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लोक संस्कृति में सामाजिक समरसता

लोक संस्कृति हमारी सामाजिक समरसता और सभ्यता को जीवित रखने का सबसे बड़ा घटक है।

लोक संस्कृति में सामाजिक समरसता
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  • राजेश सक्सेना

लोक संस्कृति हमारी सामाजिक समरसता और सभ्यता को जीवित रखने का सबसे बड़ा घटक है। इसे हर जगह जीवित रखने और बचाने के उपाय, उपादान और उद्यम करने के लिए हमें लोगों को लोकचेतना के माध्यम से जागरूक करना होगा, जिससे जीवन, जगत और समाज की एक रस निष्पत्ति हर मनुष्य के लोक मंगल का रस सबको दिला सके।

वर्तमान समय में प्रौद्योगिकी और तकनीकी विकास के कारण उपजे सोशल मीडिया विमर्श और भूमंडलीकरण के दौर में अब लोक और अभिजात्य के बीच कोई सर्वमान्य विभाजक रेखा खींचना आसान नहीं है।

दूसरी यह बात भी विचारणीय है कि क्या इस समय में अब लोक बचा हुआ भी है या नहीं और अगर बचा हुआ तो उसका दायरा अब कितना कम बचा है क्योंकि, नए समय में जो वर्ग पहले निम्न वर्ग में था वह अब उठकर मध्य वर्ग में आ गया है और मध्य वर्ग अपने आपको लोक का नहीं समझता, वह खुद को अभिजात्य मानने लगा है इसलिए यह जानना और समझना जरूरी है कि क्या लोक अब बहुत सीमित हो रहा है यदि मुझे कहना हो तो मैं उत्तर हां में दूंगा।

दरअसल लोक संस्कृति में हमारी बोली, तीज त्यौहार, कहावतें, लोक मान्यताएं, शादी ब्याह, रीति रिवाज़, लोक व्यवहार, दु:ख दर्द, प्रसन्नता, खानपान, गाली, लोक गीत, मोहल्ले, गली, ग्वाड़ियां, बाड़े, खेत खलिहान और सामूहिक समवेत चेतना जिसमें मनुष्यता के स्वरों का स्पन्दन हो।

लोक जीवन और संस्कृति को सच में देखना हो तो वह हमें ग्रामीण लोक अंचल में ही दिखेगा, नगरीय सभ्यता में तो एक कृत्रिमता के आवरण में कहीं विलुप्त हो गई है।

मुझे तो कभी-कभी लगता है क्या अब कोई लोक बचा हुआ है यह थोड़ा अतिरंजक ज़रूर है, किन्तु लोक संस्कृति के बारे में हमें सोचने को विवश करती हैं। लोक संस्कृति और समरसता के उदाहरण और दृश्यों की कितनी झलकियां हमें दिखती थी जैसे घर में सामान खत्म होने पर अपने पड़ोसी से कुछ मांगना चाय की पत्ती, शकर, थोड़ा दूध, रूपये-पैसे, धनिया, मिर्च,आलू, प्याज़ लेकिन अब ऐसा नहीं दिखता, सभ्यता के इस युग में कितने महान प्रबंधक हो गए सब, क्या अब हमारी आकस्मिकता को भी नए समय में खत्म कर दिया है, मैं हमेशा यह मानता हूं कि 'जीवन सदा आकस्मिकता में अधिक सुन्दर और मौलिक है, कि प्रबंधन और व्यवस्था में नहीं'।

जब हम सामाजिक समरसता की बात करते हैं तो हमें लोक आंचिलकता में व्याप्त लोक चेतना, समग्रता और सामूहिकता के अनेक पहलू दिखाई देते हैं जो न केवल लोकाचार, व्यवहारिकता, घरेलू है बल्कि धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता के बावजूद सामाजिक एकता के सूत्र में बंधे होने के संकेत देते हैं, शादी ब्याह या मांगलिक कार्यों में समाज के हर वर्ग की उपस्थिति व उनके द्वारा किये जाने वाले कार्य, जैसे शादियों में पहले नाई समाज का व्यक्ति पूरे गांव में निमंत्रण देने के लिए मशाल लेकर घर-घर निमंत्रण देने जाता था, ढोली समाज का व्यक्ति मंगल अवसर पर घर-घर ढोल बजाता। हालांकि यह थोड़ा बचा हुआ है क्योंकि अभी भी विशेष तिथियों पर ढोल बजाने वाले घर-घर जाते हैं, मुझे कभी- कभी ये ढोल बजाने वाले जर्मन उपन्यासकार गुंटूर ग्रास के उपन्यास टिन ड्रमर के नायक जैसे लगते हैं! खैर..

पहले भागवत, सत्यनारायण कथा, तेजाजी की कथा आदि में ज़रूरत के सामान, सामग्री समाज के हर वर्ग के सहयोग से पूरे किये जाते थे, जिनमें लगने वाली सामाग्री में लकड़ी के तखत, गाव तकिये, गोटा किनारी की साड़ियां जिन्हें सजावट के लिए मंच पर उपयोग करते थे, किसी के घर से केले के पत्ते आदि लिए जाते थे यह सब हमारी लोक संस्कृति में ही सम्भव होता था। शादियों में कुम्हार के यहां से धोली कलश लाना, खानागर (खन मिट्टी) यह सब जन संस्कृति से उपजी प्रथाएं हैं जो अब भी प्रचलित हैं। हमारे यहां तो ब्याह में स्वर्गीय (बड़े-बूढ़े) को न्योता देना, रोड़ी न्योतना तक की संस्कृति लोक मान्यताओं में प्रचलित हैं।

विविध त्योहारों में एक दूसरे के साथ समरसता का भाव सदा हमें देखने को मिलता था जैसे जैनियों के पर्यूषण पर्व में अन्य समाज का मिलना, होली, दशहरे-दीवाली, ईद पर मिलना। मुहरर्म में ताजिए के नीचे से निकलने पर बलाओं, बीमारियों से मुक्त होने की लोक मान्यता प्रचलित थी, लिहाजा हिन्दू समाज के लोग भी अपने बच्चों को ताजिए के नीचे से निकालने के लिए भेजते थे। दीवाली पर रुई की बत्ती बनाने के लिए रुई, मुस्लिम समुदाय के पिंजारों से ही ली जाती थी। इस तरह लोक जीवन में जातीय सांस्कृतिक समरसता ही नहीं, बल्कि धार्मिक समरसता का भी एक सूत्र में समाहित होने की एक लोक संस्कृति मानव समाज में विकसित और स्वीकार्य थी, यह अलग बात है कि अब इसमें राजनीतिक कारणों से गंभीर विचलन, विगलन और विश्रृंखलन हुआ है।

मालवा की लोक संस्कृति के लोकपर्व में संजाबाई का विशेष रूप में उल्लेखनीय है जिसमें पितृपक्ष के दौरान गोबर से घरों की दीवार पर विभिन्न तरह की आकृतियां बनाकर फूलों से सजाई जाती हैं और हर दिन संजा के गीत गाए जाते हैं। ये गीत भी लोक जीवन की आंचलिक परिवेश में खूब लोकप्रिय हैं किन्तु अब यह पर्व ग्रामीण क्षेत्र से भी समाप्त जैसा ही है। अब पक्के घरों में गोबर के बजाय बाज़ार में उपलब्ध कागज़ की तैयार संजा से काम चला लिया जाता है। यह भी दिलचस्प है कि महाराष्ट्रीयन लोक संस्कृति में गुलाबाई भी लगभग उसी समय में मनाया जाता है इस तरह एक ही समय में मालवा और महाराष्ट्र के दो लोकपर्व एक साथ मनाना भी समरसता का ही उदाहरण है।

घरों को गोबर से लीपकर उस पर गेरू व पाण्डु से मांड़ने बनाना लोक कला की सबसे कलात्मक शैली थी जिसमें मांड़ने की जुड़ाई या भरण को गली, मोहल्ले की सखी, सहेलियां और महिलाएं एक दूसरे के सहयोग से पूरा करती थी, घट्टी पीसते हुए प्रात: में प्रभाती लोक गीतों का प्रचलन था, खेतों पर फसलों को काटने या मूंगफली खोदने जाना एक उत्सव की तरह था, जिसमें खेत मालिक के व्यावसायिक प्रयोजन से ज्यादा सामाजिक मेलजोल की संस्कृति की निष्पत्ति होती थी जो रिश्तों की आत्मीय बुनावट करती थी।

एक और बहुत जरूरी बिंदु इसमें जोड़ना चाहिए वो यह कि एक 'बहुरूपियाÓ भी लोक संस्कृति में एक आवश्यक हिस्सा था जिसे मैं लोक नाट्य परम्परा का सबसे सरल व सुलभ रूप मानता हूं जो रूप बदलकर घर-घर जाकर अपने संवादों से लोकरंजन और उस रूप के बारे में जानकारियों से लोक को अवगत कराते थे। इसी तरह रोज तिथि, तीज, त्योहारों की जानकारी देने पंडित, नाथ सम्प्रदाय (छुल्लक बाबा) भी अपने तरीके से संस्कृति को जोड़ते थे। तेजाजी या रामदेव बाबा की कथा को इकतारे पर गाने वाले या फिर कोड़े से अपने शरीर पर आघात करके लोकगीत गाने वाले हों- ये सब हमारी लोक संस्कृति को समृद्ध करते थे। इनमें से यदाकदा कुछ दिख जाते हैं, अन्यथा तो ये सब परिदृश्य से गायब होते जा रहे हैं।

दरअसल हम देख रहे हैं कि बाजार ने बहुत सारी चीजें हथिया ली हैं लिहाजा अब संस्कृति भी बाज़ार की ताकत से संचालित हो रही है। शादी ब्याह में रिश्तेदारों की जगह वेडिंग प्लानरों या इवेंट मैनेजरों ने ले ली है। लिहाजा चमकदार रोशनी और डीजे के शोर में सब दब गया है। सारे उत्सवों,पर्वों और त्योहारों का भी यही हाल हो गया है। दूसरी तरफ औपनिवेशकता के चलते सभ्यता के विकास क्रम ने गलियों, मुहल्लों, ग्वाड़ियों और बाड़ों को खत्म कर दिया है। कॉलोनी कल्चर, मल्टी सोसायटी फ्लैट सिस्टम ने इंसानों के बीच दूरी बढ़ा दी है, जिससे लोक जीवन और लोक संस्कृति विलुप्त हो रहे हैं। अगर थोड़ा बहुत कुछ कहीं बचा है तो वह है हमारी जनजातीय संस्कृति, उसे भी विकास के नव विचार, कारपोरेट, अर्थ लाभ का गणित और आधुनिक सभ्यता, सत्ताएं समाप्त करने पर तुली हैं।

लोक संस्कृति हमारी सामाजिक समरसता और सभ्यता को जीवित रखने का सबसे बड़ा घटक है। इसे हर जगह जीवित रखने और बचाने के उपाय, उपादान और उद्यम करने के लिए हमें लोगों को लोकचेतना के माध्यम से जागरूक करना होगा, जिससे जीवन, जगत और समाज की एक रस निष्पत्ति हर मनुष्य के लोक मंगल का रस सबको दिला सके।

(लेखक सुपरिचित कवि और संस्कृतिकर्मी हैं।)


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