सोनम वांगचुक का अनशन और शिक्षा सुधार का एजेंडा
भारत की शिक्षा व्यवस्था में सुधार केवल सरकार पर निर्भर नहीं हो सकता; इसके लिए नवाचार, जवाबदेही और उद्यमशीलता को जोड़ना होगा।

- अरुण कुमार डनायक
भारत की शिक्षा व्यवस्था में सुधार केवल सरकार पर निर्भर नहीं हो सकता; इसके लिए नवाचार, जवाबदेही और उद्यमशीलता को जोड़ना होगा। देश की सबसे बड़ी पूंजी उसकी युवा जनसंख्या है, जो तभी लाभकारी बनेगी जब उसे गुणवत्तापूर्ण और रोजगारोन्मुख शिक्षा मिले। शिक्षा की गुणवत्ता विद्यालय के सरकारी या निजी होने से नहीं, बल्कि योग्य शिक्षकों, प्रभावी प्रबंधन और जवाबदेही से तय होती है।
जलवायु कार्यकर्ता और शिक्षाविद् सोनम वांगचुक ने 24 जून को गुरुग्राम में केंद्र सरकार के दो मंत्रियों जे.पी. नड्डा और डॉ. जितेंद्र सिंह से लिखित आश्वासन मिलने के बाद 26 दिन लंबा अनशन समाप्त किया। इसके बाद घटनाक्रम तेजी से बदला और लंबे समय से जारी छात्र आंदोलन ने निर्णायक मोड़ लिया। सरकार ने वादा किया कि जंतर-मंतर और संसद मार्च में शामिल छात्रों पर कोई आपराधिक मामला दर्ज नहीं होगा तथा नीट प्रश्नपत्र लीक के बाद आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवारों को मुआवजा देने पर विचार किया जाएगा। साथ ही संसद में शिक्षा व्यवस्था पर चर्चा और जवाबदेही सुनिश्चित करने के कदम उठाने की घोषणा की गई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दो इंस्टाग्राम वीडियो संदेशों में फास्ट-ट्रैक अदालतों और कठोर दंड वाले विधेयक का प्रारूप तैयार होने की बात कही, हालांकि शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग पर तत्काल कोई टिप्पणी नहीं की। लेकिन लगातार बैठकों और बढ़ते युवा प्रतिरोध के दबाव में अंतत: 25 जुलाई को शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान ने इस्तीफा दे दिया।
महात्मा गांधी के दृष्टिकोण में उपवास केवल राजनीतिक दबाव का साधन नहीं था, बल्कि आत्मशुद्धि, नैतिक जागरण और संवाद की प्रेरणा भी था। उन्होंने अपने आंदोलनों में कभी संवाद और समझौते के द्वार बंद नहीं किए; सप्रू और जयकर जैसे मध्यस्थों ने कई अवसरों पर समाधान का मार्ग प्रशस्त किया। इसी परंपरा में सोनम वांगचुक के अनशन और छात्र आंदोलन की समाप्ति को किसी पक्ष की हार-जीत नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक सहमति और जवाबदेही की दिशा में एक सकारात्मक कदम माना जाना चाहिए।
जंतर-मंतर से शुरू हुआ छात्र आंदोलन तेजी से कई राज्यों में फैल गया और उनकी मांगें नीट प्रश्नपत्र लीक से आगे बढ़कर पूरी शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही तक पहुंच गई। छात्रों का कहना है कि केवल नए कानून पर्याप्त नहीं होंगे; संस्थागत कमजोरियों और प्रशासनिक जिम्मेदारी पर गंभीर ध्यान देना होगा। बार-बार होने वाले प्रश्नपत्र लीक ने उनकी मेहनत और भविष्य को असुरक्षित बना दिया है, जबकि ग्रामीण पृष्ठभूमि से आए छात्र सरकारी और निजी विद्यालयों के बीच बढ़ती असमानता पर चिंतित हैं। पुलिस बल प्रयोग से घायल होने के बावजूद छात्रों ने आंदोलन जारी रखा, क्योंकि उनका उद्देश्य केवल एक परीक्षा का न्याय नहीं बल्कि पूरी शिक्षा व्यवस्था में सुधार है। छात्रों ने सीबीएसई मूल्यांकन प्रणाली, सीयूईटी में देरी, परीक्षा केंद्रों की अव्यवस्था, शिकायत निवारण तंत्र की कमजोरियों को भी गंभीर समस्याएं बताया। लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीतिक जवाबदेही का एक महत्वपूर्ण माध्यम चुनाव, संसदीय उत्तरदायित्व और आवश्यकता पड़ने पर मंत्रीस्तरीय दायित्व तय करना भी है। सरकार ने अंतत: शिक्षा मंत्री का इस्तीफा स्वीकार कर एक कदम उठाया, हालांकि इसमें व्यक्तिगत जिम्मेदारी का स्पष्ट स्वीकार नहीं दिखता। उच्च शिक्षा विभाग में सचिव स्तर पर फेरबदल और एनटीए के संविदा कर्मियों को हटाना छात्र संगठनों के अनुसार उनकी मूल मांगों का समाधान नहीं है।
विपक्ष ने प्रधानमंत्री के संदेश को अपर्याप्त बताते हुए शिक्षा मंत्री के इस्तीफे और दोषियों पर कठोर कार्रवाई की मांग की थी। उन्होंने संसद के भीतर और बाहर शिक्षा व्यवस्था पर व्यापक चर्चा का दबाव बनाया। इस घटनाक्रम से स्पष्ट है कि विपक्ष की सरकार को चौतरफा घेरने की रणनीति सफल रही। अब जब छात्र अपने घर लौट चुके हैं, संसद के सुचारू रूप से चलने और शिक्षा सुधार जैसे दीर्घकालिक विषयों पर राजनीतिक दलों के बीच व्यापक सहमति बनने की संभावना है।
फिल्म जगत, साहित्यकारों, शिक्षाविदों, वकीलों, मानवाधिकार संगठनों और नागरिक समाज के व्यापक समर्थन ने इस आंदोलन को छात्रों के दायरे से निकालकर शिक्षा सुधार और लोकतांत्रिक जवाबदेही का व्यापक सामाजिक अभियान बना दिया।
भारत की शिक्षा व्यवस्था में सुधार केवल सरकार पर निर्भर नहीं हो सकता; इसके लिए नवाचार, जवाबदेही और उद्यमशीलता को जोड़ना होगा। देश की सबसे बड़ी पूंजी उसकी युवा जनसंख्या है, जो तभी लाभकारी बनेगी जब उसे गुणवत्तापूर्ण और रोजगारोन्मुख शिक्षा मिले। शिक्षा की गुणवत्ता विद्यालय के सरकारी या निजी होने से नहीं, बल्कि योग्य शिक्षकों, प्रभावी प्रबंधन और जवाबदेही से तय होती है। भवन, स्मार्ट क्लास या डिजिटल उपकरण पर्याप्त नहीं हैं; असली सुधार अच्छे शिक्षण, नियमित मूल्यांकन और शिक्षकों की जिम्मेदारी से आता है। विद्यालयों से लेकर महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों तक संपूर्ण शिक्षा व्यवस्था में सुधार आवश्यक है, ताकि यह अधिक पारदर्शी और विश्वसनीय बने। अत्यधिक नियम-कानून नए शिक्षा उद्यमियों के प्रवेश में बाधा डालते हैं; इन्हें सरल और पारदर्शी बनाया जाना चाहिए। आज की अर्थव्यवस्था में शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री नहीं, बल्कि कौशल और रोजगार योग्य प्रतिभा का विकास है।
परीक्षा प्रणाली में सुधार हेतु कंप्यूटर आधारित परीक्षाओं का विस्तार, प्रश्नपत्रों की डिजिटल सुरक्षा, बायोमेट्रिक सत्यापन और एआई निगरानी अपनाई जानी चाहिए। मूल्यांकन में स्वचालित ग्रेडिंग से परिणाम शीघ्र और निष्पक्ष होंगे। साथ ही, परीक्षा नियामक संस्थाओं को स्वतंत्र और जवाबदेह बनाया जाए। एनटीए की संस्थागत क्षमता, तकनीकी दक्षता और स्वतंत्रता को सुदृढ़ करना भी आवश्यक है, ताकि उच्च स्तरीय परीक्षाओं का संचालन विश्वसनीय ढंग से हो सके। बैंकिंग भर्ती परीक्षाओं की ऑनलाइन प्रणाली इसकी सफलता का प्रमाण है।
केवल परीक्षा प्रणाली में सुधार पर्याप्त नहीं है। जब लाखों विद्यार्थी सीमित सीटों के लिए तीव्र प्रतिस्पर्धा में रहेंगे, तो प्रश्नपत्र लीक और अनियमितताओं का असर गंभीर बना रहेगा। इसलिए गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा संस्थानों और सीटों की संख्या बढ़ाना भी उतना ही आवश्यक है।
शिक्षा व्यवस्था को इस दिशा में आगे बढ़ना होगा कि किसी विद्यार्थी का भविष्य केवल एक परीक्षा पर निर्भर न रहे। इसके लिए बहु-स्तरीय मूल्यांकन, अनेक अवसर और सतत आकलन जैसी व्यवस्थाओं को प्रोत्साहित करना आवश्यक है।
भारत में प्रश्नपत्र लीक की समस्या नई नहीं है। पिछले दशक में भर्ती और प्रवेश परीक्षाओं में कई राज्यों तथा राष्ट्रीय स्तर पर ऐसी घटनाएं बार-बार हुई हैं। यह किसी एक परीक्षा या संस्था की विफलता नहीं, बल्कि परीक्षा प्रशासन की संरचनात्मक कमजोरी को दर्शाता है।
नीट प्रश्नपत्र लीक से शुरू हुआ यह आंदोलन अब शिक्षा सुधार के व्यापक राष्ट्रीय विमर्श का रूप ले चुका है। शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे उस उत्पन्न दबाव का प्रत्यक्ष परिणाम यदि केवल दोषियों को दंड दिलाने तक सीमित रहता है, तो इसका प्रभाव अल्पकालिक होगा। किंतु यदि इसके परिणामस्वरूप भारत की परीक्षा व्यवस्था अधिक पारदर्शी, तकनीकी रूप से सुरक्षित, जवाबदेह और छात्र-केंद्रित बनती है, तो यह भारतीय शिक्षा व्यवस्था के पुनर्गठन की ऐतिहासिक शुरुआत सिद्ध हो सकती है। आने वाले दिनों में सरकार द्वारा प्रस्तावित कानूनी और संस्थागत सुधार तथा संसद में होने वाली चर्चा यह तय करेगी कि यह आंदोलन केवल तत्काल संकट तक सीमित रहता है या दीर्घकालिक परिवर्तन का आधार बनता है। और यदि यह नीति छात्रों, शिक्षकों, अभिभावकों व शैक्षिक संगठनों के साथ व्यापक विमर्श से बने, न कि केवल विषय विशेषज्ञों के सुझावों तक सीमित रहे, तो यह सुधार और भी सार्थक होगा।
(लेखक एवं समाजसेवी )


