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छोटे किसान भी लगा रहे हैं फलों के बगीचे

सामान्यत: फलों के बगीचों को अधिक साधन-संपन्न किसानों व अपेक्षाकृत बड़े भू-स्वामियों से जोड़ा जाता है, अत: यह प्रसन्नता का विषय है कि अनेक बहुत छोटे किसान भी सफलतापूर्वक फलों के बगीचे लगा रहे हैं और उनसे अच्छी उपज व आय प्राप्त कर रहें हैं

छोटे किसान भी लगा रहे हैं फलों के बगीचे
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कुछ किसान प्राकृतिक खेती केन्द्र स्थापित कर गोबर व गोमूत्र आधारित खाद व बचाव के प्राकृतिक उत्पाद भी प्राप्त करवाते हैं जिससे प्राकृतिक पद्धति अपनाने की संभावनाएं और बढ़ रही हैं। जहां एक ओर इन छोटे-छोटे बगीचों से किसानों की आय बढ़ रही है वहां उनके परिवारों के पोषण में भी सुधार हो रहा है। साधारण ग्रामीण परिवार के पोषण में फल प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हो जाएं तो यह पोषण के लिए बहुत सुखद है।

सामान्यत: फलों के बगीचों को अधिक साधन-संपन्न किसानों व अपेक्षाकृत बड़े भू-स्वामियों से जोड़ा जाता है, अत: यह प्रसन्नता का विषय है कि अनेक बहुत छोटे किसान भी सफलतापूर्वक फलों के बगीचे लगा रहे हैं और उनसे अच्छी उपज व आय प्राप्त कर रहें हैं। तिस पर सोने पर सुहागा यह है कि यह प्रयास प्राकृतिक बागवानी के अनुरूप हो रहा है व इसमें रासायनिक खाद व कीटनाशक खादों का उपयोग नहीं हो रहा है और इस तरह स्वास्थ्य की दृष्टि से अच्छी गुणवत्ता के फल उपलब्ध हो रहे हैं।

छोटे किसानों की बागवानी के इस प्रयास को आगे ले जा रही है- सृजन संस्था। यह प्रयास आज मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश व राजस्थान के अनेक गांवों में अच्छी प्रगति कर रहे हैं जबकि अनेक अन्य गांवों में यह अभी आरंभिक स्थिति में हैं।

छोटे किसानों के लिए फल का बगीचा लगाने में एक कठिनाई यह है कि फल आने में कुछ वर्ष लगते हैं जबकि छोटे किसान की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं होती है कि वह इतना इंतजार कर सकें। इस समस्या का व्यवहारिक समाधान भी छोटे किसानों और विशेषकर महिला किसानों ने सृजन की सहायता से खोज लिया है। यह समाधान यह है कि आरंभिक वर्षों में बगीचे में फल के पौधों के साथ ऐसी फसलें, विशेषकर वायुमंडल से नाईट्रोजन प्राप्त करने वाली दलहन फसलें लगा ली जाएं जो धरती से अधिक पोषक तत्व न खींचें। अपनी मेहनत और निष्ठा से कुछ गांवों में अच्छी-खासी आमदनी ऐसी सहायक फसल से भी प्राप्त की गई हैं।

उमरीखुर्द गांव (जिला शिवपुरी, मध्य प्रदेश) में राजकुमारी ने बताया कि अमरूद के पौधों के साथ उन्होंने मटर बो दिए। इस तरह जहां घर में खाने-पकाने के लिए भरपूर व अच्छी गुणवत्ता के मटर प्राप्त हुए, वहां 5000 रुपए नकद भी मटर की बिक्री से प्राप्त किए। रचना ने इस तरह 3500 रुपए की नकद आमदनी प्राप्त की।

दूसरी ओर इसी जिले के सिरसौद गांव में रश्मि लोधी के बगीचे में भरपूर अमरूद लग चुके हैं। उन्होंने इसके साथ कुछ नींबू व कटहल के पेड़ भी लगा दिए हैं। हालांकि इस प्रयास में सबसे अधिक अमरूद के पेड़ लगाए गए हैं, पर अनेक बगीचों में इनके साथ नींबू, कटहल, पपीते, आम आदि के पेड़ भी हैं और किसान चाहते भी हैं कि चाहे मुख्य फसल अमरूद हो, पर कुछ अन्य फल के पेड़ भी लगाए जाएं।

बादामी का अमरूद का बगीचा अभी छोटा सा है व उसके पास साधन भी बहुत कम हैं। इसके बावजूद अपने लहलहाते हुए अमरूद के पेड़ों को देखकर बहुत प्रसन्न नजर आई। उन्होंने बताया, 'थोड़ी सी जगह खाली बची है। मैं सोचती हूं उसमें आम का पौधा लगा लूं। इस बार हमने अमरूद तो बहुत खाए और जो घर में आया या जिनसे मिलने हम गए, उसे भी खिलाया।'

इस प्रयास के पीछे सोच यह है कि चाहे किसी किसान के पास कम भूमि है, पर नियोजित ढंग से वह इसके एक छोटे हिस्से पर फल का बगीचा लगा सकता है व प्राकृतिक खेती पद्धति को अपनाते हुए गोबर व गोमूत्र आधारित खाद व बचाव के उपायों को अपनाते हुए वे कम खर्च पर ही फल का बगीचा पनपा सकते हैं। इससे जहां छोटे किसान परिवारों का पोषण सुधरता है, वहां अनेक किसानों का आर्थिक आधार भी सुधर रहा है।

दिगोरा गांव (जिला टीकमगढ़, मध्य प्रदेश) में फूलाबाई और उसके पति सरमन को पहले अपने एक एकड़ के खेत से जीवन निर्वाह करना कठिन लग रहा था। इस खेत के एक हिस्से में अमरूद के पेड़ लगाने के बाद उनकी आर्थिक स्थिति कहीं बेहतर हो गई है। फूलाबाई ने कहा, 'अब पहले की तरह मुझे कई बार उधार नहीं लेना पड़ता है, अपितु मैं ही किसी की मदद कर देती हूं।' इस परिवार ने अपनी सिंचाई की स्थिति भी सुधार ली है। इन्होंने बताया कि प्राकृतिक पद्धति से उगाए गए अमरूदों की स्थानीय बाजार में अच्छी मांग है व उचित कीमत भी मिल जाती है।

राजस्थान के प्रतापगढ़ जिले के मीणा आदिवासियों में निर्धनता अधिक पाई गई है। अत: बगीचों के माध्यम से आर्थिक प्रगति की ओर बढ़ना और भी उत्साहवर्धक है। यहां के कल्याणपुरा गांव की एजन व लक्ष्मीबाई जैसी महिलाएं डोल्माश्री नामक महिला किसानों के ऐसे उद्यम से भी जुड़ गई हैं जिसकी योजना अमरूद के विभिन्न उत्पादों की बिक्री की है जिससे इन बगीचों से प्राप्त फलों की बेहतर कीमत मिल सके। इसी तरह के प्रयास अनेक अन्य गांवों में भी आगे बढ़ रहे हैं। हाल के अनुमानों के अनुसार, प्रतापगढ़ जिले के 150 गांवों में इस 'परिवर्तन' नाम के अभियान के अन्तर्गत तीन वर्षों में 140,000 फलों के वृक्ष लगाए गए।

प्राकृतिक पद्धति से लगाए गए इन फलों के बगीचों का एक व्यापक लाभ भी है। इस बगीचे में प्राकृतिक पद्धति का जो प्रयोग होता है उससे उत्साहवर्धक परिणाम मिलने पर अनेक किसान इसके लिए प्रेरित होते हैं कि वे अपने पूरे खेत पर ही प्राकृतिक पद्धति को अपनाएं।

गांव में ही कुछ किसान प्राकृतिक खेती केन्द्र स्थापित कर गोबर व गोमूत्र आधारित खाद व बचाव के प्राकृतिक उत्पाद भी प्राप्त करवाते हैं जिससे प्राकृतिक पद्धति अपनाने की संभावनाएं और बढ़ रही हैं।

जहां एक ओर इन छोटे-छोटे बगीचों से किसानों की आय बढ़ रही है वहां उनके परिवारों के पोषण में भी सुधार हो रहा है। साधारण ग्रामीण परिवार के पोषण में फल प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हो जाएं तो यह पोषण के लिए बहुत सुखद है। तिस पर यह फल प्राकृतिक पद्धति से प्राप्त स्वास्थ्य के लिए अच्छी गुणवत्ता के फल हैं। एक ऐसे समय में जब बाजार में सामान्य तौर पर उपलब्ध फलों की गुणवत्ता के बारे में अनेक शिकायतें मिल रही हैं इस तरह की प्राकृतिक पद्धति के फलों का उत्पादन और भी जरूरी हो गया है। आगे चलकर इन फलों की प्रोसेसिंग से बेहतर गुणवत्ता के अन्य उत्पाद भी प्राप्त हो सकेंगे तो अधिक दूरी के उपभोक्ताओं तक भी पहुंच सकेंगे। इस तरह के प्रयास भी हो रहे हैं।

जलवायु बदलाव के समय में खेतों में अधिक पेड़ों को लगाना व मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार करना विशेष तौर पर उपयोगी है साथ में प्राकृतिक पद्धति को अपनाकर खेती में फासिल फ्यूल का बोझ निरंतर कम किया जा रहा है।

इस सब प्रयास में महिला किसानों को प्राथमिकता दी गई है व उन्होंने इस विश्वास को भली-भांति निभाया भी है। अनेक महिला किसान इन बगीचों के प्रयास से नेत्तृत्व की भूमिका में आगे आ रही हैं।


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