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सामाजिक प्रतिक्रांति का युद्घघोष

पितृसत्ता से लेकर जाति का विनाश, इतिहास के गैर-ब्राह्मïणीकरण से मनु का श्राप तकÓ—पहली नजर में बेशक यह किसी को भी सामाजिक सुधार और जागरण की कार्यसूची लग सकती है।

सामाजिक प्रतिक्रांति का युद्घघोष
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राजेंद्र शर्मा

राष्टï्रीय आंदोलन से उन्मुक्त हुई सामाजिक क्रांति को पलटने के लिए संघ-भाजपा का प्रतिक्रांतिकारी हमला दो टांगों पर खड़ा है—हिंदू श्रेष्ठïतावाद और मनुवाद या ब्राह्मïणवाद, जिसमें सवर्णवाद और मर्दवाद दोनों का योग है। शासन के विभिन्न स्तरों तक इस हमले के पहुंचने से सामाजिक प्रतिक्रांति का वास्तविक खतरा पैदा हो गया है।

पितृसत्ता से लेकर जाति का विनाश, इतिहास के गैर-ब्राह्मïणीकरण से मनु का श्राप तकÓ—पहली नजर में बेशक यह किसी को भी सामाजिक सुधार और जागरण की कार्यसूची लग सकती है। जाहिर है कि फुले दम्पति, पेरियार, डॉ अम्बेडकर तथा अन्य तमाम समाज सुधारकों की नहीं, अपने जरा अलग तरीके से गांधी की तथा उनके नेतृत्व में राष्टï्रीय आंदोलन की कार्यसूची का भी यह सब जरूरी हिस्सा रहा था। इसीलिए तो, इस राष्टï्रीय आंदोलन के गर्भ से जिस स्वतंत्र भारत का जन्म हुआ, उसका संविधान कम से कम इस कार्यसूची के अनुरूप जरूर था। इससे स्वाभाविक अपेक्षा तो यही की जाती है कि देश की शिक्षा व्यवस्था और खासतौर पर उच्च शिक्षा व्यवस्था इस सामाजिक कार्यसूची को आगे बढ़ाने में मददगार होगी। हैरानी नहीं होगी कि इनके पांवों तले कुचले जाते रहे तबकों के बीच से तथा उनके हमदर्दों की कुछ गर्म आवाजें पितृसत्ता, जाति व्यवस्था, इतिहास के ब्राह्मïणीकरण और मनुवाद को 'जहर' बताएं और इसकी काट या एंटी-डोट की तलाश को अपनी विद्वत्ता का लक्ष्य बनाएं। यह सामाजिक क्रांति का वह एजेंडा है, जिसे राष्टï्रीय आंदोलन पूरा तो नहीं कर सका, पर उसने बलपूर्वक देश के सामने रखा ही नहीं था, ऐसी शक्तियों को भी उन्मुक्त कर दिया था, जो इस एजेंडा को आगे ले जाने वाली थीं।

लेकिन, इसके उलट को क्या कहेंगे? पितृसत्ता के विरोध को, जाति के विनाश की वकालत को, इतिहास के ब्राह्मïणीकरण की तथा मनु की आलोचना को ही अगर कोई 'जहरÓ बताए तो? स्वाभाविक रूप से इसका एक ही जवाब हो सकता है—यह तो सामाजिक प्रतिक्रांति का एजेंडा है। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में संघ-भाजपा की सरकार के दबे-छुपे ढंग से सामाजिक प्रतिक्रांति की शक्तियों तथा प्रवृत्तियों को बढ़ावा देने और उससे ज्यादा खुलेआम सामाजिक क्रांति की प्रवृत्तियों को कमजोर करने की बात तो किसी से छुपी हुई नहीं थी। लेकिन, ऐसा लगता है कि मोदी राज के तीसरे कार्यकाल में सामाजिक प्रतिक्रांति की ताकतों के हाथों में बढ़ते पैमाने शासकीय नीति की बागडोर ही सौंपी जा रही है। केंद्रीय विश्वविद्यालयों में वामपंथी के साथ-साथ अंबेडकरवादी विद्वत्ता/विचारों की मौजूदगी की जांच की सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय से सितंबर के आखिर में आयी मांग, इसी सच्चाई को गाढ़े रंग से रेखांकित करती है।

इस प्रसंग को चूंकि मुख्यधारा के मीडिया में बहुत हद तक अनदेखा ही कर दिया गया है, जबकि इस मामले में सीधे प्रधानमंत्री कार्यालय की हैरान करने वाली सक्रियता स्पष्टï रूप से देखने को मिलती है, जो पूरे शासन के इस दिशा में प्रवृत्त होने का संकेत देती है, इसलिए हम यहां इस प्रसंग का थोड़े विस्तार से जिक्र करना चाहेंगे। इस प्रकरण की शुरूआत, 26 सितंबर को, सोशल मीडिया प्लेटफार्म एक्स पर आए एक गुमनाम ट्वीट से होती है। इस ट्वीट में देश के वर्तमान नीति निर्धारकों को चेताया जाता है कि पितृसत्ता, जाति, ब्राह्मïणवाद, मनुवाद की आलोचनाओं का 'जहरÓ युवा दिमागों में भरा जा रहा है, जिसके जरिए वामपंथी जुंडली शिक्षण का उपयोग अपनी कतारों में भर्ती के लिए रंगरूट तैयार करने के लिए कर रही है!

बहरहाल, वामपंथ पर हमले की आड़ में वास्तव में सामाजिक रूप से उत्पीड़ितों, खासतौर पर वंचित जातियों तथा महिलाओं के अधिकारों तथा उनकी समानता की पुकारों का रास्ता खोलने वाली और उनका रास्ता रोकने वाली मेधाओं को उच्च शिक्षा के दायरे से बहिष्कृत ही करने की आरएसएस की मांग तब पूरी तरह से उजागर हो जाती है, जब उक्त ट्वीट के साथ लगायी गयी सूची में डॉ. अंबेडकर की 'एन्हिलेशन ऑफ कास्ट' से लेकर, पेरियार, फुले दम्पति तक के लेखन को उक्त 'जहरÓ के उदाहरण के रूप में गिनाया जाता है। ट्वीट के साथ जोड़ी गयी तस्वीर में पूरी 35 पुस्तकें हैं, जिनमें आसानी से समझ में आने वाले कारणों से, महिला लेखिकाओं की संख्या अनुपातहीन तरीके से ज्यादा है। यानी यह वामपंथ का नाम लेकर, हर प्रकार की प्रगतिशील धाराओं और खासतौर पर जातिभेद-विरोधी तथा लिंगभेद-निषेधक बराबरी के विचारों को शिक्षा के दायरे से उसी तरह बहिष्कृत करने के प्रयासों का एक उदाहरण है, जिस तरह के हमलों के जरिए ब्राह्मïणवाद ने बहुत पुराने जमाने में चार्वाक और आजीवक जैसी भौतिकवादी दार्शनिक धाराओं को हाशिए से भी नीचे धकेल दिया था।

इस गुमनाम ट्वीट के आने के बाद जो कुछ होता है, वह और भी ज्यादा मानीखेज है। प्रधानमंत्री कार्यालय इस ट्वीट का स्वत: संज्ञान लेकर, उच्च शिक्षा विभाग को इस संबंध में एक चिट्ठी लिखता है और संबंधित विभाग उसी दिन, यानी 27 सितंबर को ही सभी केंद्रीय विश्वविद्यालयों को चि_ïी लिखकर उनसे फौरन इन शिकायतों पर उनका जवाब मांगता है। जाहिर है कि केंद्रीय विश्वविद्यालय तुरंत इस मामले की समीक्षा में जुट जाते हैं। केंद्रीय विश्वविद्यालयों से इस शिकायत के सिलसिले में पूछा गया एक सवाल और भी ज्यादा आशंकाएं पैदा करने वाला है। उन्हें यह भी बताना है कि उक्त 'जहरÓ फैलाने वाले विचारकों/ लेखकों से जुड़े पाठ्यक्रमों में कितने छात्र हैं। यानी कुल मिलाकर इस जहर के फैलने और फैलाने का पैमाना कितना है? इसके लिए कितनी और कैसी घेरेबंदी की जरूरत होगी?

बेशक, जातिवाद तथा मर्दवाद के पक्ष में वर्तमान शासन के सीधे हस्तक्षेप का यह पहला उदाहरण हो भी, तब भी इसके पीछे चले आ रहे एक लगातार जारी सिलसिले को याद रखना जरूरी है। पाठकों को याद होगा कि रोहित वेमुला की संस्थागत हत्या समेत उच्च शिक्षा संस्थाओं में जातिवादी भेदभाव के अनेक प्रकरणों की पृष्ठïभूमि में, सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर, विश्व विद्यालय अनुदान आयोग ने आधे-अधूरे तरीके से जो दिशा-निर्देश तैयार किए थे, उनके खिलाफ भी जाहिर है कि संघ परिवार के संगठनों की संलिप्तता के साथ, विरोध का तूफान खड़ा करने की कोशिश की गयी थी। तुरंत सुप्रीम कोर्ट ने भी इसकी सुनवाई कर, इन दिशानिर्देशों पर रोक ही लगा दी थी।

सवर्ण गोलबंदी के इसी सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए, नीट परीक्षाओं की धांधली से भड़के छात्रों और युवाओं के जंतर-मंतर आंदोलन के बाद के दौर में, उसके समानांतर सवर्ण युवाओं की लामबंदी की कोशिशों के जरिए, युवाओं को बांटने की कोशिश की गयी थी। और जब यह कोशिश, खास कामयाब नहीं हुई, तब जंतर-मंतर आंदोलन के फौरन बाद, आरक्षण व्यवस्था में सुधार के नाम पर, आरक्षण-विरोधी आंदोलन खड़ा करने की कोशिश की गयी। यह दूसरी बात है कि इसका ज्यादा व्यापक प्रभाव नहीं नजर आया, उल्टे इसके पीछे सत्ताधारी भाजपा तथा संघ के नेताओं का हाथ होने का सच ही उजागर हो गया। उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार के उप-मुख्यमंत्री, बृजेश पाठक खासतौर पर इस खेल के पीछे खड़े नजर आ रहे थे और उनकी सरकार इसे छुपाने की कोई कोशिश भी नहीं कर रही थी। इसी खुल्लमखुल्लापन को अब केंद्र की शिक्षा नीति में अगली मंजिल पर पहुंचा दिया गया है।

यह भी याद रहे कि संघ परिवार पहले से ही जातिवाद तथा लिंगभेद की सच्चाइयों को ही नकारने के जरिए, इन असमानताओं को मिटाने के संघर्षों को ही गैर-जरूरी साबित करने में लगा रहा है। अंतरराष्टï्र्रीय स्तर पर, इसी प्रतिगामी रुख की शासकीय नीति के स्तर पर अभिव्यक्ति में, मोदी सरकार इसके लिए बराबर लड़ती आयी है कि रंगभेद-विरोधी वैश्विक एकजुटता में, भारत के जाति भेद के जिक्र को हर्गिज शामिल नहीं किया जाए। इसी प्रकार, पश्चिमी देशों में कुछ शैक्षणिक परिसरों में जहां भारतीय छात्रों की भी ठीक-ठाक उपस्थिति है, जब भी भेद-भाव विरोधी पहलों के हिस्से के तौर पर, जाति-भेद विरोधी कदमों के शामिल किए जाने की बात आयी है, संघ परिवार से जुड़़े संगठनों ने ही नहीं, उनकी पीठ पर हाथ रखने के जरिए वर्तमान सरकार ने भी, ऐसी सभी कोशिशों का विरोध ही किया है। यह आरएसएस के बुनियादी एजेंडा को ही दिखाता है, जो अपने सारे दिखावे के बावजूद, जातिवादी तथा लिंगभेदी, विशेषाधिकारों का हिमायती ही बना रहा है।

राष्टï्रीय आंदोलन से उन्मुक्त हुई सामाजिक क्रांति को पलटने के लिए संघ-भाजपा का प्रतिक्रांतिकारी हमला दो टांगों पर खड़ा है—हिंदू श्रेष्ठïतावाद और मनुवाद या ब्राह्मïणवाद, जिसमें सवर्णवाद और मर्दवाद दोनों का योग है। शासन के विभिन्न स्तरों तक इस हमले के पहुंचने से सामाजिक प्रतिक्रांति का वास्तविक खतरा पैदा हो गया है। जातिगत तथा लैंगिक समानता समेत, हर तरह की समानता की सोच आज निशाने पर है। कथित दिमागी नक्सलों के खिलाफ युद्घ की वर्तमान संघी सत्ता की पुकार, इसी सामाजिक प्रतिक्रांति का युद्घघोष है।

(लेखक साप्ताहिक पत्रिका लोक लहर के संपादक हैं।)


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