हिमालय की चेतावनी पर नदियों की प्रतिक्रिया
नेपाल, भारत, बांग्लादेश और चीन को मिलकर सीमा-पार काम करने वाली चेतावनी व्यवस्था बनानी होगी।

- प्रकाश दहाल
नेपाल, भारत, बांग्लादेश और चीन को मिलकर सीमा-पार काम करने वाली चेतावनी व्यवस्था बनानी होगी। इसके लिए उपग्रहों से प्राप्त जानकारी की साझा निगरानी होनी चाहिए। ग्लेशियरों और हिमनदीय झीलों की संयुक्त निगरानी होनी चाहिए। नदियों के जलस्तर और प्रवाह से जुड़े आंकड़े साझा किए जाने चाहिए। खतरनाक झीलों के बनने या ऊपर की ओर नदी का रास्ता अचानक बंद होने की तत्काल सूचना देनी चाहिए।
हिमालय की एक खूबी है। वह पहले हमें चेतावनी देता है और फिर उस चेतावनी को नजरअंदाज करने की भारी कीमत वसूलता है। 26 अगस्त की आपदा ऐसी कई चेतावनियों की सबसे ताजा कड़ी थी, जिन्हें हमने सुनना नहीं चाहा। यह सिर्फ अचानक आई बाढ़ नहीं थी। ऐसा लगता है कि यह पहाड़ों में हुई घटनाओं की एक के बाद एक जुड़ती श्रृंखला थी। तिब्बती क्षेत्र में बर्फ और चट्टानों के एक बड़े हिमस्खलन या ग्लेशियर के टूटने से भारी मात्रा में बर्फ, चट्टान, कीचड़ और मलबा ल्हेंदे नदी में जा गिरा। इससे नदी का रास्ता बंद हो गया और एक अस्थायी झील बन गई। मलबे के पीछे पानी जमा होता गया। जब प्राकृतिक बांध पानी का दबाव और नहीं सह सका, तो वह टूट गया। इसके बाद पानी, बर्फ, कीचड़ और मलबा भोटेकोशी और त्रिशूली नदी प्रणालियों में तेजी से नीचे की ओर बह निकला।
खतरा पानी की पहली लहर के गुजर जाने के साथ खत्म नहीं हुआ। आपदा स्थल से ऊपर की ओर एक नई अस्थायी झील बन गई, जिसमें कथित तौर पर लाखों घन मीटर पानी जमा था। अधिकारियों ने एक और अचानक झील फटने की आशंका को लेकर चेतावनी दी। यानी एक आपदा ने एक और छिपी हुई आपदा को जन्म दे दिया। पहाड़ ने अभी बोलना बंद नहीं किया है। उसका संदेश इतना तेज है कि कान के पर्दे तक फट जाएं। यह केवल नेपाल की समस्या नहीं है। यही वह बात है जिसे भोटेकोशी की कहानी के जरिए अब नेपाल की सीमाओं से बाहर ले जाना जरूरी है।
हिमालय राजनीतिक सीमाओं को नहीं मानता। कोई ग्लेशियर तिब्बत में टूट सकता है। मलबे से बना बांध एक देश में बन सकता है, झील दूसरे देश में फट सकती है, नदी उसके परिणामों को भारत और बांग्लादेश तक ले जा सकती है। नदी के पास कोई पासपोर्ट नहीं होता। इसीलिए भारत के सिक्किम में बढ़ती चिंता पर जितना ध्यान दिया जा रहा है, उससे कहीं अधिक ध्यान देने की जरूरत है। सिक्किम के लोग ल्हेंदे - भोटेकोशी क्षेत्र में हुई आपदा का संदेश समझते हैं, लेकिन 'दिल्ली' शायद अभी भी इस तबाही को विकास की दौड़ में होने वाला एक 'साइड इफेक्टÓ मान रही है।
भोटेकोशी की आपदा के बाद सिक्किम के कई समूहों ने नई जलविद्युत परियोजनाओं को रोकने और हिमालयी राज्य में जलविद्युत विकास के सुरक्षा तथा पर्यावरणीय प्रभावों की स्वतंत्र समीक्षा कराने की मांग की है। यह मांग इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि सिक्किम के लोग अक्टूबर 2023 में दक्षिण ल्होनक झील से आई 'ग्लेशियल झील विस्फोट' (ग्लोफ) की तबाही झेल चुके हैं। उस घटना में 1,200 मेगावाट की 'तीस्ता ढ्ढढ्ढढ्ढ जलविद्युत परियोजना' नष्ट हो गई थी और विनाशकारी जलधारा नीचे की ओर बह निकली थी।
सवाल अब यह नहीं है कि क्या हम अत्याधुनिक तकनीक की मदद से बांध बना सकते हैं, बल्कि यह है कि क्या पहाड़ ने हमें इसकी अनुमति दी है? सिक्किम में जो होता है, क्या वह सिक्किम तक ही सीमित रहता है? तीस्ता इसका सबसे अच्छा उदाहरण है। यह नदी हिमालय से निकलती है, सिक्किम और पश्चिम बंगाल से होकर बहती है और अंत में बांग्लादेश में जाकर मिलती है। अनुमान है कि तीस्ता नदी बेसिन करीब 3 करोड़ लोगों का जीवन चलाता है। इनमें दो-तिहाई से अधिक लोग उत्तर-पश्चिमी बांग्लादेश में रहते हैं।
इसलिए बांग्लादेश के लिए ऊपरी हिमालय में होने वाली घटना दूर पहाड़ों की कोई खबर नहीं है। यह एक गंभीर चेतावनी है और नीचे रहने वाले लोगों के लिए तत्काल खतरा पैदा करती है। ग्लेशियर झील के फटने से सिक्किम में बुनियादी ढांचा नष्ट हुआ, पानी की विनाशकारी धारा नीचे की ओर दौड़ी और भारत से बाहर के इलाकों, जिनमें बांग्लादेश भी शामिल था, को प्रभावित किया। ऐसे में पारंपरिक 'पर्यावरणीय प्रभाव आंकलनÓ अब खतरनाक रूप से अपर्याप्त साबित हो सकते हैं। वे आम तौर पर हर परियोजना को अलग-अलग देखकर उसके प्रभावों का आंकलन करते हैं, प्रकृति ऐसा नहीं करती।
भारत और बांग्लादेश वर्षों से तीस्ता को पानी के बंटवारे का मुद्दा मानते हैं, लेकिन अब केवल इतना पर्याप्त नहीं है। तीस्ता को एक साझा जलवायु-जोखिम वाली नदी प्रणाली के रूप में भी देखना होगा। बांग्लादेश का उन ग्लेशियरों, पहाड़ी ढलानों, बांधों और जलाशयों पर बहुत कम प्रभाव है, जो उससे सैकड़ों किलोमीटर ऊपर की ओर स्थित हैं, फिर भी उनके परिणामों का बोझ उसे उठाना पड़ता है। उत्तर बांग्लादेश या पश्चिम बंगाल के किसानों ने बांध को मंजूरी नहीं दी, उन्होंने ग्लेशियर अस्थिर नहीं किए, वातावरण को गर्म नहीं किया, सड़क या सुरंग नहीं बनाई। फिर भी जब इन फैसलों के परिणाम आते हैं, तो हो सकता है कि वही किसान कमर या गर्दन तक भरे बाढ़ के पानी में खड़ा हो।
शायद यही जलवायु न्याय की सबसे कड़वी विडंबना है - जिन लोगों ने समस्या पैदा करने में सबसे कम योगदान दिया है, अक्सर सबसे पहले और सबसे ज्यादा कीमत उन्हें ही चुकानी पड़ती है। कोई यह नहीं कह सकता कि 'ग्लोफÓ का खतरा अज्ञात था। जोखिम की पहचान पहले ही हो चुकी थी। पैसा मंजूर हो चुका था। परियोजनाएं तैयार की जा चुकी थीं। चेतावनियां दी जा चुकी थीं। फिर भी भोटेकोशी की आपदा हुई। सवाल यह है कि क्या सरकारें अपनी प्रतिक्रिया तेजी से बदलते हिमालयी खतरों के हिसाब से दे रही हैं, या फिर पर्यटन से मुनाफा कूटने, हवा-हवाई प्रशासनिक सीमाओं और नौकरशाही की गैर-जिम्मेदार जिम्मेदारियों के आधार पर? ग्लेशियर किसी परियोजना की सीमा को नहीं समझता। अस्थायी झील सरकारी खरीद प्रक्रिया का इंतजार नहीं करती। भूस्खलन किसी दाता संस्था के कैलेंडर से सलाह नहीं लेता और बाढ़ किसी अंतरराष्ट्रीय सीमा पर नहीं रुकती।
हिमालय को एक साझा चेतावनी प्रणाली की जरूरत है। इसका जवाब एक और सम्मेलन और उसके बाद एक और घोषणा नहीं हो सकता। नेपाल, भारत, बांग्लादेश और चीन को मिलकर सीमा-पार काम करने वाली चेतावनी व्यवस्था बनानी होगी। इसके लिए उपग्रहों से प्राप्त जानकारी की साझा निगरानी होनी चाहिए। ग्लेशियरों और हिमनदीय झीलों की संयुक्त निगरानी होनी चाहिए। नदियों के जलस्तर और प्रवाह से जुड़े आंकड़े साझा किए जाने चाहिए। खतरनाक झीलों के बनने या ऊपर की ओर नदी का रास्ता अचानक बंद होने की तत्काल सूचना देनी चाहिए।
सबसे महत्वपूर्ण बात, हिमालय में बुनियादी ढांचा बनाने के लिए एक नया मानक विकसित करना होगा, जिसमें श्रृंखलाबद्ध खतरों को ध्यान में रखा जाए। हर बांध, सड़क और बस्ती को अलग-अलग परियोजना मानकर नहीं, बल्कि पूरे पहाड़ी तंत्र के आपस में जुड़े हिस्सों के रूप में देखा जाना चाहिए। इसलिए जलविद्युत विकास की नए सिरे से समीक्षा करने की सिक्किम की मांग को विकास-विरोधी अभियान कहकर खारिज नहीं किया जाना चाहिए। इसे एक चेतावनी के रूप में लिया जाना चाहिए।
सवाल यह नहीं है कि दक्षिण एशिया को बिजली की जरूरत है या नहीं। सवाल यह है कि क्या हम 21वीं सदी का बुनियादी ढांचा इस आधार पर बना रहे हैं कि कल वाला हिमालय आज भी वैसा ही है। जाहिर है, ऐसा नहीं है। ग्लेशियर बदल रहे हैं। पहाड़ों की ढलानें बदल रही हैं। नदियां बदल रही हैं और खतरे पहले से कहीं अधिक एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। अब सबसे बड़ी गलती यह होगी कि भोटेकोशी की घटना को एक और प्राकृतिक आपदा मान लिया जाए, शोक जताया जाए, राहत की घोषणा की जाए, नष्ट हुई चीजों का फिर से निर्माण किया जाए और अगले पहाड़ के टूटने का इंतजार किया जाए।
अगला पहाड़ सिक्किम में टूट सकता है। अगली अस्थायी झील कहीं और बन सकती है। अगली बाढ़ बांग्लादेश तक पहुंच सकती है और अगली श्रृंखलाबद्ध आपदा भोटेकोशी की तबाही को केवल एक पूर्वाभ्यास जैसी बना सकती है। हिमालय हमें चेतावनी दे चुका है। सवाल यह है कि क्या दक्षिण एशिया उस संदेश को समझेगा, जो हमारी नदियां लगातार दे रही हैं?
(लेखक नेपाल में रहने वाले लोकप्रशासन, मानवाधिकार और विकास के क्षेत्र में काम करने वाले पत्रकार हैं। वे एमनेस्टी इंटरनेशनल के पूर्व कंट्री डायरेक्टर थे।)


