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सिस्टम की खराबी का संकेत है अयोध्या घोटाला!

अयोध्या में राम जन्मभूमि मंदिर में दान और चढ़ावे के गलत इस्तेमाल के आरोपों को लेकर हो रहा विवाद भारतीय संस्थाओं में फैली व्यापक गिरावट का एक और चौंकाने वाला उदाहरण है।

सिस्टम की खराबी का संकेत है अयोध्या घोटाला!
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अगर किसी लक्ष्य को पाने के लिए मूल्यों का उल्लंघन किया जाए तो सब कुछ बर्बाद हो जाता है चाहे वह लक्ष्य कितना भी अच्छा क्यों न हो। यह सच है कि कुछ उलझनें और दुविधाएं होती हैं लेकिन मूल्यों को ध्यान में रखकर ही उनसे भी निपटना चाहिए। इससे कम कुछ भी करना थोड़े समय के लिए तो सुविधाजनक हो सकता है लेकिन लंबे समय में यह नुकसान ही पहुंचाएगा।

अयोध्या में राम जन्मभूमि मंदिर में दान और चढ़ावे के गलत इस्तेमाल के आरोपों को लेकर हो रहा विवाद भारतीय संस्थाओं में फैली व्यापक गिरावट का एक और चौंकाने वाला उदाहरण है। हमारी राजनीतिक व्यवस्था, संवैधानिक संस्थाएं, स्वतंत्र निगरानी एजेंसियां और अब आस्था व पूजा के स्थान भी एक ही तरह की गड़बड़ियों में डूबे हुए लगते हैं। परीक्षा के पेपर लीक होने से लेकर ज़मीनें हड़पने और बैंकिंग घोटालों जैसे भ्रष्टाचार के बढ़ते मामलों के बीच देश की दिशा को लेकर निराशा का माहौल बन गया है और ये सब लोगों की नज़रों के सामने हो रहा है।

अयोध्या के घोटाले को गिरावट के एक नए निचले स्तर के तौर पर देखना आसान है। आखिरकार, यह वही जगह है जो भारतीय जनता पार्टी की राजनीति एवं धर्म के उतार-चढ़ाव भरे मिश्रण के केंद्र में रही है और जिसने 1984 के लोकसभा चुनाव में दो सीटों से लेकर 2014 में 282 सीटों तक पार्टी को राष्ट्रीय स्तर पर आगे बढ़ाने में मदद की है। इस लिहाज़ से यह भाजपा के राजनीतिक 'गर्भगृह' (सबसे पवित्र स्थान) में हुआ घोटाला है। यह उन लाखों श्रद्धालुओं की आस्था तथा श्रद्धा का मज़ाक उड़ाता है जिन्होंने राम मंदिर के निर्माण एवं रखरखाव में योगदान दिया है। उत्तर प्रदेश सरकार के अनुसार 22 जनवरी, 2024 को मंदिर के उद्घाटन के बाद से लगभग 50 करोड़ श्रद्धालु यहां आ चुके हैं। आस्था के इतने पवित्र प्रतीक के भी उन लोगों द्वारा लूटे जाने का खतरा है जिन्हें इसके निर्माण और रखरखाव की ज़िम्मेदारी सौंपी गई थी। यह स्थिति उस नए निचले स्तर को दर्शाती है जिसकी चर्चा हो रही है।

अब ऐसी खबरें आ रही हैं कि 'श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र' ट्रस्ट के सर्वेसर्वा महासचिव चंपत राय ने इस्तीफ़ा दे दिया है। यह ट्रस्ट मंदिर का काम-काज संभालता है। उत्तर प्रदेश सरकार ने एक स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम बनाई है और जांच के दौरान आठ लोगों को गिरफ़्तार किया गया है। किसी आम घोटाले के मामले में यह एक आम राजनीतिक और प्रशासनिक प्रतिक्रिया है। इस तरह की कार्रवाई का मकसद भरोसा बहाल करना होता है लेकिन यहां भरोसे का कमज़ोर पड़ना कुछ ज़्यादा ही अहम बात की ओर इशारा करता है।

इससे आस्था रखने वालों को यह समझ आता है कि शासन-व्यवस्था के चरमराने का क्या मतलब होता है। अब तक सत्ता के कमज़ोर पहलू- जैसे लोकतंत्र, पारदर्शिता, उचित प्रक्रिया, ईमानदारी और ऐसी ही दूसरी चीज़ों पर उठने वाले सवालों को सिर्फ़ रोज़मर्रा की राजनीति से जुड़े सवाल माना जाता था। यदि राजनीति दांव-पेंच वाली है तो नेताओं को अपनी पकड़ बनाए रखते तथा अपना एजेंडा आगे बढ़ाते हुए खेलना सीखना होगा। शासन-व्यवस्था को लेकर यह आसान और बंटा हुआ नज़रिया है कि 'खराब' शासन-व्यवस्था को एक दायरे में सीमित किया जा सकता है और उससे कुछ 'अच्छा' भी निकल सकता है पर यह दृष्टिकोण राम मंदिर घोटाले के मामले में पूरी तरह गलत साबित होता है। यह उन लोगों को दिखाता है जिन्होंने अब तक मुश्किल सवाल पूछने से इन्कार किया है कि शासन-व्यवस्था का चरमराना देश और उसके साथ बैठे हर एक की नाव को डुबो देता है- चाहे वे आस्था रखने वाले हों या न रखने वाले हों। इस तरह खराब शासन-व्यवस्था एक ऐसी आग की तरह काम करती है जो सब कुछ जलाकर राख कर देती है।

इस नज़रिए से देखें तो अयोध्या का विवाद कोई नई बात या बहुत नीचे गिरने वाली घटना नहीं है। यह उस रास्ते का नतीजा है जहां सिर्फ़ मकसद पूरा करने पर ध्यान दिया जाता है और उसे पाने के तरीके की परवाह नहीं की जाती। अयोध्या में जो हुआ वह उस नेतृत्व और सत्ता हथियाने के सिस्टम का तार्किक नतीजा है जो इस बात पर यकीन करता है कि सिर्फ नतीजे मायने रखते हैं, उन्हें पाने का तरीका नहीं।

इस रास्ते को अपनाकर हम उस एक सिद्धांत को छोड़ देते हैं जिसे भारतीय आध्यात्मिक परंपराएं सबसे ऊपर मानती हैं, कि धर्म का रास्ता सबसे आगे होना चाहिए और अर्थ (पैसा/सत्ता) उसके पीछे चलना चाहिए या यह कि भारतीय जीवन-शैली और तरक्की के मूल में मूल्य होते हैं।

भारतीय परंपरा में गलत तरीकों से हासिल की गई किसी भी चीज़ को सफलता या उपलब्धि नहीं माना जाता। यह एक बहुत बड़ी भारतीय आध्यात्मिक सीख है जिसे अनगिनत प्रवचनों और कथाओं में दोहराया गया है कि अगर किसी लक्ष्य को पाने के लिए मूल्यों का उल्लंघन किया जाए तो सब कुछ बर्बाद हो जाता है चाहे वह लक्ष्य कितना भी अच्छा क्यों न हो। यह सच है कि कुछ उलझनें और दुविधाएं होती हैं लेकिन मूल्यों को ध्यान में रखकर ही उनसे भी निपटना चाहिए। इससे कम कुछ भी करना थोड़े समय के लिए तो सुविधाजनक हो सकता है लेकिन लंबे समय में यह नुकसान ही पहुंचाएगा। राम मंदिर विवाद हमें बताता है कि यह सारी समझ अब उलट गई है। यह लूट सि$र्फ भौतिक संपत्ति तक सीमित नहीं है बल्कि यह उन लोगों द्वारा हमारी सभ्यता और आध्यात्मिक परंपराओं को नष्ट करना है जो खुद को उनकी रक्षा करने वाला बताते हैं।

अद्वैत वेदांत के मशहूर विद्वान और शिक्षक स्वामी दयानंद सरस्वती (1930-2015) ने मूल्य आधारित जीवन के प्रति इस ज़रूरी कर्तव्य के बारे में बात की थी। स्वामी दयानंद ने न सिर्फ मूल्यों को समझने बल्कि उन मूल्यों के अनुसार जीने के महत्व को भी सिखाया। अपनी किताब 'वैल्यू ऑफ़ वैल्यूज़' में उन्होंने लिखा- 'मेरे जीवन की अभिव्यक्ति असल में मेरे अच्छी तरह से अपनाए गए मूल्यों के ढांचे की अभिव्यक्ति है। सिर्फ अपनाए गए मूल्य ही मेरे निजी मूल्य होते हैं जो यह दिखाते हैं कि मेरे लिए क्या कीमती है।' इस सीख में मूल्यों को मन में उतारना होता है और उन्हें अपनाने वाले व्यक्ति का अभिन्न अंग बनना होता है। तब उनका पालन स्वाभाविक रूप से होता है न कि उन्हें थोपा जाता है। इसके अलावा बाकी सब कुछ मूल्यों के नाम पर किया जाने वाला दिखावा बन जाता है। स्वामी दयानंद सरस्वती को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपना आध्यात्मिक गुरु मानते थे।

फिर भी, मूल्यों को लेकर एक जटिल और गहरी बात है। जब चाहे अक्षरश: हो या भावना के स्तर पर- हर मूल्य का उल्लंघन करके नतीजे हासिल किए जा सकते हैं तो मूल्य कम काम के लगते हैं। जैसा कि भारत में सत्ताधारी व्यवस्था के मामले में देखा गया है कि जब चालाक व होशियार लोग इस खेल का मज़ा लेने लगते हैं और बिना किसी मूल्य-व्यवस्था के एक के बाद एक सफलता हासिल करते हैं तो वे व्यवस्था को एक ज़बरदस्त पतन की ओर धकेल देते हैं। भरोसा खत्म हो जाता है, व्यवस्था में गिरावट आने लगती है और हर उपलब्धि खोखली लगने लगती है क्योंकि कल की 'सफलता' की निशानियां आज एक बहुत बड़े पतन की सीढ़ियां साबित होती हैं।

सच तो यह है कि मूल्यों के बारे में सबसे अच्छे सबक हमें गांधी से मिलते हैं। वे साधन और साध्य (लक्ष्य) के बीच कोई फ़र्क नहीं मानते थे- साधन ही साध्य हैं क्योंकि वे ही वे बीज हैं जो कल फूल बनकर खिलेंगे। आख़िरकार एक सड़ा हुआ बीज किसी भी तरह से उपयोगी पेड़ नहीं बन सकता।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। सिंडिकेट : द बिलियन प्रेस)


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