बढ़ता तापमान प्रभावित जीवन!
जलवायु परिवर्तन की चर्चा पूरी दुनिया के स्तर पर व्यापक रूप से की जा रही है। इसे रोकने के लिए और पर्यावरण में संतुलन बनाए रखने के लिए वैज्ञानिक तमाम सुझाव दे रहे हैं।

- सुनील शुक्ल
बढ़ते तापमान के इस दौर में खेती किसानी को बचाए रखने की चुनौतियां भी बढ़ती जा रही हैं। इसके लिए आवश्यक है कि किसानों को समय से मौसम की जानकारी देने, मौसम के अनुकूल फसलों की बुवाई और इसके लिए गुणवत्तापूर्ण बीज उपलब्ध कराना, सिंचाई के साधन उपलब्ध कराने और प्राकृतिक संसाधनों का तर्कसंगत उपयोग के प्रति किसानों को सतर्क करने की पहल होनी चाहिए।
जलवायु परिवर्तन की चर्चा पूरी दुनिया के स्तर पर व्यापक रूप से की जा रही है। इसे रोकने के लिए और पर्यावरण में संतुलन बनाए रखने के लिए वैज्ञानिक तमाम सुझाव दे रहे हैं। हालांकि आम लोगों में इन उपायों को स्वीकार करने और जीवन शैली में परिवर्तन के लिए प्रभावी पहल नहीं दिखती है। इससे जलवायु परिवर्तन के कारण जीवन पर पड़ने वाले प्रभाव दिन-प्रतिदिन गंभीर होते जा रहे हैं । एक अध्ययन के अनुसार बढ़ते तापमान के कारण आम व्यक्ति को 60-90 घंटे की नींद का नुकसान उठाना पड़ रहा है यह चिंताजनक स्थिति है। सामान्य और गहरी नींद पर्याप्त समय के लिए लेना स्वस्थ जीवन का आवश्यक कारक माना गया है । लेकिन बढ़ते तापमान में लोगों के नींद की अवधि को प्रभावित किया है और प्रकारांतर से उनके स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहा है।
बढ़ते तापमान के कारण एक क्षेत्र जो सर्वाधिक प्रभावित है- वह कृषि का क्षेत्र है। भारत में यह स्थिति और चिंताजनक है क्योंकि भारत एक कृषि प्रधान देश है। बढ़ते तापमान के कारण खेतों की नमी, वृक्षों की हरियाली, नदियों के जल संग्रहण क्षेत्रों का संकुचन और पेयजल का संकट चारों तरफ दिखने लगा है। इस कारण मानव जीवन के प्रमुख आधार कृषि और खाद्य सुरक्षा पर संकट आने लगा है। जमीन की नमी में कमी आने से उन फसलों पर सर्वाधिक विपरीत असर पड़ा है जिनकी उत्पादकता और गुणवत्ता के लिए जमीन की नमी आवश्यक होती है। इन फसलों में सबसे प्रमुख है-धान की खेती। जमीन में नमी की कमी और बढ़ते तापमान के कारण न केवल धान की फसल की वृद्धि रुक जाती है बल्कि उसकी उत्पादकता भी प्रभावित होती है। इसी तरह बढ़ते तापमान के कारण गेंहू की फसल के जल्दी पक जाने और उत्पादकता घट जाने की बात लगातार सामने आ रही है। पंजाब, हरियाणा, उत्तरप्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश, छतीसगढ़ और झारखंड जैसे राज्यों में लू की तीव्रता प्रतिवर्ष बढ़ती जा रही है और इन राज्यों में धान और गेहूं दोनों की पैदावार प्रभावित हो रही है।
बढ़ते तापमान से न केवल फसलों की उत्पादकता प्रभावित हो रही है बल्कि मानव श्रम की अवधि और पशुधन पर भी विपरीत असर पड़ रहा है। असहनीय गर्मी के कारण निर्माण क्षेत्र, कल कारखानों के श्रम को और कृषि क्षेत्र में काम करने वाले श्रमिकों के काम के घंटे कम होते जा रहे हैं। ऐसे में ग्रामीण क्षेत्रों से पलायन और शहरी क्षेत्रों में जन दबाव बढ़ने की स्थिति बनती जा रही है। बढ़ते तापमान से दूध का उत्पादन भी घट रहा है, पक्षियों की मृत्युदर बढ़ रही है और पशुधन पर भी विपरीत असर पड़ रहा है।
जलवायु परिवर्तन के प्रमुख कारणों में हरियाली का घटता क्षेत्रफल, पेड़ों की अंधाधुंध कटाई, प्राकृतिक संसाधनों का बेहिसाब दोहन और भू-जल संरक्षण के प्रति लापरवाह रवैया शामिल है। इसके लिए काफी हद तक संसाधनहीन गरीब, कम जोत वाले किसान और खेतिहर मजदूर सबसे अधिक जिम्मेदार माने जाते हैं। लेकिन यह उनकी विवशता है। यह भी तथ्यपरक है कि खराब होते पर्यावरण का सर्वाधिक नुकसान इसी समूह को उठाना पड़ता है।
बढ़ते तापमान के इस दौर में खेती किसानी को बचाए रखने की चुनौतियां भी बढ़ती जा रही हैं। इसके लिए आवश्यक है कि किसानों को समय से मौसम की जानकारी देने, मौसम के अनुकूल फसलों की बुवाई और इसके लिए गुणवत्तापूर्ण बीज उपलब्ध कराना, सिंचाई के साधन उपलब्ध कराने और प्राकृतिक संसाधनों का तर्कसंगत उपयोग के प्रति किसानों को सतर्क करने की पहल होनी चाहिए। शहरों में हरित क्षेत्र के विस्तार, वृक्षारोपण को बढ़ावा और प्रदूषण को रोकने के उपायों के प्रति जन-जागरूकता भी आवश्यक है। बढ़ते तापमान से धरती को बचाने की ज़िम्मेदारी सभी के मन में होनी चाहिए धरती को केवल संसाधनों के भंडार के रूप में देखना कतई उचित नहीं है बल्कि इसे जीवन के आधार के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए हरियाली से भरे हुये खेत केवल किसानों को ही उत्साह से नहीं भरते बल्कि मानवता के अस्तित्व को बचाए रखने का भी संदेश देते हैं। बढ़ते तापमान के इस दौर में खेत झुलस रहे हैं इन्हें बचाने का संकल्प सभी को लेना होगा।
बढ़ते तापमान का असर कृषि के साथ-साथ जल संचयन पर भी पड़ रहा है। उदाहरण के तौर पर उत्तरप्रदेश में कम वर्षा के कारण विभिन्न बांधों में जल संग्रहण की मात्रा में कमी और नदियों के सूख जाने की घटनाएं सामने आ रही हैं। उत्तर प्रदेश में लगभग 150 बांध हैं इनमें 71 बड़े बांध हैं। इनकी जल संग्रहण क्षमता 10895 मिलियन क्यूबिक मीटर है इस समय इनकी क्षमता का केवल 27प्रतिशत पानी ही संग्रहीत है। इसी तरह गंगा, यमुना, घाघरा, राप्ती, दंडक और शारदा नदियों में बरसात के अलावा अन्य मौसमों में पानी का प्रवाह बहुत कम हो जाता है। छोटी नदियों में केवल बरसात के दिनों में ही पानी दिखता है गर्मी के दिनों में वे नदियां सूख सी जाती है। जिनका जल क्षेत्र पर्वतीय नहीं है। यही स्थिति बिहार की भी है। राज्य में 30 छोटे-बड़े बांध है। गर्मी के दिनों में केवल बांका जिले के ओढनी जलाशय में उसकी क्षमता का 60प्रतिशत जल संग्रहण था। सभी बांध बरसात के पानी पर निर्भर है। गर्मी के दिनों में किसी भी बांध में जल संग्रहण क्षमता के अनुसार पानी नहीं था। 8 बांध तो पूरी तरह सूख गए। राज्य की 81 छोटी-बड़ी नदियों में से 22 सूखी पड़ी हैं। बरसात के दिनों में इन नदियों में रौनक लौटती है। 23 नदियों में नापने लायक पानी भी नहीं है।
जल संग्रहण क्षेत्रों में अतिक्रमण अवैध निर्माण और अवैध बसाहट के कारण स्थिति बद से बदतर होती जा रही है। इसी तरह बांधों में रिसाव को रोकने के लिए त्वरित और प्रभावी कार्रवाई में भी कमी दिखती है। राज्य में इस कारण भूजल के उपयोग की प्रवृत्ति लगातार बढ़ती जा रही है। बढ़ते तापमान और नदियों और जलाशयों में पानी की कमी के कारण भू-जल का बेहिसाब दोहन हो रहा है जो चिंताजनक है।
जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ते तापमान की वजह से न केवल मैदानी और पर्वतीय इलाके ही प्रभावित हैं वरन इसका प्रतिकूल असर समुद्र तटीय इलाकों पर भी पड़ रहा है। समुद्र के सतह का बढ़ता तापमान तटीय इलाकों के जनजीवन को बुरी तरह प्रभावित कर रहा है। इन इलाकों में बढ़ते तापमान के कारण अधिकतम तापमान में 1.5 डिग्री सेल्सियस की तापमान वृद्धि की सीमा समय से पहले छू लेने की आशंका बढ़ती जा रही है। इस सीमा को वैज्ञानिक पृथ्वी के लिए खतरनाक मानते हैं। देश में 40 समुद्र तटीय जिलों में गर्मी के दौरान अधिकतम तापमान में 1 डिग्री सेल्सियस से अधिक वृद्धि महसूस किया गया। इससे गर्मी का दबाव ऊर्जा की बढ़ती खपत, श्रम उत्पादकता में कमी और स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं बढ़ती हैं। बढ़ते तापमान से तटीय इलाकों में भारी वर्षा की अवधि में विस्तार दिखता है। एक अनुमान के अनुसार यदि ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन वर्तमान स्वरूप में जारी रहा तो वर्ष 2050 तक वैश्विक समुद्र स्तर 15 सेंमी तक बढ़ सकता है। तटीय इलाकों में यह परिवर्तन जन जीवन पर गहरा असर डालेगा। ऐसे में यह सभी की ज़िम्मेदारी है कि पर्यावरण को बचाने और तापमान को नियंत्रित करने में अपनी-अपनी भूमिका अदा करें। एक पेड़ मां के नाम नारे के साथ-साथ वनों को बचाने का भी संकल्प लेना होगा। छतीसगढ़ के हसदेव के वनों के कटान और अंडमान निकोबार में व्यापक रूप से पेड़ों की कटाई की घटनाओं से पर्यावरण पर कितना प्रतिकूल असर पड़ेगा इसकी कल्पना सभी को करनी होगी। विकास और पेड़ों की कटाई के बीच संतुलन बनाकर रखनी होगी अन्यथा मानवता पर गहराता संकट दिन-प्रतिदिन गंभीर होता जाएगा।


