें मोक्ष मिला होगा। क्या ऐसी बातें सुनकर भी सोया जा सकता है। लेकिन विडंबना देखिए समाज में गहरी निद्रा पसरी है। एक कुंभ की बात अगले कुंभ तक याद भी नहीं रखी जाती।
इसी नींद का फायदा उठाते हुए अब धर्म के नाम पर आत्मघाती बनने की सलाह दी जा रही है। बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों पर प्रताड़ना की खबरों के बाद गाजियाबाद में कुछ लोग बाकायदा घातक हथियार लोगों को घरों में जाकर बांट रहे थे ताकि हिंदू अपनी रक्षा कर सके, इसका वीडियो भी सामने आया। खुद को महामंडलेश्वर कहने वाले यति नरसिंहानंद गिरि ने कहा है कि तलवारें बांटने से कुछ नहीं होने वाला। अब तो हिंदुओं को आत्मघाती दस्ते बनाने चाहिए। हिंदुओं को बजरंगदल-फजरंगदल जैसे संगठन छोड़कर आईएस जैसा संगठन बनाना चाहिए। मोदीजी खुश हो सकते हैं कि हिंदुओं को उन्होंने आखिरकार जगा ही दिया। हालांकि उन्हें खुद पर शर्म भी आनी चाहिए कि उनके रहते लोग अपनी रक्षा के लिए खुद हथियार उठाने की बात कर रहे हैं। यानी लोगों को मोदी सरकार पर जरा भी भरोसा नहीं है। जिस पर भरोसा न हो उसे अगली बार सत्ता से हटाने के लिए लोगों का जागना जरूरी है। लेकिन अभी कानून और न्याय व्यवस्था का जागना जरूरी है। दिल्ली दंगों के आरोप में लगभग छह सालों से कैद उमर खालिद को आज तक जमानत नहीं मिली। दिल्ली पुलिस ने उमर खालिद पर दंगों की साजिश रचने और इसके लिए हथियार का इंतजाम करने जैसे गंभीर आऱोप लगाए, हालांकि अब तक इसके लिए न सबूत दिए न उन्हें दोषी ठहराया जा सका है। फिर भी उमर जेल में हैं और लोगों को खुलेआम हथियार बांटने और आत्मघाती दस्ता बनाने के लिए उकसाने वाले लोग दादागिरी दिखा रहे हैं।
वैसे हिंदुओं को आत्मघाती बनने की जरूरत नहीं है, पहले से अंधभक्ति में काफी आत्मघात किया जा चुका है। सरकार की पूंजीपरस्त नीतियों के कारण जिन नौजवानों के हाथों से रोजगार छिन गए, जिन व्यापारियों के कारोबार चौपट हो गए वो मुसलमान, ईसाई से ज्यादा हिंदू हैं। महिलाओं के लिए देश बेहद असुरक्षित हो चुका है। छेड़खानी और बलात्कार का शिकार होने वाली लड़कियों का दर्द जाति और धर्म की चौहद्दियों में कैद कर नहीं देखा जा सकता। अंकिता भंडारी भी हिंदू थी और महिला पहलवान या उन्नाव पीड़िता भी हिंदू ही हैं। अंकिता भंडारी के आरोपियों में से एक भाजपा नेता का जन्मदिन अभी मनाया गया तो इसके विरोध में उत्तराखंड की पौड़ी से जिला पंचायत सदस्य किरन शर्मा नौगाई ने भाजपा से इस्तीफा दिया। किरण शर्मा ने लिखा कि अंकिता भंडारी प्रकरण में एक वीआईपी का नाम आ रहा है और मेरी ही पार्टी के लोग मूकदर्शक बनकर तमाशा देख रहे हैं, वीआईपी को जन्मदिन की बधाई दे रहे हैं। यह सब देख कर मुझे शर्म आ रही है कि मैं किस दल से जुड़ी हूं। मेरी भी बेटी है और अंकिता भी मेरी बेटी थी, इसलिए आज अंकिता के इंसाफ के लिए मैं भाजपा की सदस्यता से इस्तीफा देती हूं। और मैं खुलकर उस बेटी की लड़ाई लड़ूंगी। अंकिता हम शर्मिंदा हैं, तेरे कातिल जिंदा हैं।
बेटी के कातिलों के लिए गुस्से का इजहार करती एक महिला की नींद टूटी है, यह उम्मीद की किरण के समान है। लेकिन उम्मीदों को पंख तभी लगेंगे जब समाज में बड़े पैमाने पर नींद टूटने का सिलसिला चले।
अभी बहुत सी चीजों का हिसाब-किताब बाकी है। अरावली जैसे कितनी प्राकृतिक धरोहरों का सौदा हुआ है, बैंकों से कितना धन लूट कर बाहर भेजा जा रहा है, एसआईआर के दुष्चक्र में कैसे लोकतंत्र को फंसा दिया गया है, संवैधानिक संस्थाओं की साख दांव पर क्यों लगाई गई है, मीडिया को गुलाम और पत्रकारों को कठपुतली बनाकर नचाने का खेल कौन खिला रहा है। ऐसे कई सवालों के जवाब जनता को मांगने चाहिए। संविधान की व्यवस्था में खलल डाला गया है, तो क्या जनता की नींद नहीं टूटनी चाहिए। क्या हमसे बेहतर और समझदार भालू हैं, जो प्राकृतिक विधान के भंग होते ही जाग गए हैं।


