रणनीतिक स्वायत्तता या अनिश्चितता? भारतीय कूटनीति का बदलता स्वरूप
भारतीय विदेश नीति की विशिष्टता लंबे समय तक यह रही कि उसने राष्ट्रीय हितों के साथ-साथ नैतिक मूल्यों, संप्रभुता, उपनिवेशवाद-विरोध और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व को समान महत्व दिया

- अरुण कुमार डनायक
संकट के चलते अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ रहा है, विदेशी मुद्रा भंडार पर बोझ बढ़ा है, चालू खाता घाटा बढ़ने की आशंका है तथा खाड़ी क्षेत्र में रह रहे लगभग 90 लाख भारतीयों की सुरक्षा गंभीर चिंता बन गई है। हालांकि प्रधानमंत्री ने संसद को स्थिति से अवगत कराया, किंतु ट्रंप के पाँच दिवसीय युद्धविराम, पाकिस्तान-तुर्की-मिस्र की मध्यस्थता, संघर्ष की जड़ तथा ईरान के साथ हुई बातचीत के ठोस परिणाम जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर अपेक्षित स्पष्टता नहीं दिखी।
भारतीय विदेश नीति की विशिष्टता लंबे समय तक यह रही कि उसने राष्ट्रीय हितों के साथ-साथ नैतिक मूल्यों, संप्रभुता, उपनिवेशवाद-विरोध और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व को समान महत्व दिया। नेहरू के नेतृत्व में भारत ने महाशक्तियों की गुटबंदी से दूर रहकर शांति, संप्रभुता और गुटनिरपेक्षता के माध्यम से अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखी। नेहरू केवल आदर्शवादी नहीं थे; आवश्यकता पड़ने पर उन्होंने व्यावहारिक कूटनीति का भी परिचय दिया। अमेरिका सहित पश्चिमी देशों से तकनीकी सहयोग सीमित होने पर भारत ने सोवियत संघ तथा बाद में यूरोपीय देशों के साथ औद्योगिक सहयोग स्थापित कर संतुलनकारी कूटनीति का परिचय दिया।
इंदिरा गांधी ने जटिल अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों में कूटनीतिक दृढ़ता दिखाई। 1971 के युद्ध में अमेरिकी दबाव के बावजूद भारत अपनी रणनीति पर अडिग रहा। शिमला समझौता ने संघर्ष के बाद भी कूटनीतिक समाधान व क्षेत्रीय सहयोग की उसकी प्रतिबद्धता को दर्शाया। यद्यपि नेहरू की कश्मीर-चीन नीति और इंदिरा गांधी के शिमला समझौते को लेकर आलोचनाएँ होती रही हैं, किंतु तत्कालीन वैश्विक परिस्थितियों में दोनों ने भारत के आत्मसम्मान और संप्रभुता से समझौता नहीं किया।
भारतीय विदेश नीति में एक निर्णायक मोड़ पी व्ही नरसिम्हा राव के कार्यकाल में आया, जब शीत युद्ध समाप्त हुआ और वैश्विक व्यवस्था उदारीकरण की ओर बढ़ी। सोवियत संघ के पतन के बाद राव ने आर्थिक कूटनीति, 'लुक ईस्ट नीति' और पश्चिमी देशों के साथ संबंध सुधारकर विदेश नीति को नए सिरे से पुनर्संतुलित किया। उनके समय में भारत ने 1992 में इस्रायल के साथ पूर्ण कूूटनीतिक संबंध स्थापित किए और राजीव गांधी द्वारा शुरू की गई चीन के साथ संबंध सुधार की प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हुए 1993 के सीमा शांति समझौता किया।
अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में भी यही परंपरा दिखाई देती है। वैचारिक भिन्नता के बावजूद उन्होंने विदेश नीति में नेहरूजी की परंपरा के अनुरूप समावेशी और संतुलित दृष्टिकोण अपनाया। परमाणु परीक्षणों के बाद उन्होंने अमेरिका के साथ संबंधों को पुनर्संतुलित किया, साथ ही पाकिस्तान और चीन के साथ संवाद बनाए रखा।
डॉक्टर मनमोहन सिंह की विदेश नीति ने भारत को विश्वसनीय साझेदार के रूप में स्थापित किया। उन्होंने न केवल अमेरिका के साथ असैन्य परमाणु समझौता किया, बल्कि 'लुक ईस्ट' नीति को दक्षिण पूर्व एशियाई राष्ट्रों तक विस्तार देकर और जलवायु परिवर्तन जैसे वैश्विक मुद्दों पर विकासशील देशों के हितों की रक्षा कर दीर्घकालिक नैतिकता और व्यावहारिकता प्रदर्शित की ।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय विदेश नीति में बहु-संरेखण और वैश्विक मंचों पर सक्रिय कूटनीतिक उपस्थिति प्रमुख विशेषताएँ बनकर उभरी हैं। भारत 'वैश्विक दक्षिण' की आवाज के रूप में लंबे समय से देखा जाता रहा है—इसकी नींव नेहरू युग के बांडुंग (इंडोनेशिया) सम्मेलन से पड़ी, जिसे मोदी सरकार ने विभिन्न रूपों में आगे बढ़ाया। रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान भारत ने रूसी तेल खरीदकर ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित की और साथ ही शांति प्रयासों का समर्थन करते हुए व्यावहारिक कूटनीति से आर्थिक लाभ भी अर्जित किया। लेकिन बार-बार बदलती कूटनीतिक प्राथमिकताएँ हमारी दीर्घकालिक रणनीति को लेकर अनिश्चितता की धारणा उत्पन्न करती हैं।
प्रधानमंत्री मोदी की कूटनीति में प्रारम्भ में व्यक्तिगत समीकरण बनाने, परंतु प्रतिकूल परिस्थितियों में संवाद की निरंतरता बनाए रखने में संकोच की प्रवृत्ति दिखती है। शी जिनपिंग के साथ अनौपचारिक निकटता के बावजूद सीमा तनाव के बाद शीर्ष स्तर पर संवाद ठहर गया, और डोनाल्ड ट्रम्प के साथ व्यापारिक मतभेदों के दौरान प्रत्यक्ष संवाद से परहेज़ भी देखा गया। यह शैली अल्पकाल में तनाव टाल सकती है, किंतु दीर्घकाल में नीति की निरंतरता और विश्वसनीयता पर प्रश्न उठाती है।
पश्चिम एशिया में हाल के संकट ने इस चुनौती को और स्पष्ट किया है। ईरान-इज़राइल-अमेरिका तनाव के दौरान होर्मुज जलडमरूमध्य में आवाजाही बाधित होने से भारत के कई ऊर्जा-वाहक जहाज़ प्रभावित हुए। भारत के कूटनीतिक प्रयासों के चलते ईरान ने कुछ भारतीय जहाजों को अस्थायी सुरक्षित मार्ग दिया। ऊर्जा आयात सुनिश्चित करने के लिए भारत ने रूस समेत 41 देशों के साथ सहयोग मजबूत किया है, किंतु विश्लेषक मानते हैं कि दीर्घकालिक रणनीति और समयबद्ध प्रयास अपेक्षित गति से आगे नहीं बढ़ पाए हैं।
संकट के चलते अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ रहा है, विदेशी मुद्रा भंडार पर बोझ बढ़ा है, चालू खाता घाटा बढ़ने की आशंका है तथा खाड़ी क्षेत्र में रह रहे लगभग 90 लाख भारतीयों की सुरक्षा गंभीर चिंता बन गई है। हालांकि प्रधानमंत्री ने संसद को स्थिति से अवगत कराया, किंतु ट्रंप के पाँच दिवसीय युद्धविराम, पाकिस्तान-तुर्की-मिस्र की मध्यस्थता, संघर्ष की जड़ तथा ईरान के साथ हुई बातचीत के ठोस परिणाम जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर अपेक्षित स्पष्टता नहीं दिखी। चीन जैसी महाशक्ति के प्रत्यक्ष पड़ोसी होने से भारत पर बहुस्तरीय दबाव बढ़ रहा है। प्रधानमंत्री के भाषण से यह आभास होता है कि भारत अब पूर्ण तटस्थता की बजाय इजराइल और अमेरिका के साथ अधिक निकट समन्वय की ओर बढ़ रहा है। ऐसे परिदृश्य में बहु-संरेखण पर आधारित नीति कुछ लचीलापन देती है, किंतु स्पष्ट और सुसंगत रुख की कमी इसकी निरंतरता पर प्रश्न खड़ा करती है।
सरकार द्वारा बुलाई गई सर्वदलीय बैठक में पश्चिम एशिया संकट पर राष्ट्रीय स्तर पर एकजुट और संतुलित रुख अपनाने तथा स्थिति पर सतत निगरानी रखने पर सहमति बनी। हालांकि, संकट के समय यदि प्रधानमंत्री और प्रमुख विपक्षी नेता राहुल गांधी दोनों उपस्थित रहते, तो इससे भारत की कूटनीतिक एकजुटता का और अधिक सशक्त संदेश विश्व को जाता।
वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में संसद में विदेश नीति पर गंभीर एवं निरंतर बहस की परंपरा को सुदृढ़ करना आवश्यक है। अतीत की तरह आज भी व्यापक संवाद जरूरी है, जिससे नीति-निर्माण अधिक संतुलित बने और दूरदर्शी नेतृत्व विकसित हो। इसके साथ ही सर्वदलीय बैठकें नियमित रूप से आयोजित हों तथा विदेश मामलों की संसदीय स्थायी समिति की सिफारिशों को सरकार अधिक प्रभावी ढंग से अपनाए। कूटनीतिक मजबूरियों में सरकार जो नहीं कह पाती, उसे विपक्ष आसानी से कह सकता है। पूर्ववर्ती प्रधानमंत्रियों ने इसका अक्सर उपयोग किया। मोदी सरकार को भी इस संकट में विपक्ष की मदद लेनी चाहिए।
अपनी संतुलित कूटनीतिक विरासत के कारण भारत विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। हमारी समृद्ध कूटनीतिक परंपरा ने यह सिद्ध किया है कि सिद्धांत और राष्ट्रीय हित एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। महात्मा गांधी ने कहा था — 'सिद्धांत विहीन राजनीति एक पाप है'। बहु-संरेखण की नीति ने भारत को कई अवसर प्रदान किए हैं, किंतु व्यक्तिगत समीकरणों पर आधारित कूटनीति में बार-बार दिखने वाली परिवर्तनीयता दीर्घकालिक निरंतरता और विश्वसनीयता पर सवाल उठाती है। इसलिए आज सबसे बड़ी चुनौती विदेश नीति को अधिक सिद्धांतनिष्ठ, सुसंगत और पूर्वानुमेय बनाना है—यही वह आधार है, जो किसी राष्ट्र को स्थायी सम्मान और वैश्विक प्रभाव प्रदान करता है।
(लेखक एवं समाजसेवी )


