ललित सुरजन की कलम से देशबन्धु के साठ साल-4
'हैंड कंपोजिंग याने छापे के अक्षर हाथ से जोड़ने की विधि पुरानी पड़ चुकी थी।

'हैंड कंपोजिंग याने छापे के अक्षर हाथ से जोड़ने की विधि पुरानी पड़ चुकी थी। उन दिनों लाईनोटाइप और मोनोटाइप ऐसी दो यांत्रिक प्रणालियां प्रचलन में थीं। पहली में एक-एक लाइन मशीन से ढलकर निकलती थी। एक गलती हो जाए तो पूरी लाइन बदलो। दूसरी में एक-एक अक्षर की पृथक ढलाई होती थी। हमने मोनोटाइप मशीनें खरीदना तय किया। छत्तीसगढ़ में देशबन्धु पहला अखबार था, जहां ये मशीनें आईं। स्वाभाविक ही यहां उनका कोई जानकार नहीं था। हम इलाहाबाद से रामनिवास सिंह और जगदीश नारायण श्रीवास्तव को लेकर आए। सिंह साहब मशीन ऑपरेटर थे, याने की-बोर्ड पर कंपोजिंग करते थे।'
'जगदीश उससे जुड़ी मशीन पर सात सौ डिग्री तापमान पर खौलते सीसे से अक्षरों की ढलाई करते थे। रामनिवास सिंह बुजुर्ग थे। खादी के शुभ्र धवल वस्त्र पहनते थे। उनकी भाषा बेहद अच्छी थी। संपादकों की गलतियां सुधार देते थे। जगदीश भी अपने काम में कुशल, और मृदुभाषी व्यक्ति थे। एक लंबे अरसे बाद जब मोनो तकनीक भी पुरानी पड़ गई, मशीनें बेच दी गईं, तब भी जगदीश एक तरह से प्रेस परिसर के सुपरवाइजर बनकर जीवन पर्यन्त हमारे साथ बने रहे।'
(देशबन्धु में 18 जुलाई 2019 को प्रकाशित)
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