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दवा बिक्री के गलत तरीकों पर सर्वोच्च न्यायालय का आदेश स्वागत योग्य

स्वास्थ्य क्षेत्र में गलत मार्केटिंग तरीकों के बारे में फेडरेशन ऑफ मेडिकल एंड सेल्स रिप्रेजेंटेटिव्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया द्वारा दायर की गई एक जनहित याचिका पर सुनवाई के बाद दिया गया सर्वोच्च न्यायालय का आदेश एक स्वागत योग्य कदम है

दवा बिक्री के गलत तरीकों पर सर्वोच्च न्यायालय का आदेश स्वागत योग्य
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  • डॉ. अरुण मित्रा

दवाओं की ज़्यादा कीमत का हमारे लोगों के स्वास्थ्य और आर्थिक सुरक्षा पर गंभीर असर पड़ता है। भारत में हेल्थ केयर पर होने वाले खर्च का लगभग 67 प्रतिशत हिस्सा दवाओं पर खर्च होता है। नेशनल हेल्थ पॉलिसी, 2017 के अनुसार, हेल्थ केयर पर होने वाले ज़्यादा खर्च की वजह से हर साल लगभग 6.3 करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे चले जाते हैं।

स्वास्थ्य क्षेत्र में गलत मार्केटिंग तरीकों के बारे में फेडरेशन ऑफ मेडिकल एंड सेल्स रिप्रेजेंटेटिव्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया द्वारा दायर की गई एक जनहित याचिका पर सुनवाई के बाद दिया गया सर्वोच्च न्यायालय का आदेश एक स्वागत योग्य कदम है। अदालत ने केंद्र सरकार से एक समिति गठित करने को कहा है जो डॉक्टरों को मुफ्त में दवा देने वाली कंपनियों के तरीकों पर रोक लगाने के उपायों की जांच करे। वह समिति प्रतिवेदन पर विचार करेगी और चिकित्सा क्षेत्र के पेशेवरों को उपहार और दूसरे फायदे देने सहित गलत दवा प्रोत्साहन के तरीकों को रोकने के उपायों की सिफारिश करेगी।

हेल्थ केयर प्रोफेशनल और सिविल सोसाइटी के कई संबंधित संगठनों ने बार-बार सरकार की फार्मास्युटिकल मार्केटिंग तरीकों को असरदार तरीके से रेगुलेट करने में नाकामी के खिलाफ आवाज उठाई है। यह सब जानते हैं कि फार्मास्युटिकल कंपनियां अपने उत्पादनों के प्रचार पर बहुत सारा पैसा खर्च करती हैं। इस खर्च का एक बड़ा हिस्सा कंटीन्यूइंग मेडिकल एजुकेशन (सीएमई) के नाम पर, अक्सर बड़े पैमाने पर मेडिकल कॉन्फ्रेंस आयोजित करने में जाता है। इस तरह के खर्च से आखिर में दवाओं की कीमत बढ़ जाती है और मरीज़ों का अपनी जेब से चिकित्सा खर्च बढ़ जाता है।

12 दिसंबर 2014 को, सरकार ने यूनिफ़ॉर्म कोड ऑफ फार्मास्युटिकल मार्केटिंग प्रैक्टिसेस (यूसीपीएमपी) पेश किया। उसी तारीख को केमिकल्स और फ़र्टिलाइज़र्स मंत्रालय के फ़ार्मास्युटिकल्स डिपार्टमेंट की तरफ़ से जारी एक सर्कुलर में कहा गया था कि यह कोड 1 जनवरी 2015 से छह महीने तक स्वैच्छिक रहेगा, जिसके बाद इसकी समीक्षा की जाएगी। जैसी कि उम्मीद थी, कोड को स्वैच्छिक बनाने से कोई खास नतीजे नहीं मिले।

इस नाकामी को मानते हुए, उस समय के केंद्रीय रसायन और उर्वरक मंत्री, एच. एन. अनंत कुमार ने जून 2016 में राज्यसभा में कहा कि 2015 में पेश किए गए स्वैच्छिक कोड से चाहे गए नतीजे नहीं मिले। उन्होंने इशारा किया कि सरकार इसे ज़रूरी बना देगी, क्योंकि दवा कंपनियों ने इसे असरदार तरीके से लागू करने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया है। कोड की धारा-6 और 7 दवा कंपनियों को मेडिकल प्रोफ़ेशनलों को मुफ़्त चीज़ें देने से रोकते हैं। इंडियन मेडिकल काउंसिल (प्रोफ़ेशनल कंडक्ट, एटीकेट और एथिक्स) रेगुलेशन भी डॉक्टरों को किसी भी तरह के आर्थिक लाभ लेने से रोकते हैं, जिसमें शिक्षा कार्यक्रम में शामिल होने से जुड़े फ़ायदे भी शामिल हैं। इसके अलावा, सेंट्रल बोर्ड ऑफ़ डायरेक्ट टैक्सेस (सीबीडीटी) ने 1 अगस्त 2012 के अपने ऑर्डर में साफ़ किया था कि दवा कंपनियों द्वारा किया गया ऐसा खर्च टैक्स कटौती के योग्य नहीं होगा।

यूसीपीएमपी यह भी कहता है कि डॉक्टरों को अनुसंधान प्रोजेक्ट में लगाते समय दवा कंपनियों को सक्षम प्राधिकारी द्वारा तय की गयी प्रक्रिया का पालन करना होगा। हालांकि, कंपनियों ने कथित तौर पर अपने प्रचार सामग्री में डॉक्टरों के नाम, प्रोफ़ेशनल क्रेडेंशियल और फ़ोटो का इस्तेमाल किया, जो कोड के तहत मना है।

मज़े की बात यह है कि सितंबर 2020 में, उस समय के रसायन और उर्वरक मंत्री, डी. वी. सदानंद गौड़ा ने संसद में कहा था कि केंद्र सरकार के यूसीपीएमपी को ज़रूरी बनाने की कोई योजना नहीं है। उन्होंने यह बयान केरल से कांग्रेस सांसद के. मुरलीधरन के लोकसभा में उठाए गए एक सवाल के जवाब में दिया था। सरकार के पहले के रुख से इस तरह पलटना बहुत निराशाजनक था।

सरकार के यूसीपीएमपी को ज़रूरी बनाने के अपने वादे से पीछे हटना, फार्मास्युटिकल कंपनियों को असरदार तरीके से विनियमित करने की उसकी इच्छा पर गंभीर सवाल खड़े करता है। इससे नीति बनाने में वाणिज्यिक हितों के गलत असर को लेकर भी चिंताएं पैदा होती हैं। जब अलायंस ऑफ़ डॉक्टर्स फॉर इथिकल हेल्थ केयर के एक प्रतिनिधिमंडल ने, जिसमें इंडियन डॉक्टर्स फॉर पीस एंड डेवलपमेंट (आईडीपीडी) के पदाधिकारी भी शामिल थे, नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (एनपीपीए) को अपने विचार बताए, तो उन्हें बताया गया कि एनपीपीए के पास इन तरीकों को विनियमित करने का कोई अधिकार नहीं है और ज़रूरी बदलाव मंत्री स्तर पर संबंधित कानूनों में बदलाव करके करने होंगे।

दवाओं की ज़्यादा कीमत का हमारे लोगों के स्वास्थ्य और आर्थिक सुरक्षा पर गंभीर असर पड़ता है। भारत में हेल्थ केयर पर होने वाले खर्च का लगभग 67 प्रतिशत हिस्सा दवाओं पर खर्च होता है। नेशनल हेल्थ पॉलिसी, 2017 के अनुसार, हेल्थ केयर पर होने वाले ज़्यादा खर्च की वजह से हर साल लगभग 6.3 करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे चले जाते हैं। इस खतरनाक स्थिति के बावजूद, सरकार दवाओं और मेडिकल डिवाइस पर बहुत ज़्यादा मुनाफे को रोकने के लिए कोई सही कदम नहीं उठा पाई है।

16 सितंबर 2015 को दवाओं की बिक्री में ज़्यादा मुनाफे की जांच के लिए एक कमेटी बनाई गई थी। कमेटी ने फार्मास्युटिकल बाजार में मौजूद बहुत ज़्यादा मुनाफे को गंभीरता से लिया और बताया कि कुछ मामलों में, मुनाफा 5,000 प्रतिशत तक थे। इसने 9 दिसंबर 2015 को अपनी रिपोर्ट दी। फिर भी, लगभग ग्यारह साल बीत जाने के बाद भी, सरकार इन सिफारिशों पर कोई ठोस कदम उठाने में नाकाम रही है। जब बात दवाओं के किफायती होने की हो, तो इतनी लंबी निष्क्रियता बिल्कुल स्वीकार्य नहीं है।

दवाओं की कीमतें उत्पादन की वास्तविक लागत के आधार पर तय होनी चाहिए, जिसमें उचित और पारदर्शी मुनाफा शामिल हो। अभी जो बाजार-आधारित मूल्य निर्धारण का तरीका अपनाया जा रहा है—जिसमें प्रमुख या सबसे ज्यादा बिकने वाले ब्रांडों की कीमतों का औसत निकालकर दाम तय किए जाते हैं—वह बुनियादी तौर पर ही गलत है। यह तरीका दवाओं को किफायती बनाने के बजाय, ऊंची कीमतों को बनाए रखने और मरीजों का नुकसान करके व्यावसायिक हितों को बचाने का काम करता है।

हमें अपने पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के उस दृष्टिकोण को याद रखना चाहिए, जिन्होंने समझ लिया था कि निजी मुनाफे पर चलने वाले दवा उद्योग में लोगों के शोषण की पूरी गुंजाइश है। इसलिए, उन्होंने सार्वजनिक क्षेत्र में दवा निर्माण को बढ़ावा देने की पहल की, ताकि जरूरी दवाएं किफायती दामों पर उपलब्ध कराई जा सकें। 1961 में 'इंडियन ड्रग्स एंड फार्मास्युटिकल्स लिमिटेडÓ (आईडीपीएल) का उद्घाटन करते हुए उन्होंने कहा था: 'दवा उद्योग सार्वजनिक क्षेत्र में होना चाहिए।... मुझे लगता है कि दवा जैसा उद्योग किसी भी हाल में निजी क्षेत्र में नहीं होना चाहिए। इस उद्योग में आम जनता का बहुत ज्यादा शोषण होता है।Ó

इसी सोच के साथ, अप्रैल 1961 में आईडीपीएल की स्थापना की गई। इसका मुख्य उद्देश्य जीवनरक्षक दवाओं के मामले में देश को आत्मनिर्भर बनाना, आयात पर निर्भरता कम करना और यह सुनिश्चित करना था कि लाखों लोगों को किफायती दामों पर दवाएं मिल सकें। इसका मूल सिद्धांत यह था कि दवाओं से करोड़ों कमाने के बजाय, करोड़ों लोगों तक दवाएं पहुंचाई जाएं। आईडीपीएल ने भारत के दवा निर्माण ढांचे को विकसित करने में अग्रणी भूमिका निभाई और राष्ट्रीय स्वास्थ्य कार्यक्रमों में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

इसलिए, दवा उद्योग में निजी क्षेत्र के दबदबे को बढ़ावा देने वाली सरकारी नीति की बुनियादी समीक्षा करना बहुत जरूरी है। दवाएं जीवन और स्वास्थ्य के लिए अनिवार्य हैं, इसलिए इनके उत्पादन और वितरण को केवल मुनाफे की चाहत पर नहीं छोड़ा जा सकता। तत्काल कदम उठाते हुए,सरकार को यूसीपीएमपी (दवा विपणन के लिए आचार संहिता) को अनिवार्य बनाना चाहिए, अनैतिक मार्केटिंग को रोकने के लिए प्रभावी तंत्र बनाना चाहिए, अत्यधिक मुनाफे को नियंत्रित करना चाहिए और लागत पर आधारित एक पारदर्शी मूल्य निर्धारण प्रणाली लागू करनी चाहिए। इस सुधार प्रक्रिया में सार्वजनिक क्षेत्र के दवा निर्माण को मजबूत करना भी एक अहम हिस्सा होना चाहिए। दवाओं तक किफायती पहुंच सुनिश्चित करना जन-स्वास्थ्य की जिम्मेदारी है, न कि कोई ऐसी सुविधा जो खरीदने की क्षमता पर निर्भर हो। फार्मास्युटिकल क्षेत्र को जन-कल्याण की दिशा में फिर से उन्मुख किया जाना चाहिए, जिसमें कॉर्पोरेट मुनाफे के बजाय मरीजों के स्वास्थ्य और भलाई को प्राथमिकता दी जाए।


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