27 सितम्बर विश्व नदी दिवस, नदियां बचेंगी तो बचेगा जीवन: नदी संरक्षण की चुनौती
भारत को नदियों का देश माना जाता है तथा यहां छोटी और बड़ी नदियों को मिलाकर लगभग 4000 से अधिक नदियां है।

- राज कुमार सिन्हा
भारत को नदियों का देश माना जाता है तथा यहां छोटी और बड़ी नदियों को मिलाकर लगभग 4000 से अधिक नदियां है। देश में 521 नदियों के पानी की निगरानी करने वाले प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मुताबिक देश की 198 नदियां ही स्वच्छ हैं। इनमें अधिकांश छोटी नदियां हैं। शहरीकरण, औद्योगीकरण तथा अनियोजित विकास के कारण पिछले कुछ दशकों से नदियों की स्थिति अत्यंत चिंताजनक होती जा रही है। कई सहायक नदियों का अस्तित्व ही समाप्त हो गया है।
पृथ्वी पर नदियां जीवनदायिनी है। इसलिए अन्नजल देने वाली इन नदियों को मां मानकर पूजा जाता है। नदियों के बिना मानव जाति के विकास की परिकल्पना असंभव थी। नदियों ने मानव जाति के साथ सहानुभूतिपूर्ण रवैया अपनाकर मानव जाति के विकास में पूरा सहयोग किया। उसकी दैन्दिनी की हर जरूरत को पूरा किया। परंपरागत समय में मानवजाति ने नदियों के इस आत्मीय सहयोग को पूरा मान-सम्मान दिया किन्तु आज लोभ और लाभ की मनोवृत्ति की वजह से नदियां संकट में है। नदियों के विनाश में बाजारवाद का बढ़ता प्रभाव भी एक प्रमुख कारक है। पृथ्वी अब वैश्विक जल दिवालियापन के दौर में प्रवेश कर चुकी है। दुनिया के अनेक नदी घाटियों और जलभृतों (एक्विफर) में दीर्घकालिक जल उपयोग, प्राकृतिक पुनर्भरण और सुरक्षित दोहन की सीमाओं से कहीं अधिक हो चुका है। कई नदी घाटियों में कानूनी जल अधिकार, अनौपचारिक अपेक्षाएं और विकास संबंधी वादे, क्षरित जल-वहनीय क्षमता से कहीं अधिक हो चुका है, जबकि जल दिवालियापन से निपटने के लिए प्रभावी संस्थागत व्यवस्थाएं मौजूद नहीं है। जब कभी नदियों पर बात होती है तो ज्यादातर बड़ी नदियों पर केंद्रित होती है। लेकिन इन सदानीरा नदियों का भरपूर जल देने वाली छोटी नदियों पर हमारा ध्यान नहीं जाता है, जो आज अभूतपूर्व संकट से गुजर रही हैं। इनमें से कई छोटी-बड़ी नदियां या तो सूख चुकी हैं या फिर बरसाती नाले बनकर रह गई हैं। अगर हमें बड़ी नदियों को बचाना है तो छोटी नदियों पर ध्यान देना होगा। छोटी नदियों का संरक्षण जरूरी है। भारत को नदियों का देश माना जाता है तथा यहां छोटी और बड़ी नदियों को मिलाकर लगभग 4000 से अधिक नदियां है। देश में 521 नदियों के पानी की निगरानी करने वाले प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मुताबिक देश की 198 नदियां ही स्वच्छ हैं। इनमें अधिकांश छोटी नदियां हैं।
शहरीकरण, औद्योगीकरण तथा अनियोजित विकास के कारण पिछले कुछ दशकों से नदियों की स्थिति अत्यंत चिंताजनक होती जा रही है। कई सहायक नदियों का अस्तित्व ही समाप्त हो गया है। आईआईटी धनबाद संस्थान के पर्यावरण विज्ञान इंजिनियरिंग विभाग के प्रोफेसर अंशु माली और उनकी टीम ने शोध में खुलासा किया है कि पिछले 50 वर्षों में गंगा नदी की करीब 18 लाख जल धाराएं गायब हो गई है। उन्होंने झारखंड, पश्चिम बंगाल, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में 7 छोटी नदियों और उनके 56 वाटर शेड्स का अध्ययन किया, जो गंगा में जाकर मिलती है। नदियों में प्रदूषण का असल खमियाजा तो कृषि क्षेत्र पर पड़ता है। प्रदूषित नदियों के जल से सिंचाई होती है और इससे प्रदूषण उस कृषि भूमि पर पहुंच जाती है जहां से सीधे खाद्यान्न आता है। अब एक तरफ तो पैदावार बढ़ाने के लिए किसान खतरनाक उर्वरक इस्तेमाल करते हैं और दूसरी तरफ प्रदूषित नदियों का जल उसे और अस्वास्थ्यकर बनाता है।
दूसरी ओर रेत खनन से नदियों के पारिस्थितिकी तंत्र को कई तरह से नुकसान होता है, जिसमें नदी के तल का क्षरण, जलीय आवास का नष्ट होना, और जैव विविधता में कमी शामिल है। इससे नदी के प्रवाह और अवसादन पैटर्न में बदलाव आता है, जिससे बाढ़ और कटाव बढ़ता है। यह नदी के गंदलेपन को बढ़ाता है, ऑक्सीजन की मात्रा घटाता है, और भूजल स्तर को नीचे कर सकता है, जिससे स्थानीय पेयजल की कमी होती है। रेत खनन से नदी का प्राकृतिक संतुलन बिगड़ता है, जिससे स्थानीय जीवों के जीवन को खतरा होता है। रेत खनन नदियों के इकोसिस्टम को गंभीर रूप से प्रभावित कर रहा है। इसके लिए अवैध रेत खनन की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए एक विशेष निगरानी दल का गठन किया जाना चाहिए। अवैध खनन करने वालों पर कठोर कार्रवाई की जाए और उनके उपकरण जब्त किए जाएं। निर्माण कार्यों के लिए रेत के वैकल्पिक साधनों की खोज और उपयोग को प्रोत्साहित किया जाए। माइन्स एंड मिनरल रेगुलेशन एक्ट 1957 में प्रमुख और उपखनिज को परिभाषित किया है। 1957 से अब तक स्थिति बदल चुकी है और रेत का इस्तेमाल कई गुणा बढ़ गया है। रेत खनन के कारण पर्यावरण पर हो रहे असर की व्यापकता को देखते हुए इसे लघु नहीं, बल्कि प्रमुख खनिज में शामिल कर सख्त पर्यावरणीय अनुमति का प्रावधान किया जाना चाहिए। वर्तमान दौर में नदियां कम्पनियों, कॉर्पोरेट्स और सरकार के मुनाफा कमाने का साधन बन चुकी है। नदियों का प्रशासकीय प्रबंधन की जगह पर्यावरणीय प्रबंधन की दृष्टी से निगरानी तंत्र विकसित करना चाहिए। जिसमें पारिस्थितिकीय तंत्र, जलवायु परिवर्तन और जैव विविधता की समझ रखने वाले विशेषज्ञ को शामिल किया जाना आवश्यक है। नदी पर बने बांधों से कई लाभ मिले हैं, वहीं इसने आदिवासी और मछुआरा समुदायों को प्रभावित किया है और नदी पारिस्थितिक तंत्र को नुकसान पहुंचाया है। डाउन टू अर्थ के रिचर्ड महापात्रा के अनुसार दुनिया भर में नदियों पर अब तक 62,000 बड़े बांध और लाखों छोटे अवरोध बनाए जा चुके हैं। डेम रिमूवल यूरोप ( डीआरई) के अनुसार, 2024 में 23 देशों ने 542 बाधाओं को हटाया है। नदियों के स्वास्थ्य को बहाल करने के लिए बांधों और अवरोधों को हटाना अब एक तेजी से स्वीकार किया जा रहा उपाय बन चुका है, और इसमें खास तौर पर यूरोप और उत्तर अमेरिका में तेजी आई है, जहां पुराने, असुरक्षित, अनुपयोगी या आर्थिक रूप से अलाभकारी बांधों को हटाया जा रहा है।
नर्मदा नदी आज मानवीय हस्तक्षेप, जलवायु परिवर्तन और अंधाधुंध दोहन के कारण गहरे पारिस्थितिकी संकट से जूझ रही है। नर्मदा घाटी में 30 बड़े बांध प्रस्तावित है। इसमें से कई बड़े बांध बनाए जा चुके हैं। अत: उन सभी बांधों का नर्मदा नदी पर पङने वाले उसके वहन क्षमता और संचयी प्रभावों (कम्यूलेटिव ईम्पेकट) का एकत्रित अध्ययन पर्यावरणीय दृष्टि से आवश्यक है। अत: नर्मदा घाटी में निर्मित हुए बांधों के प्रभाव को एकत्रित अध्ययन के बाद ही कोई अन्य बांध बनाने पर विचार होना चाहिए। मछली जलीय पर्यावरण पर आश्रित जलीय जीव है तथा जलचर पर्यावरण को संतुलित रखने में इसकी बहुत महत्वपूर्ण भूमिका होती है। जिस पानी में मछली नहीं हो तो निश्चित ही उस पानी की जल जैविक स्थिति सामान्य नहीं है। वैज्ञानिकों द्वारा मछली को जीवन सूचक (बायोइंडीकेटर) माना गया है। अमरकंटक से निकलकर खंभात की खाड़ी में गिरने वाली नर्मदा नदी पर गत दशकों में अलग- अलग बांध बनने के बाद इसके पानी का प्राकृतिक बहाव में रुकावट आई है, जिससे मध्यप्रदेश की राजकीय मछली महाशीर के अस्तित्व पर संकट आ गया है। राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण ने भारत में नदियों के संरक्षण के लिए कई महत्वपूर्ण आदेश दिए हैं। इन आदेशों का उद्देश्य मुख्य रूप से जैसे नदी प्रदूषण रोकना, अवैध खनन नियंत्रित करना, अपशिष्ट प्रबंधन सुनिश्चित करना और जलधाराओं को अविरल बनाए रखना है।
भारत में नदियों की रक्षा के लिए प्रदूषण नियंत्रण, प्रवाह संरक्षण, तट प्रबंधन, जनभागीदारी और कानूनी उपाय आवश्यक हैं। सरकार ने नमामि गंगे जैसी योजनाएं शुरू की हैं, परंतु सफलता तभी मिलेगी जब स्थानीय समुदाय, सरकार, उद्योग और नागरिक मिलकर नदी को संसाधन नहीं, बल्कि जीवन के रूप में संरक्षित करें। नदियां केवल पानी का स्रोत नहीं हैं, वे सभ्यता, संस्कृति, कृषि, जैव विविधता और करोड़ों लोगों की आजीविका का आधार हैं। इसलिए नदी संरक्षण को केवल प्रदूषण नियंत्रण या नदी-सफाई के अभियानों तक सीमित नहीं किया जा सकता। नदी की वास्तविक सेहत उसके अविरल प्रवाह, निर्मल जल, प्राकृतिक जलधाराओं, भूजल पुनर्भरण, जैव विविधता और उससे जुड़े समुदायों के अधिकारों से तय होती है। बड़ी नदियों को बचाने के लिए उनकी छोटी सहायक नदियों, जलधाराओं और जलग्रहण क्षेत्रों को बचाना होगा। रेत खनन, प्रदूषण, अतिक्रमण, अनियोजित शहरीकरण और बांधों के संचयी प्रभावों का समग्र मूल्यांकन किए बिना नदी प्रबंधन अधूरा रहेगा। नर्मदा जैसी नदियों के मामले में प्रत्येक परियोजना को अलग-अलग देखने के बजाय पूरे नदी घाटी पर पड़ने वाले संचयी प्रभाव का अध्ययन जरूरी है। नदी संरक्षण की नीति में स्थानीय समुदायों, मछुआरों, किसानों और आदिवासी समाज की भागीदारी को केंद्र में रखना होगा। नदी को केवल आर्थिक उपयोग की वस्तु मानने के बजाय एक जीवंत पारिस्थितिक तंत्र के रूप में देखने की दृष्टि विकसित करनी होगी। विश्व नदी दिवस हमें इसी बुनियादी सवाल की ओर लौटने का अवसर देता है कि हम नदियों से कितना ले सकते हैं, यह पूछने के साथ यह भी तय करना होगा कि नदियों को जीवित रखने के लिए हम कितना वापस देंगे। आखिर नदी बचेगी तभी जल बचेगा, जल बचेगा तभी जीवन और सभ्यता बचेगी।
(लेखक बरगी बांध विस्थापित एवं प्रभावित संघ से)


