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त्यौहार के समय जरूरी चीजों की बढ़ती कीमतें परिवारों के बजट पर भारी

भारत में त्यौहार एक महत्वपूर्ण परम्परा है, सिर्फ जश्न मनाने का मौका नहीं। इसलिए इस दौरान परिवार नए कपड़े, मिठाइयां, सजावट के सामान और उपहार खरीदने पर काफी पैसा खर्च करते हैं

त्यौहार के समय जरूरी चीजों की बढ़ती कीमतें परिवारों के बजट पर भारी
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  • कल्याणी शंकर

त्यौहारी मौसम के दौरान आने वाली ये आर्थिक चुनौतियां उन छोटे व्यवसायों को प्रभावित कर सकती हैं, जो पूरी तरह से अपनी बिक्री पर निर्भर हैं। बढ़ती कीमतें मुनाफे के मार्जिन को कम कर सकती हैं, लेकिन ये हाथ से बनी वस्तुओं के महत्व को भी उजागर करती हैं। अनोखे और उच्च गुणवत्ता वाले उत्पाद पेश करके, स्थानीय विक्रेता उन ग्राहकों को आकर्षित कर सकते हैं जो असली और पारंपरिक चीजों की तलाश में हैं।

भारत में त्यौहार एक महत्वपूर्ण परम्परा है, सिर्फ जश्न मनाने का मौका नहीं। इसलिए इस दौरान परिवार नए कपड़े, मिठाइयां, सजावट के सामान और उपहार खरीदने पर काफी पैसा खर्च करते हैं।

हालांकि, बढ़ती कीमतें और महंगाई उपभोक्ताओं को अपना बजट और खरीदारी के तरीके बदलने पर मजबूर कर रही हैं। कई परिवार अब त्यौहारों को छोटे स्तर पर मना रहे हैं और सस्ती चीजें तलाश रहे हैं। मौसम के अनिश्चित मिजाज के कारण प्याज, लहसुन और अदरक जैसी जरूरी खाद्य वस्तुओं की कीमतों में भारी उछाल आया है।

इसके अलावा, वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें बढ़ रही हैं और भारतीय रुपया कमजोर हो रहा है। इससे परिवहन और खनिज तेल की लागत बढ़ गई है। थोक बाजार में खनिज तेल की कीमतें पिछले साल के मुकाबले करीब 40 प्रतिशत तक बढ़ गई हैं।

कोर महंगाई दर बढ़कर 4.6 प्रतिशत हो गई है, जिसका असर खाने-पीने की चीजों, ईंधन, सेवाओं और अन्य सामानों की कीमतों पर पड़ रहा है। महंगाई को प्रभावी ढंग से नियंत्रित करने के लिए सिर्फ मौद्रिक नीति काफी नहीं है। इसके लिए समन्वित राजकोषीय उपायों की भी जरूरत है। इसमें नकदी प्रवाह का प्रबंधन, करों में बदलाव, और कृषि तथा आपूर्ति श्रृंखला में सुधार जैसे कदम शामिल हैं।

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की मौद्रिक नीति समिति ने रेपोरेट में 25 बेसिस पॉइंट्स की बढ़ोतरी करके इसे 5.50 प्रतिशत कर दिया है। लगभग चार वर्षों में यह पहली बार है जब दरों में बढ़ोतरी की गई है। नीतिगत रुख को कड़ा से बदल कर नरपेक्ष करने का मतलब है कि निकट भविष्य में दरों में कटौती की संभावना कम है। मध्य पूर्व में चल रहे संघर्ष और कमजोर मानसून के कारण खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ी हैं, जिससे महंगाई को लेकर चिंताएं और गहरी हो गई हैं। नतीजतन, अगले एक साल में दरों में 100 बेसिस पॉइंट्स से ज्यादा की और बढ़ोतरी होने की उम्मीद है। सितंबर में थोक महंगाई दर अगस्त के 9.92 प्रतिशत से बढ़कर 11.39प्रतिशत हो गई, जिसका मुख्य कारण तेल की कीमतों में 57.32 प्रतिशत की भारी वृद्धि थी।

आरबीआई प्रमुख संजय मल्होत्रा ने कहा कि भविष्य में दरों में बढ़ोतरी आर्थिक विकास और महंगाई के रुझानों पर निर्भर करेगी। अब बड़ा सवाल यह है कि सितंबर में आपूर्तिकर्ताओं द्वारा स्वीकार की गई कीमतों में बढ़ोतरी का, उपभोक्ताओं के लिए कीमतों और बिजली के बिलों पर कितना असर पड़ेगा?

त्यौहारी मौसम के दौरान आने वाली ये आर्थिक चुनौतियां उन छोटे व्यवसायों को प्रभावित कर सकती हैं, जो पूरी तरह से अपनी बिक्री पर निर्भर हैं। बढ़ती कीमतें मुनाफे के मार्जिन को कम कर सकती हैं, लेकिन ये हाथ से बनी वस्तुओं के महत्व को भी उजागर करती हैं। अनोखे और उच्च गुणवत्ता वाले उत्पाद पेश करके, स्थानीय विक्रेता उन ग्राहकों को आकर्षित कर सकते हैं जो असली और पारंपरिक चीजों की तलाश में हैं।

वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला की समस्याओं और घरेलू नीतियों ने भारत में महंगाई पर काफी असर डाला है। सितंबर 2023 में, भारतीय रिज़र्व बैंक ने उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित महंगाई दर 6.2 प्रतिशत बताई, जो इसके 2-6प्रतिशत के लक्ष्य दायरे से अधिक है। यह वृद्धि मुख्य रूप से भोजन, ईंधन और आवश्यक वस्तुओं की ऊंची कीमतों के कारण हुई है, जिसमें खाद्य महंगाई दर लगभग 7.8 प्रतिशत रही है।

हाल ही में उठाए गए कदमों में खाना पकाने की गैस और अनाज जैसी आवश्यक वस्तुओं पर टैक्स में कटौती और सब्सिडी देना शामिल है। भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) ने त्यौहारी मौसम से पहले आपूर्ति को सुचारू बनाए रखने और महंगाई को कम करने के लिए खरीद के प्रयासों को तेज कर दिया है।

भारतीय रिज़र्व बैंक ने 2026-27 के लिए 7.1 प्रतिशत की आर्थिक विकास दर का अनुमान लगाया है, जिसमें खुदरा महंगाई दर 5.2 प्रतिशत रहने की उम्मीद है। हालांकि, साल की आखिरी तिमाही (अक्टूबर से दिसंबर) में महंगाई बढ़कर 6 प्रतिशत तक पहुंच सकती है। आरबीआई प्रमुख ने जोर देकर कहा कि भले ही अर्थव्यवस्था मजबूत है, लेकिन बढ़ती महंगाई अभी भी चिंता का विषय बनी हुई है।

खुदरा विक्रेता इन आर्थिक रुझानों के अनुसार खुद को ढाल रहे हैं। वे आवश्यक वस्तुओं पर 'बंडल डील' और छूट देकर ग्राहकों को 'पैसे की सही कीमत' देने पर जोर दे रहे हैं। इस रणनीति से मध्यम श्रेणी के उत्पादों की बिक्री में 15 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जबकि विलासितापूर्ण वस्तुओं की मांग में कमी आई है। स्थानीय बाजार और कारीगर इन आर्थिक चुनौतियों के बीच खुद को ढाल रहे हैं। उनके लिए त्यौहार का समय उनकी सालाना कमाई का लगभग 30 प्रतिशत हिस्सा होता है।

इंस्टाग्राम और पिनटेरेस्ट जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ऐसे सुझावों से भरे पड़े हैं, जो इस दौरान लोगों को रचनात्मकता और संसाधनों के बेहतर उपयोग के लिए प्रोत्साहित करते हैं।

सरकार ने खाना पकाने की गैस और अनाज जैसी जरूरी चीजों पर टैक्स में कटौती और सब्सिडी लागू की है। भारतीय खाद्य निगम ने भी आपूर्ति को लगातार बनाए रखने के लिए खरीद के प्रयासों को बढ़ाया है। इन उपायों का उद्देश्य त्यौहारी मौसम के करीब आते ही महंगाई को नियंत्रित करना है।

उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय ने ग्राहकों को कीमतों के रुझानों के बारे में जागरूक करने और खरीदारी के लिए दिशा-निर्देश देने के लिए अभियान शुरू किए हैं, ताकि आर्थिक चुनौतियां त्यौहारों की खुशियों पर भारी न पड़ें।

शिपिंग में रुकावटों, उर्वरकों की ऊंची लागत और 'अलनीनो' के प्रभावों के कारण 2027 तक वैश्विक खाद्य महंगाई बढ़ने की आशंका है। इंडोनेशियाई चावल और भारतीय चीनी की कीमतें रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गई हैं, और मिस्र में ब्रेड की कीमतों में 25 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। स्टॉक में कमी और आयात बढ़ने के कारण कीमतों में और उछाल आने का अनुमान है। अपनी ताजा रिपोर्ट में, आरबीआई ने ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच महंगाई दर में अंतर को रेखांकित किया है, जिसमें ग्रामीण इलाकों में महंगाई अधिक देखी गई है।

इन समस्याओं से निपटने के लिए, सब्जियों जैसी जल्दी खराब होने वाली वस्तुओं के भंडारण, प्रसंस्करण और वितरण के बुनियादी ढांचे में सुधार करना जरूरी है। इसके अलावा, घरेलू स्तर पर तिलहन का उत्पादन बढ़ाकर खाद्य तेल के आयात पर निर्भरता कम करना भी बहुत महत्वपूर्ण है। कृषि, लॉजिस्टिक्स और खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्रों में मौजूद बाधाओं को दूर करना आवश्यक है। औपचारिक वित्तीय सेवाओं तक पहुंच बढ़ाने से अनौपचारिक क्षेत्र में कीमतों के उतार-चढ़ाव को कम करने में भी मदद मिल सकती है।

इन चुनौतियों के बावजूद, त्यौहारों के मौसम में उपभोक्ता और व्यवसाय लगातार लचीलापन और रचनात्मकता दिखा रहे हैं।


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