भारतीय कंपनियों पर पाबंदी से अमेरिका को भी नुकसान
चुनाव नजदीक आते ही राजनेता लुभावनी घोषणाएं करते हैं। रियायतों का ढेर लगाते हैं। समर्थकों का भरोसा बनाए रखने के वास्ते उनकी पसंद के फैसले लेते हैं

- राजेश पांडेय
विदेशी छात्रों और कर्मचारियों के खिलाफ ट्रम्प सरकार के सख्त रुख का असर दिखाई पड़ने लगा है। अमेरिकी आईटी कंपनियां दूसरे देशों में अपना काम भेजने लगी हैं। इन कंपनियों का काफी काम भारत आ चुका है। वे भारत और यूरोप में डेटा सेंटर और रिसर्च सुविधाएं खड़ी कर रही हैं। आउटसोर्सिंग में भारतीय कंपनियों का दबदबा इसका सबूत है।
चुनाव नजदीक आते ही राजनेता लुभावनी घोषणाएं करते हैं। रियायतों का ढेर लगाते हैं। समर्थकों का भरोसा बनाए रखने के वास्ते उनकी पसंद के फैसले लेते हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प इन दिनों ऐसा ही कर रहे हैं। वहां नवंबर में संसद के मध्यावधि चुनाव हैं। ट्रम्प की नजर संसद के दोनों सदनों में उनकी रिपब्लिकन पार्टी के बहुमत हासिल करने पर है। लेकिन एक अजीब विरोधाभास उनके सामने है। पिछली तिमाही में अमेरिका की विकास दर 4 प्रतिशत की शानदार रफ्तार से आगे बढ़ी है। बेरोजगारी दर 4प्रतिशत से थोड़ी ज्यादा है। फिर भी, कुछ सर्वे ट्रम्प की रेटिंग में गिरावट दर्शा रहे हैं। डेमोक्रेटिक पार्टी के मुकाबले रिपब्लिकन पार्टी की स्थिति कमजोर बताई गई है।
कई कारणों से ऐसे हालात बन रहे हैं। जीवनयापन का खर्च बढ़ने से लोग असंतुष्ट हैं। तेल, गैस, बिजली के मूल्य आसमान छू रहे हैं। मकानों की कीमत और उनका किराया नई ऊंचाइयों पर है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के खिलाफ लोगों में गुस्सा है। बिजली और पानी की खपत बढ़ाने वाले डेटा सेंटरों का कई राज्यों में विरोध हो रहा है। लिहाजा, ट्रम्प ने वोटरों की भावनाओं को शांत करने के लिए कुछ फैसले लिए हैं। वे अपने माइग्रेेशन विरोधी पुराने एजेंडा को दोहरा रहे हैं। इस माह के दूसरे सप्ताह में अमेरिकी सरकार ने माइक्रोसॉफ्ट, एडोब जैसी आईटी कंपनियों सहित कुछ भारतीय कंपनियों को निशाना बनाया है। इनमें टीसीएस, कॉग्निजेंट, इंफोसिस, विप्रो, एचसीएल और कैपजेमिनी शामिल हैं।
ट्रम्प के दोबारा राष्ट्रपति बनने के बाद अमेरिकी अधिकारियों ने कुछ कंपनियों द्वारा एच-1बी वीजा और पर्म कार्यक्रमों के दुरुपयोग और धोखाधड़ी की जांच शुरू की है। एच-1बी वीजा के तहत अमेरिकी कंपनियां अस्थायी तौर पर विदेशियों की भर्ती कर सकती हैं। परमानेंट लेबर सर्टिफिकेशन प्रोग्राम (पर्म) में ग्रीन कार्ड से विदेशी कर्मचारियों को स्थायी निवास की सुविधा मिलती है। आईटी कंपनियों के लिए इन प्रावधानों पर पाबंदी लगा दी गई है। ट्रम्प प्रशासन की धारणा है कि विदेशी कर्मचारियों पर निर्भरता के कारण अमेरिकी कामगारों को कम जॉब मिल रहे हैं।
सरकार द्वारा आईटी कंपनियों पर प्रतिबंध लगाने के बाद अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वांस ने आग में घी डालने का काम किया। उन्होंने एच-1बी वीजा के तहत आए विदेशी कर्मचारियों को विदेशी बंधुआ कामगार करार दिया। भारतीय विदेश मंत्रालय ने इस पर कड़ी प्रतिक्रिया जताते हुए कहा कि ऐसे कथन अवांछनीय हैं। इस तथ्य की अनदेखी करते हैं कि अमेरिका में कार्यरत भारतीय पेशेवर कर्मचारी उच्च शिक्षित, हुनरमंद हैं और उसकी अर्थव्यवस्था, इनोवेशन के सिस्टम में योगदान देते हैं। टेक्नालॉजी इंडस्ट्री की संस्था नेस्कॉम ने भारत के पक्ष को आगे बढ़ाते हुए कहा कि एच-1 बी वीजा प्रोग्राम ने अमेरिका में कुशल लोगों की कमी को पूरा करने में भूमिका निभाई है।
लंबे समय बाद भारत ने अमेरिका के खिलाफ कोई तीखी टिप्पणी की है। कई मौकों पर ट्रम्प भारत की अहमियत को कम आंकने वाली टिप्पणियां कर चुके हैं। उन्होंने पाकिस्तान के प्रति अनुकूल रुख दिखाया है। पाकिस्तान के खिलाफ भारतीय सेना के ऑपरेशन सिंदूर को रोकने में अमेरिका की मध्यस्थता का बार-बार जिक्र किया है। जबकि भारत कहता रहा कि यह फैसला उसका है। ट्रम्प के रुख से विदेश नीति विशेषज्ञ भी हैरान हैं। उन लोगों को जबर्दस्त आघात लगा जो मानते थे कि ट्रम्प और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच अच्छा तालमेल होने से अमेरिका से रिश्ते और ज्यादा मधुर होंगे। वे सितंबर 2019 में अमेरिका, ह्यूस्टन में ट्रम्प के साथ भारत-अमेरिकी समुदाय की रैली में मोदी द्वारा अब की बार ट्रम्प सरकार का नारा लगाने का जिक्र भी करते हैं। हालांकि, विदेश नीति निजी रिश्तों पर नहीं बल्कि तात्कालिक राष्ट्रीय हितों और शीर्ष नेता के झुकाव पर निर्भर करती है।
1990 के दशक से अमेरिका के राष्ट्रपतियों ने खासकर एशिया में चीन के मुकाबले भारत को खड़ा करने की नीति को आगे बढ़ाया था। ट्रम्प अब ऐसा करने की जरूरत नहीं समझते हैं। वे तो चीन के साथ मिलकर (जी-2) दुनिया पर शासन करने का इरादा जताते हैं। उनकी विदेश नीति भी उनके अस्थिर मिजाज के समान है। उनका एक फैसला इसका सबूत है। उन्होंने अभी हाल में भारत, चीन सहित अन्य देशों पर रूसी तेल खरीदने पर टैरिफ लगाने का फैसला वापस ले लिया है।
रूसी तेल खरीद पर प्रतिबंध के फैसले से पीछे हटने और जेडी वांस द्वारा एच-1 बी वीजा के संबंध में अपने बयान में सुधार करने की घटना से अमेरिकी नीति के विरोधाभास उभरते हैं। वांस ने स्वीकार किया कि वीजा के बारे में उनका बयान अधूरा है। उन्होंने जोर दिया, मेरा निशाना विदेशी कर्मचारी नहीं बल्कि उनका शोषण करने वाली कंपनियां हैं। वांस की निगाह भविष्य पर भी है। उन्हें 2028 के राष्ट्रपति चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी का संभावित उम्मीदवार माना जा रहा है। अलबत्ता, खुद वांस के लिए निजी तौर पर इमिग्रांट्स का विरोध करना असुविधाजनक है। वांस की पत्नी उषा चिलुकुरी भारतीय मूल की हैं। उनके माता-पिता 1970 के दशक में भारत से अमेरिका आकर बसे थे। उषा का जन्म अमेरिका में हुआ है। उनकी वांस से मुलाकात येल यूनिवर्सिटी के लॉ कॉलेज में कानून की पढ़ाई के दौरान हुई थी। दोनों ने 2014 में विवाह किया है।
ट्रम्प एक तरफ तो इमिग्रांट्स का विरोध करते हैं। उसे अपना चुनावी एजेंडा बनाते हैं। दूसरी ओर वे अमेरिकी टेक्नालॉजी में दिग्गज कंपनियों की भूमिका पर सरकार की मुहर लगाते हैं। टेक कंपनियों पर बंदिश का फैसला लेने के कुछ दिन बाद ट्रम्प ने टेक जगत की छह बड़ी हस्तियों को देश के साइंस, टेक्नालॉजी के सबसे बड़े सम्मान से विभूषित किया। इनमें से पांच- टेस्ला के इलोन मस्क, गूगल के सर्जी ब्रिन, एनवीडिया के जेनसेन हुआंग, एएमडी की लीसा सू, माइक्रोसॉफ्ट के सत्या नडेला विदेशी हैं। केवल डेल टेक्नालॉजीस के माइकेल डेल अमेरिका में जन्मे हैं।
अमेरिका को उसकी सांस्कृतिक विविधता और विदेशियों की प्रतिभा ने दुनिया का सबसे ताकतवर देश बनाया है। यहांं इस तथ्य पर गौर करना चाहिए कि साइंस, टेक्नालॉजी और अन्य क्षेत्रों में अमेरिका की तरक्की में विदेशियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। नेशनल साइंस फाउंडेशन के अनुसार 2023 में अमेरिका में साइंस, टेक्नालॉजी, इंजीनियरिंग और मैथमैटिक्स (एसटीइएम) से जुड़े क्षेत्रों में तीन करोड़ 60 लाख कर्मचारी विदेशों में जन्मे थे। वहां इस श्रेणी के भारतीय कर्मचारियों की संख्या सात लाख 27 हजार है। अमेरिका अपने विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में तो विदेशी छात्र चाहता है पर मौजूदा ट्रम्प सरकार उन्हें रोजगार के अवसरों से दूर रखना चाहती है। उनके लिए आए दिन फीस बढ़ाने जैसी मुश्किल खड़ी करती है। इससे अमेरिका को लंबी अवधि में नुकसान होगा।
विदेशी छात्रों और कर्मचारियों के खिलाफ ट्रम्प सरकार के सख्त रुख का असर दिखाई पड़ने लगा है। अमेरिकी आईटी कंपनियां दूसरे देशों में अपना काम भेजने लगी हैं। इन कंपनियों का काफी काम भारत आ चुका है। वे भारत और यूरोप में डेटा सेंटर और रिसर्च सुविधाएं खड़ी कर रही हैं। आउटसोर्सिंग में भारतीय कंपनियों का दबदबा इसका सबूत है। अमेरिका में प्रतिभाओं की कमी से भारत में ग्लोबल कैपेबिलिटी डेटा सेंटर (जीसीसी) का विस्तार हो रहा है। अब ये सेंटर एआई और अन्य क्षेत्रों में काम कर रहे हैं। नेस्कॉम का अनुमान है, भारत में दो हजार से अधिक डेटा सेंटरों में 24 लाख कर्मचारी कार्यरत हैं। इनकी आय नौ लाख करोड़ रुपए से अधिक है। ये आंकड़े लुभावने हैं। लेकिन इनके पीछे भारत की कुछ कमजोरियों को छिपाया नहीं जा सकता है। भारतीय कंपनियां का ज्यादा काम सर्विस सेक्टर से जुड़ा है। टीसीएस और कुछ कंपनियों को छोड़ दें तो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी नई टेक्नालॉजी के मामले में भारतीय कंपनियां पीछे हैं। भारत सरकार और आईटी कंपनियों ने नए इनोवेशन पर ज्यादा साधन नहीं लगाए तो भारत को अमेरिका, चीन जैसे देशों का पिछलग्गू बना रहना पड़ेगा।
बहरहाल, ट्रम्प की नीतियों ने अमेरिका में बड़े वर्ग को चिंतित किया है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है, जरूरी नहीं है कि अगला राष्ट्रपति भले ही वह रिपब्लिकन या डेमोक्रेट हो ट्रम्प के इमिग्रेशन विरोधी एजेंडा को आगे बढ़ाए। अमेरिकी संविधान के मुताबिक दो बार राष्ट्रपति रह चुका व्यक्ति राष्ट्रपति चुनाव नहीं लड़ सकता है। फिर भी, ट्रम्प कई बार संकेत दे चुके हैं कि वे तीसरी बार देश के सर्वोच्च पद पर आने की कोशिश करेंगे। इसके लिए उन्हें संविधान संशोधन करना पड़ेगा। लेकिन, खुद रिपब्लिकन पार्टी इसके खिलाफ है। अमेरिकी राजनीति, न्यायपालिका और जनमत की सजगता को देखते हुए ट्रम्प अपनी इच्छा पूरी नहीं कर सकेंगे।
कई विशेषज्ञ मानते हैं, अमेरिका में विदेशी छात्रों और कर्मचारियों के काम करने की कठोर शर्तों का नतीजा देर-सबेर इनोवेशन के ढांचे पर पड़ेगा। दूसरे देशों में ज्यादा काम जाने से अमेरिका को संसाधनों का नुकसान होगा। कुछ समय बाद वह टेक्नालॉजी और अन्य क्षेत्रों की होड़ में चीन से पिछड़ जाएगा। पिछले कुछ वर्षों में चीन सभी क्षेत्रों में अमेरिका के प्रमुख प्रतिद्वंद्वी के बतौर उभरा है। साइंस, टेक्नालॉजी में उसने लंबी छलांग लगाई है। उसकी अर्थव्यवस्था भी मजबूत है। इधर, बीते दो-तीन सालों से चीन की आर्थिक स्थिति कमजोर पड़ी है। देश में उपभोक्ता खर्च और निवेश में गिरावट आई है। फिर भी, ऐसी स्थिति अस्थायी साबित हो सकती है। अगर अमेरिका ने इमिग्रेशन पर ऐसा ही रुख अपनाया तो उसे कम्युनिस्ट चीन की बढ़ती चुनौती का सामना करने में मुश्किल होगी। ट्रम्प सरकार के फैसले किसी खास एजेंडा को आगे बढ़ाने वाले सभी देशों के लिए सबक हैं। धर्म, जाति, नस्ल या रंग पर आधारित एजेंडा तात्कालिक फायदा तो पहुंचा सकता है पर बाद में वह नुकसानदेह साबित होगा।


