उद्योगों में भी उत्तम है, 'लघु'
भारतीय समाज को आमतौर पर कृषि प्रधान माना जाता है, किंतु यह अर्धसत्य है।

- कुलभूषण उपमन्यु
वर्तमान सरकारी और निजी उद्योगों की नौकरी, जिसमें 'आईटी' क्षेत्र भी शामिल है, कृषि, पशुपालन की वर्तमान स्थिति के बावजूद बेरोजगारों की बड़ी संख्या इंतजार में खड़ी है और हर साल बढ़ती जा रही है। उनके लिए जवाब ढूंढने की जरूरत है। लोग नौकरी के इंतजार में आयु-सीमा पार कर जाते हैं, फिर हताशा में जीवन जीने को बाध्य होते हैं।
भारतीय समाज को आमतौर पर कृषि प्रधान माना जाता है, किंतु यह अर्धसत्य है। असल में भारतीय समाज का बहुसंख्यक दस्तकार रहा है और वह अपनी मेहनत के बदले में कृषकों की जरूरतें पूरी करते हुए खाद्य-पदार्थ और सुरक्षा प्राप्त करता था। लोहार, बढ़ई, तेली, जुलाहा, चर्मकार, बसोर, नाई, धोबी, पत्थर की मूर्तियां बनाने और चिनाई का काम करने वाले, कच्ची ईंट बनाने वाले, घुमंतु पशु-पालक, भेड़ों की ऊन निकालने वाले, बटाई का काम करने वाले, रंगाई-छपाई करने वाले और ऐसे पेशे से जुड़े हुए सहयोगी व्यवसाय करने वाले अनेक लोग रहते थे। सब एक-दूसरे की जरूरतें पूरी करते हुए जिंदगी जीते थे। कोई बेरोजगार नहीं था। यह व्यवस्था एक दूसरे के सम्मान और स्वावलंबन की सोच पर आधारित थी।
'औद्योगिक क्रांति' के बाद अंग्रेजी हुकूमत ने भारत की उत्पादक व्यवस्था को नष्ट करने का बीड़ा उठाया, ताकि वह अपने देश में बने उत्पादों को भारत में बेच सके। चूंकि यहां के उत्पाद गुणवत्ता पूर्ण थे, इसलिए उन्होंने साम, दाम, दंड, भेद के सभी रास्ते अपनाए। कहीं समाज में व्याप्त छोटे-मोटे मतभेदों को हवा देकर, तो कहीं बुनकरों के हाथ के अंगूठे काटकर सीधी कार्रवाई करके, कहीं दस्तकारों के कच्चे माल की उपलब्धता को नियंत्रित करके स्वावलंबी अर्थव्यवस्था को तोड़ने का काम किया।
इसी के चलते दस्तकारी से बेदखल हुए ज्यादातर लोगों को कृषि का रास्ता पकड़ना पड़ा। उसमें भी स्थायी बंदोबस्त करके जागीरदारी प्रथा को कायम किया, जिससे बहुत से दस्तकारों को जागीरदारों के मजदूर के रूप में जीवनयापन करना पड़ा। इससे पैदा हुई विसंगतियां और सामाजिक टूटन आज तक देश में अनेक प्रत्यक्ष और परोक्ष समस्याएं खड़ी करती रहती है। अब जबकि देश की आबादी भी अप्रत्याशित रूप से बढ़ गई है तो इस औद्योगिक विस्तार के मॉडल से दस्तकार समाज की खोई हुई रोजी की भरपाई कैसे हो सकेगी? पढ़े-लिखे बच्चे पुरानी दस्तकारी तकनीकों को अपनाकर वर्तमान विकसित तकनीक वाले उद्योगों से टक्कर नहीं ले सकते। वर्तमान औद्योगिक मॉडल में रोज़गार प्रदान करने की क्षमता बहुत सीमित है और स्वचालित और 'कृ त्रिम बुद्धिमत्ताÓ जैसे उपायों से कामगारों की जरूरत को लगातार घटाया जा रहा है।
ऐसे में खेती में भी सबको रोजगार प्राप्त नहीं हो सकता, क्योंकि अधिकांश जोतें इतनी छोटी हो चुकी हैं कि उन पर पूरे परिवार का पालन संभव ही नहीं है। पर्वतीय क्षेत्रों में तो हालात और भी ज्यादा खराब हैं, जहां 80 प्रतिशत जोतें एक हेक्टेयर से भी छोटी हैं, जिनमें आधी तो 2-3 बीघा मात्र ही हैं। इतनी कम जमीन पर आदमी घर-बार तो बना सकता है, किंतु सम्मानजनक आय नहीं कर सकता। सरकारी नौकरी तो मात्र दो-तीन प्रतिशत लोगों को ही मिल सकती है।
वर्तमान सरकारी और निजी उद्योगों की नौकरी, जिसमें 'आईटीÓ क्षेत्र भी शामिल है, कृषि, पशुपालन की वर्तमान स्थिति के बावजूद बेरोजगारों की बड़ी संख्या इंतजार में खड़ी है और हर साल बढ़ती जा रही है। उनके लिए जवाब ढूंढने की जरूरत है। लोग नौकरी के इंतजार में आयु-सीमा पार कर जाते हैं, फिर हताशा में जीवन जीने को बाध्य होते हैं। ये परिस्थितियां देश के लिए सही नहीं हैं। सरकारें कोशिश करने के तमाम दावों के बावजूद जरूरत का दस प्रतिशत भी रोजगार खड़ा नहीं कर पा रही हैं।
देश की अर्थव्यवस्था तो आगे बढ़ रही है, किंतु उस अनुपात में रोजगार नहीं बढ़ रहे। हिमाचल प्रदेश का उदाहरण लें तो बेरोजगारों की संख्या 6 लाख 32 हजार है (31मार्च 2025 तक), जबकि बहुत से लोग रोजगार कार्यालयों में पंजीकरण को फिजूल मानकर पंजीकरण ही नहीं करवा रहे हैं। इसका अर्थ हुआ कि असली आंकड़ा और भी ज्यादा होगा। हिमाचल में पिछले तीन साल में 23 हजार 200 लोगों को सरकारी नौकरी दी गई और निजी क्षेत्र में 51 हजार को। अत: प्रतिवर्ष 24 हजार 733 लोगों को नौकरी मिली, तो इस दर से 6 लाख 32 हजार लोगों को नौकरी मिलने में 25 वर्षों से ज्यादा लगेगा। तब तक और कितने बेरोजगार इसमें जुड़ जाएंगे, यह अनंत इंतजार का खेल है। ऐसे में सभी जब 'सफेद कॉलर जॉबÓ ढूंढेंगे तो कैसे संभव होगा। तीन अंगुली से कागज तो लिखे जाते हैं, लेकिन जरूरत की वस्तुएं पैदा नहीं हो सकतीं। हम सोचते हैं कि मशीनीकरण से संभव होगा, किन्तु मशीनीकरण ने ही तो रोजगार छीने हैं। सौ रोजगार छीनकर दस पैदा किए हैं, तो 90 प्रतिशत का घाटा कैसे पूरा होगा।
हम यूरोप और अमेरिका की ओर समाधान के लिए देखने लगते हैं, किंतु हमें याद रखना चाहिए कि इन देशों ने उपनिवेशवादी दौर में विकासशील देशों की जो लूट की थी यह उसी के ऊपर खड़ी इमारत है। उतनी बुनियादी पूंजी हमें कहां से मिलेगी। फिर आजकल चीन का उदाहरण देने और उससे सीखने की बहुत बात होती है, किंतु हम कभी चीन नहीं बन सकते। चीन साम्यवादी सरकार वाला घोर पूंजीपति देश बन चुका है। भले ही उसके प्रत्यक्ष और परोक्ष चाहने वाले उसे इस रूप में देखने का साहस नहीं कर पाते, किंतु सच्चाई तो यही है।
चीन ने 1978 में ही आर्थिक उदारीकरण की राह पकड़ ली थी, जबकि भारत में उदारीकरण 1991 में शुरू हो सका। तब तक चीन, अमेरिका के स्वार्थों का लाभ उठाकर अमेरिका की ही सहायता से दुनिया का उत्पादन केंद्र बन गया। अब तो अमेरिका भी अपनी चीन संबंधी नीति को गलत मान रहा है, क्योंकि वह अमेरिका का ही प्रतिस्पर्धी बन गया है। हमें भी अपनी शक्ति और सीमाओं को देखकर समाधान ढूंढने चाहिए। इतना तो तय है कि हमें वर्तमान औद्योगिक नीति को ज्यादा-से-ज्यादा विकेंद्रित ही नहीं करना होगा, बल्कि कुटीर और अति लघु उत्पादन की इकाइयों को मुख्यधारा की उत्पादन पद्धति बनाना होगा, जिससे अधिक-से-अधिक रोजगार पैदा किया जा सके।
बड़ी चुनौती यह है कि उसके लिए तकनीक का विकास कैसे होगा। बड़े उद्योगपति तो खुद के लिए तकनीक खोजकर विकसित कर लेते हैं या खरीद लेते हैं, किंतु छोटे उद्यमी ऐसा नहीं कर सकते। उनके लिए सरकार ही तकनीक विकास संस्थान खड़े करके संचालित करे और प्रतिस्पर्धी उत्पाद पैदा करने योग्य बनाए। हमारे 'आईआईटी' भी इस काम के लिए अधिकृत किए जा सकते हैं। हमें भारत को पुन: कुटीर और अति-लघु उत्पादन इकाइयों का सघन केंद्र बनाना होगा। घरेलू जरूरतों के सामानों का निर्धारित प्रतिशत, निर्धारित अवधि में समयबद्ध रूप से प्राप्त करते हुए आगे बढ़ना होगा, किंतु सबसे पहले हमें वर्तमान आर्थिक रणनीति की सीमाओं को पहचानकर मानना होगा। तभी हम कुछ नया सोच सकेंगे।
(स्वतंत्र लेखक और 'हिमालय नीति अभियान' के अध्यक्ष हैं।)


