थैंक यू मी लॉर्ड, नयी पीढ़ी से देश का नव परिचय
थैंक यू मी लॉर्ड, न आप देश के युवाओं को कॉकरोच कहते, न उनके स्वाभिमान को ठेस पहुंचती और न कॉकरोच जनता पार्टी जैसा आंदोलन सोशल मीडिया पर खड़ा होता।

सर्वमित्रा सुरजन
एक तरफ अपने भविष्य की चिंता, पढ़ाई-रोजगार की अनिश्चितता, घर वालों का दबाव, बेरोजगारी-महंगाई की मार और उस पर सरकार की निष्ठुरता, इसके बावजूद अगर ये नौजवान लाठियां खाकर भी सरकार को जगाने के लिए तीखे नारों के साथ सहज हास्य बोध का परिचय दे रहे हैं, तो यह उनकी जिजीविषा और धैर्य के अद्भुत मिश्रण का कमाल है।
थैंक यू मी लॉर्ड, न आप देश के युवाओं को कॉकरोच कहते, न उनके स्वाभिमान को ठेस पहुंचती और न कॉकरोच जनता पार्टी जैसा आंदोलन सोशल मीडिया पर खड़ा होता। न्यायपालिका के शिखर पर बैठे मी लॉर्ड ने उम्मीद न की होगी कि तंज और जवाबी तंज के बाद बात इतनी आगे निकल जाएगी। लेकिन अब निकल ही गई है तो एक और बात के लिए मी लॉर्ड और मोदी सरकार को शुक्रिया कहना चाहिए कि इनकी वजह से नयी पीढ़ी से देश का नव परिचय हुआ।
जनरेशन गैप यानी पीढ़ियों में अंतर के कारण एक जुमला बरसों-बरस समाज में चलता आया है, हमारे जमाने में तो ऐसा होता था, ये आजकल के बच्चे..., बस इसके आगे जो चाहे संज्ञा, विशेषण, उपमा जोड़ लें और नयी पीढ़ी के तौर-तरीकों को गलत ठहरा दें। लेकिन बच्चों, नौजवानों के मन में क्या है, वे सत्ता, प्रशासन या सामाजिक संस्कारों, मान्यताओं को किस तरह से देख रहे हैं। सोशल मीडिया के जरिए उन्हें दुनिया भर की जो घटनाएं देखने मिल रही हैं, जो जानकारियां उन तक पहुंच रही हैं, उन पर उनकी क्या राय है, यह जानने की कोशिश बहुत कम लोग करते हैं। नयी पीढ़ी के बारे में एक आम धारणा यह बना ली गई है कि इसमें बर्दाश्त की क्षमता कम है, वे बड़ों की बात एक बार में नहीं मान सकते, तर्क-वितर्क करते हैं। सार्थक विमर्श को पलट कर जवाब देना बता कर नयी पीढ़ी को कई बार कटघरे में खड़ा किया गया। गर्म खून है तो गुस्सा नाक पर रहता है, ऐसा भी मान लिया जाता है। लेकिन जंतर-मंतर पर जो अभूतपूर्व धरना-प्रदर्शन देश ने देखा उसने इनमें से कई धारणाओं को ध्वस्त कर दिया। इसलिए मी लॉर्ड और सरकार को शुक्रिया कहना तो बनता ही है।
20 जुलाई को जब देश के अलग-अलग जगहों से आए लोगों ने संसद की तरफ कूच करना चाहा तो जाहिर तौर पर मोदी सरकार ने उन्हें रोकने के इंतजाम किए। आंसू गैस के गोलों से लेकर लाठी चार्ज और बंदूकों का तानना सब किया गया। किसानों के लिए सड़क पर कीलें बिछाई गई थीं, युवाओं के लिए बैरिकेड्स में करंट का इंतजाम हुआ। जय जवान, जय किसान कहने वाले देश की यही सूरत नरेन्द्र मोदी ने बनाई है।
लेकिन जिस तरह किसानों ने साल भर तक अदम्य साहस और धैर्य का परिचय दिया था, वैसा ही धैर्य जंतर-मंतर के प्रदर्शनकारियों ने दिखाया। किसानों में तो सब्र पहले ही कूट-कूट कर भरा होता है, तभी तो बीज बोने से लेकर फसल काटने तक की लंबी, संघर्षपूर्ण प्रक्रिया वे पूरी कर पाते हैं। अब युवाओं ने भी साबित कर दिया है कि सब्र के मामले में वे किसी से कम नहीं हैं। सोशल मीडिया पर ढेर सारे वीडियो देखे जा सकते हैं, जिनमें प्रदर्शनकारियों को बुरी तरह पीटा जा रहा है। किसी को जमीन पर लिटाकर रौंदा गया, किसी के नाजुक अंगों पर प्रहार किया गया। कई प्रदर्शनकारियों की जान पर बन आई, कई भूखे-प्यासे, बिना पैसों के रह गए, लेकिन किसी ने भी न आपा खोया न हौसला खोया। सरकार और पुलिस प्रशासन इस बात से अच्छे से वाकिफ है कि 20 जुलाई को जितनी संख्या में सुरक्षा बल तैनात था, उससे कहीं ज्यादा प्रदर्शनकारी थे। पुलिस हथियारों से लैस थी, लेकिन प्रदर्शनकारी निहत्थे थे। फिर भी अगर वे सब आत्मरक्षा पर उतर आते तो सरकार के लिए मामला गंभीर हो सकता था। प्रदर्शनकारियों ने मार खाकर भी पलट कर हाथ नहीं उठाया। अपने शरीर पर लाठियां खाते रहे, आंसू गैस के गोले फटे तो आंखों में जलन लिए भी एक-दूसरे को संभालते रहे। 1947 से पहले की पीढ़ी जब अंग्रेजों के खिलाफ धरने-प्रदर्शन के लिए उतरती थी, तो कैसा माहौल रहता होगा, ये उन्हें एक बार फिर 2026 में देखने मिल गया।
सोशल मीडिया पर रील बनाना, दिनचर्या के कई पलों को इंस्टा स्टोरी की शक्ल देना, फॉलो-अनफॉलो, लाइक-अनलाइक इन सबके आधार पर रिश्तों को परिभाषित करने वाली यह नयी पीढ़ी अपने भीतर गांधी को इस तरह लिए फिरती है, यह बात तो 20 जुलाई को व्यापक तौर पर पता चली। ध्यान देने वाली बात यह है कि यह वही पीढ़ी है जिसने अपने दौर में गोडसे को ही महिमामंडित होते देखा है। जिसने बाबरी मस्जिद का टूटना नहीं देखा, लेकिन राम मंदिर के शिलान्यास से लेकर प्राण प्रतिष्ठा होते तक सब देखा है। ऐसा नहीं है कि इस समय समूची नयी पीढ़ी एकदम धर्मनिरपेक्ष है या संविधान ही उसके लिए सर्वोपरि है। अब भी ऐसे बहुत से नौजवान हैं, जो धर्मोन्माद के जहर को देशभक्ति का असली स्वाद समझते हैं। जिनके लिए जंतर-मंतर पर चल रहे धरने-प्रदर्शन से ज्यादा मायने कांवड़ यात्रा की तैयारी लग रही है। जो मुसलमानों से नफरत भी करते हैं और मोदी के कारण देश को असली आजादी मिली, ऐसा मानते हैं। नरेन्द्र मोदी ने अपने शासन के 12 सालों में और संघ ने अपने सौ सालों के सफर में समाज को बरगलाने का जो काम किया है, उसका असर तो दिखेगा ही। लेकिन फिर भी जंतर-मंतर से आए दृश्यों ने उस निराशा को दूर करने का काम किया है, जो भाजपा की बार-बार जीत और विपक्ष की लगातार हार के बाद तारी होती जा रही थी।
2024 के चुनावों में भी ऐसी ही उम्मीद बंधी थी, जब इंडिया गठबंधन के बैनर तले विपक्ष का बड़ा और मजबूत मोर्चा तैयार हुआ था। उस दौरान रामलीला मैदान में हुई बड़ी रैली में समूचा विपक्ष एकजुट हुआ था, हालांकि तृणमूल कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के कांग्रेस से मतभेद और मनभेद दोनों थे, लेकिन बड़ा मकसद भाजपा को हराना था, लिहाजा सब एक साथ आए। इसका नतीजा भी देखने मिला जिसमें भाजपा को पूर्ण बहुमत नहीं मिला। अगर चंद्रबाबू नायडू, नीतीश कुमार, एकनाथ शिंदे जैसे नेताओं ने भाजपा का साथ नहीं दिया होता, तो मोदी तीसरी बार प्रधानमंत्री नहीं बन सकते थे। बहरहाल, इंडिया गठबंधन विपक्ष में बैठा और मजबूती से अपनी भूमिका अदा करता रहा, जिसकी वजह से संसद में एनडीए का खुल्ला खेल नहीं चल पाया। मगर अब सियासी समीकरण बदल रहे हैं। क्षेत्रीय दलों को लगभग भाजपा ने खत्म कर दिया है, इक्का-दुक्का दल हैं जो कांग्रेस के साथ मिलकर अब भी भाजपा के लिए खतरा बने हुए हैं। अगले साल उत्तरप्रदेश, पंजाब, गुजरात, उत्तराखंड, गोवा, मणिपुर, हिमाचल प्रदेश के विधानसभा चुनाव बताएंगे कि विपक्ष में जान बचेगी या नहीं। सियासी परिदृश्य का यह अंधेरा, यह निराशा देश को भी हताशा की तरफ धकेल रहा था। सत्ता के फैलाए भय का असर इतना था कि आदमी अपनी परछाईं से भी डरे। लेकिन जंतर-मंतर पर खड़े होकर संसद की तरफ मु_ी बांधे उठती हजारों-हजार भुजाओं ने भय का साम्राज्य खत्म कर दिया है।
इस धरने-प्रदर्शन में अभिव्यक्ति की आजादी का भी बखूबी इस्तेमाल हो रहा है। यहां जिस तरह के पोस्टर-बैनर लहराए जा रहे हैं, उसे देखकर सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग करने वालों को नया सबक सीखने मिलेगा। संकट में हास-परिहास का ककहरा युवाओं की तरफ से लगाए जा रहे नारों से सीखा जा सकता है। इंटरनेट पर एक से बढ़कर एक रील्स और मीम्स तैयार हो रहे हैं। मैं कभी बतलाता नहीं, पर सवालों से डरता हूं मैं शाह, लवणेम भोज्यम, मुझे मेरे पुराने बुरे दिन चाहिए, अकाउंटिबिलिटी नॉट फाउंड एरर 404, इतना धोखा तो मुझे मेरे एक्स ने भी नहीं दिया, मुझको मेरे सवालों का जवाब दीजिए, देश को हिसाब दीजिए जैसे न जाने कितने नारे और गानों पर पैरोडी तैयार हो रही है।
एक तरफ अपने भविष्य की चिंता, पढ़ाई-रोजगार की अनिश्चितता, घर वालों का दबाव, बेरोजगारी-महंगाई की मार और उस पर सरकार की निष्ठुरता, इसके बावजूद अगर ये नौजवान लाठियां खाकर भी सरकार को जगाने के लिए तीखे नारों के साथ सहज हास्य बोध का परिचय दे रहे हैं, तो यह उनकी जिजीविषा और धैर्य के अद्भुत मिश्रण का कमाल है। इस नयी पीढ़ी से हिंदुस्तान परिचय के लिए हाथ बढ़ाए, मजबूती का अहसास होगा।


