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टाटा साम्राज्य में विद्रोह और विभाजन की दरार

1988-89 में भारत एक खोज सीरियल के साथ टाटा ग्रुप ने 'इस्पात भी हम बनाते हैं' के जरिये प्रेरक संदेश दिया था।

टाटा साम्राज्य में विद्रोह और विभाजन की दरार
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  • राजेश पांडेय

विवादों और अप्रत्याशित परिणामों की आशंकाओं के बीच इस साल टाटा ग्रुप को लोग एक अच्छे टीवी सीरियल के लिए भी याद कर रहे हैं। 1988-89 में भारत एक खोज सीरियल के साथ टाटा ग्रुप ने 'इस्पात भी हम बनाते हैं' के जरिये प्रेरक संदेश दिया था। मई 2026 में ओटीटी पर दिखाए गए सीरियल-मेड इन इंडिया- अ टाइटन स्टोरी में कंपनी के आधुनिक दौर की यात्रा का एक हिस्सा सामने रखा गया है।

लगभग चार दशक पहले दूरदर्शन पर हर रविवार सुबह 11 बजे आने वाले श्याम बेनेगल के शो-भारत एक खोज के अंत में भारत के प्रमुख औद्योगिक समूह टाटा ग्रुप के मानवीय पक्ष की तस्वीर पेश की जाती थी। इसमें कंपनी आम नागरिकों की मदद, सामुदायिक बुनियादी ढांचे के निर्माण और आधुनिक भारत के निर्माण से जुड़ी गतिविधियों का ब्योरा सामने रखती थी। अंत में छोटे परदे पर विनम्र लहजे में एक आवाज गूंजती थी-इस्पात भी हम बनाते हैं। 1988-89 में प्रसारित 53 एपिसोड का भारत एक खोज सीरियल पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की किताब-भारत एक खोज (डिस्कवरी ऑफ इंडिया) पर आधारित था। भारत के इतिहास की कहानी बताने वाले सीरियल को टाटा ग्रुप ने प्रायोजित किया था। टाटा स्टील के प्रमोशन का दिल छू लेने वाला अंदाज ग्रुप की प्रकृति और उसकी सोच को भी अप्रत्यक्ष तरीके से जाहिर करता था।

इन दिनों टाटा ग्रुप सुर्खियों में है। ग्रुप के भीतर जबर्दस्त सत्ता संघर्ष चल रहा है। एक माह पहले ग्रुप की होल्डिंग कंपनी टाटा संस के चेयरमैन एन चंद्रशेखरन ने अपना कार्यकाल खत्म होने पर विदा लेने का ऐलान किया था। लेकिन कंपनी के बोर्ड ने चंद्रशेखरन के पांच साल के कार्यकाल को मंजूरी दे दी। दरअसल, टाटा संस के बोर्ड ने ग्रुप के सबसे बड़े शेयर होल्डर टाटा ट्रस्ट (66प्रतिशत शेयर) की मर्जी के खिलाफ यह फैसला लिया है। नाटकीय घटनाक्रम के बीच टाटा खानदान के वारिस और टाटा ट्रस्ट के चेयरमैन नोएल टाटा ने फैसले का विरोध किया है।

नेतृत्व पर उठे विवाद ने टाटा साम्राज्य में गहरा संकट पैदा कर दिया है। ग्रुप में अंदरूनी टकराव कुछ समय से चल रहा है। खासतौर से अक्टूबर 2024 में रतन टाटा की मृत्यु के बाद सत्ता संघर्ष तेज हो गया है। नोएल टाटा और चंद्रशेखरन के बीच कई मुद्दों पर तीखे मतभेद हैं।

टाटा में इस तरह का सत्ता संघर्ष पहले भी होता रहा है। रतन टाटा के चेयरमैन बनने के बाद कई कंपनियों के शक्तिशाली प्रमुखों को हटना पड़ा था। ये थे- टिस्को, टाटा स्टील के चेयरमैन रूसी मोदी, टाटा केमिकल्स, टाटा टी के दरबारी सेठ, इंडियन होटल्स/ ताज ग्रुप के अजित केरकर और टाटा संस के साइरस मिस्त्री। इनमें केवल मिस्त्री को रतन टाटा ने नियुक्त किया था। मिस्त्री ने उन्हें हटाए जाने को अदालत में चुनौती दी थी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने मिस्त्री को हटाने का फैसला सही ठहराया था। दरअसल, एक सड़क दुर्घटना में मृत मिस्त्री टाटा में 18 प्रतिशत हिस्सेदारी रखने वाले शापुरजी पलोनजी ग्रुप के उत्तराधिकारी थे।

टाटा के अंदरूनी विवाद के साथ एक अन्य महत्वपूर्ण मुद्दा जुड़ गया है। इसके नतीजे ग्रुप की स्थिति को बहुत ज्यादा प्रभावित कर सकते हैं। रिजर्व बैंक ने 2021 में एक लाख करोड़ रुपए से अधिक मूल्य की गैर बैंकिंग फाइनेंस कंपनियों (एनबीएफसी) का नियम लागू किया है। इसके तहत बड़ी एनबीएफसी कंपनियों के लिए तीन साल के भीतर शेयर मार्केट में जाना अनिवार्य है। सितंबर 2022 में टाटा संस का वर्गीकरण एनबीएफसी में कर दिया गया। कंपनी ने इसे चुनौती दी है। चंद्रशेखरन और टाटा संस बोर्ड के सदस्य भी कंपनी की शेयर बाजार में लिस्टिंग के पक्ष में हैं। वहीं नोएल टाटा इसके खिलाफ हैं।

ग्रुप की होल्डिंग कंपनी टाटा संस शेयर मार्केट में जाने का लगातार विरोध करती रही है। अगर ऐसा होता है तो बाहरी कंपनियों को इस विराट साम्राज्य पर कब्जा करने का मौका मिल जाएगा। किसी भी कंपनी की होल्डिंग कंपनी कोई प्रोडक्ट नहीं बनाती है। बिजनेस नहीं करती है। वह ग्रुप की सहायक कंपनियों में अपने वोट देने वाले शेयर बनाए रखती है। इसलिए टाटा संस पर कब्जे का मामला अहम है।

टाटा साम्राज्य का स्वर्णिम सफर भारत की आर्थिक यात्रा के विभिन्न पहलुओं से जुड़ा है। उसका समृद्ध अतीत भारत की राजनीतिक स्थिति के कुछ पहलुओं को भी पेश करता है। पारसी व्यवसायी जमेशदजी नुसरवानजी टाटा ने 158 साल पहले ग्रुप की बुनियाद रखी थी। अब नमक, आभूषण से लेकर स्टील बनाने वाले ग्रुप में 26 पब्लिक लिस्टेड कंपनियां हैं। इन सभी कंपनियों का कुल अनुमानित बाजार मूल्य 26 लाख करोड़ रुपए से 31 लाख करोड़ रुपए के बीच है। देश, विदेश में दस लाख कर्मचारियों के ग्रुप की सालाना आय 17 लाख करोड़ रुपए से अधिक है। ग्रुप ने नैतिकता, कारोबारी मूल्यों, उच्च स्तरीय क्वालिटी, कर्मचारी कल्याण और परोपकार को बढ़ावा देने के कारण अलग पहचान बनाई है।

टाटा को बड़ा बिजनेस साम्राज्य बनाने और उसके मूल्य सुरक्षित रखने में कुछ दिग्गजों की भूमिका अहम है। इनमें -जहांगीर रतनजी दादाभाई टाटा (जेआरडी) का नाम सबसे आगे है। उनके बाद रतन टाटा का नाम लिया जा सकता है। जेह के नाम से मशहूर जेआरडी 1938 में केवल 34 साल की आयु में टाटा संस के चेयरमैन बने और 1991 तक शीर्ष पर रहे। 1932 में कराची से मुंबई की हवाई उड़ान के साथ उन्होंने भारत को विश्व के विमानन नक्शे पर खड़ा किया था।

शायद एयर इंडिया टाटा की सभी कंपनियों में उनके दिल के सबसे ज्यादा नजदीक थी। इसलिए 1953 में एयर इंडिया के राष्ट्रीयकरण ने उनका तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से मोहभंग कर दिया। उससे पहले उनके नेहरू से अच्छे रिश्ते थे। जेआरडी की आत्मकथा-जेह- अ लाइफ ऑफ जेआरडी में बख्तियार के दादाभाई उस वक्त के घटनाक्रम पर लिखते हैं कि 5 नवंबर 1952 को संचार मंत्री जगजीवनराम ने जेआरडी से मुलाकात कर फैसले की जानकारी दी थी। जेआरडी आहत थे कि सरकार ने इस मसले पर टाटा से सलाह करने की जरूरत नहीं समझी।

आत्मकथा के अनुसार जेआरडी ने नेहरू से मुलाकात की और साफ शब्दों में अपना असंतोष जताया। लेकिन नेहरू ने कोई आश्वासन नहीं दिया। उन्होंने कुछ दिन बाद जेआरडी को एक पत्र लिखकर उनकी इस धारणा को दूर करने की कोशिश की कि सरकार का फैसला नागर विमानन और विशेष रूप से टाटा एयरलाइंस के खिलाफ साजिश है। नेहरू ने लिखा- हम इस और अन्य मामलों में आपकी मदद चाहते हैं और इरादों पर संदेह और असंतोष अच्छी बात नहीं है। उन्होंने लिखा आपके जैसे पुराने दोस्त की ऐसी सोच से मुझे बहुत ठेस पहुंची है। राष्ट्रीयकरण के बाद नेहरू और जेआरडी के संबंध पहले जैसे नहीं रहे। मतभेदों के बावजूद सरकार ने 1955 में जेआरडी को देश के दूसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान पद्मविभूषण से विभूषित किया था।

सरकार द्वारा लगातार राष्ट्रीयकरण करने और संबंधित कंपनियों को मुआवजा देने की नीतियों से जेआरडी बेहद असंतुष्ट थे। इस बीच मई 1961 में सी राजगोपालाचारी ने जेआरडी से स्वतंत्र पार्टी के लिए समर्थन मांगा। जेआरडी की सोच थी कि देश में कांग्रेस के खिलाफ मजबूत विपक्षी दल होना चाहिए। जेआरडी ने नेहरू को राजाजी का समर्थन करने के अपने फैसले की जानकारी दी। नेहरू का इससे नाराज होना स्वाभाविक था। जेआरडी ने नेहरू को 16 अगस्त 1961 को लिखे पत्र में कहा कि टाटा ने कांग्रेेस का समर्थन करना बंद नहीं किया है। उन्होंने कम्युनिस्ट विकल्प के खतरों के प्रति आगाह करते हुए कहा कि केवल स्वतंत्र पार्टी ही एक जिम्मेदार विपक्षी पार्टी के रूप में उभर सकती है। नेहरू ने इसके जवाब में लिखा कि स्वतंत्र पार्टी सक्षम विपक्ष नहीं बन सकती है। नेहरू का कहना सही साबित हुआ। दस साल बाद स्वतंत्र पार्टी अस्तित्वहीन हो गई।

इतिहास के कुछ और पन्ने टाटा साम्राज्य और सत्ताधीशों के कड़वे रिश्तों के गवाह हैं। नेहरू के निधन के बाद समाजवादी नीतियों को उनकी बेटी इंदिरा गांधी ने आगे बढ़ाया। इंदिरा गांधी से जेआरडी के व्यक्तिगत संबंध अच्छे थे। लेकिन बैंकों के राष्ट्रीयकरण जैसे मुद्दों पर दोनों के बीच गहरे मतभेद थे। इंदिरा गांधी ने जेआरडी को एयर इंडिया से जोड़े रखा था। जेआरडी ने दूसरी कंपनियों पर ज्यादा ध्यान केंद्रित किया। 1970 के दशक में बिड़ला ग्रुप बिक्री और मुनाफे में टाटा से आगे निकल गया।

सरकारों से जेआरडी की खटपट बनी रही। 1978 में प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई की जनता पार्टी सरकार ने जेआरडी को एयरइंडिया और इंडियन एयरलाइंस के बोर्ड से अचानक हटा दिया। मोरारजी जब बंबई के मुख्यमंत्री थे तब उनके और जेआरडी के बीच बंबई की बिजली सप्लाई को लेकर विवाद हो गया था। जेआरडी ने ग्रुप की कंपनियों के चैयरमैन और एमडी को अपने हिसाब से काम करने की खुली छूट दे रखी थी। यह सिलसिला उनके निधन के बाद काफी हद तक जारी रहा। जेआरडी के बाद ग्रुप के चेयरमैन बने रतन टाटा ने देश में केंद्रित ग्रुप को विश्व स्तर की बड़ी कंपनी बनाया। उन्होंने सन् 2000 में टेटले टी, लंदन, 2007 में कोरस स्टील और 2008 में जगुआर लैंड रोवर कंपनी का अधिग्रहण किया। रतन ने जेआरडी के मुकाबले अपने पास ज्यादा अधिकार रखे। रतन के समय विवादित नीरा राडिया टेप में ग्रुप का नाम सामने आया। रतन ने इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में मुकदमा दायर किया था। रतन टाटा द्वारा साइरस मिस्त्री को ग्रुप की कमान सौंपने के बाद विवादों का दायरा बढ़ता गया। अब मामला फिर अदालत में जाने के आसार लग रहे हैं।

विवादों और अप्रत्याशित परिणामों की आशंकाओं के बीच इस साल टाटा ग्रुप को लोग एक अच्छे टीवी सीरियल के लिए भी याद कर रहे हैं। 1988-89 में भारत एक खोज सीरियल के साथ टाटा ग्रुप ने 'इस्पात भी हम बनाते हैंÓ के जरिये प्रेरक संदेश दिया था। मई 2026 में ओटीटी पर दिखाए गए सीरियल-मेड इन इंडिया- अ टाइटन स्टोरी में कंपनी के आधुनिक दौर की यात्रा का एक हिस्सा सामने रखा गया है। सीरियल के पहले सीजन में छह एपिसोड आ चुके हैं। ये बताते हैं कि किस तरह टाइटन ने एक भारतीय ब्रांड की दुनियाभर में पहचान बनाई है। कैसे टाइटन की टीम ने स्विटजरलैंड और यूरोप की घड़ियों को चुनौती देते हुए बताया कि भारत भी एक विश्वस्तरीय प्रोडक्ट बनाने में सक्षम है। इस वक्त टाटा ग्रुप गंभीर संकट का सामना कर रहा है। भारत की अर्थव्यवस्था के बहुत बड़े हिस्से के साथ उसका सीधा संबंध है। वैज्ञानिक सोच, नई पहल,उद्यमिता और मानवीय मूल्यों को आगे बढ़ाने जैसे अमूल्य गुणों की इस परंपरा को सुरक्षित रखने में देश का हित भी है। उद्योगपतियों और व्यवसायियों के हित में कई फैसले करने वाली सरकार से इस दिशा में भी पहल अपेक्षित है।


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