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राजस्थान की अनोखी तालाब संस्कृति

राजस्थान की पानीदार तालाब संस्कृति काफी पुरानी और अनोखी है। मुझे कुछ वर्ष पूर्व वहां के तालाबों को देखने का मौका मिला था।

राजस्थान की अनोखी तालाब संस्कृति
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  • बाबा मायाराम

रामसर गांव के युवाओं की तालाब के आसपास पेड़ लगाने की मुहिम ने क्षेत्र के लोगों को नई राह दिखाई है। इससे न केवल तालाब का भूदृश्य हरा-भरा हो रहा है, पक्षियों का यहां बसेरा है, बल्कि तालाब भी काफी साफ-स्वच्छ व सुंदर है। इससे यह भी पता चलता है कि इतनी पुरानी तालाब संस्कृति की समाज ने कैसे सार संभाल की है। उसे बचाया है, और यह उनकी दैनंदिन जरूरत भी है। मिल- जुलकर इसकी साफ- सफाई और पानी के इस्तेमाल की नियमावली बनाई है।

राजस्थान की पानीदार तालाब संस्कृति काफी पुरानी और अनोखी है। मुझे कुछ वर्ष पूर्व वहां के तालाबों को देखने का मौका मिला था। वहां उन्नति नामक एक संस्था ने तालाब यात्रा की थी, जिसमें यहां के कुछ जिलों के कई तालाब देखे थे। वहां के लोगों से मिले थे और उनसे बात की थी। आज के कॉलम में इस तालाब संस्कृति पर बात करना चाहूंगा, जिससे तालाब, जनजीवन और उसकी सार-संभाल कैसे की जा सके, यह पता चल सके।

मैं यहां करीब हफ्ते भर गांव-गांव घूमा, तालाब देखे, ग्रामीणों से मिले। उसकी सार-संभाल की व्यवस्था की जानकारी ली। तालाबों के अलिखित पर कड़े नियम कायदे जानें। तालाब संस्कृति से रूबरू हुए। यह देखकर मैं आश्चर्यचकित था कि यह संस्कृ ति सैंकड़ों सालों से चल रही है। बिना रोक-टोक और निरंतर, न कोई विवाद और न कोई झगड़ा। अगर कोई विवाद हुआ भी तो आपस में मिल-बैठकर निबटा लिया जाता है।

इसी तरह, छत्तीसगढ़ और ओडिशा में भी पानीदार संस्कृति अनोखी है, तीज—त्योहार से जुड़ी हुई है, हालांकि अब तालाब कम होते जा रहे हैं और सूख भी रहे हैं। इसी संदर्भ में राजस्थान की तालाब संस्कृति से सीखा जाना जरूरी है। जो अब भी जारी है, और बरसों से लोगों ने उसे संजोया और संवारा है। नई पीढ़ी भी इसे संभाल रही है। यह तालाब की कहानी उसी की है।

अरावली पर्वतमाला के पश्चिम में है नागौर जिला। इस जिले का छोटा सा गांव है रामसर। यहां के तालाब की सार-संभाल का जिम्मा युवाओं ने ले लिया है। वे न केवल इस तालाब की देखरेख कर रहे हैं बल्कि उसके आसपास पौधारोपण की मुहिम चला रहे हैं। इस मुहिम का फौरी असर यह हुआ है कि तालाब तो स्वच्छ व साफ है ही,पक्षी भी हैं। इस क्षेत्र के युवाओं में पर्यावरण के प्रति जागरूकता भी दिखाई दे रही है।

रामसर गांव के तालाब का नाम है राम सरोवर। नागौर का यह थार का रेगिस्तान सबसे कम बारिश वाले इलाकों में से है। इस इलाके में पानी कम है, गरमी ज्यादा है। लेकिन इसी के मद्देनजर यहां बारिश के पानी के संग्रहण की काफी अच्छी पारंपरिक व्यवस्था देखने को मिलती है। घरों में टांका हैं तो गांव में तालाब हैं, जहां से सभी को पानी उपलब्ध होता है।

रामसर तालाब पुराना है। इसकी गहराई लगभग 50 फुट है और इसका आगौर है 1100 बीघा जमीन का, जो दस्तावेजों में दर्ज है। यह तालाब भव्य व सुंदर है, तालाब की पाल के किनारे पुराने खेजड़ी के पेड़ों की पंक्तियां हैं। लेकिन यहां युवाओं की पर्यावरण संस्था ने 300 से ज्यादा पेड़ नए भी लगाए हैं और ट्री गार्ड से उनकी सुरक्षा भी की है। इन हरे-भरे पेड़ों के कारण संैकड़ों की संख्या में पक्षियों का कलरव बरबस ही खींचता है। यहां मोर, उल्लू, तीतर, सोन चिड़िया काफी दिखाई देते हैं। इसके अलावा, हिरण भी कुलांचे भरते दिख जाएं।

पर्यावरण संस्था से जुड़े मुकेश गोड बताते हैं कि तालाब के किनारे लगे खेजड़ी के पेड़ों की उम्र हो गई है, वे गिरने लगे हैं, इसलिए नए पेड़ लगाने की जरूरत महसूस हुई। युवाओं ने पर्यावरण संस्था का गठन किया और एक वाट्सएप ग्रुप भी बनाया, जिसमें करीब डेढ़ सौ सदस्य हैं, जिनमें काफी नए युवा भी जुड़े हैं, और यह सिलसिला जारी है। इस वाट्सएप ग्रुप के माध्यम से पेड़ लगाने की मुहिम के लिए चंदा एकत्र किया गया, और पेड़ लगाए। अब उनकी परवरिश भी की जा रही है। इसके अलावा, आगौर में अतिक्रमण न हो, यह भी सुनिश्चित किया जा रहा है। इस पूरी मुहिम में पंचायत ने भी सहयोग दिया है।

वे आगे बताते हैं कि तालाब बुजुर्गों की धरोहर है। तालाब है तो गांव है, वह पहचान है। पेड़ लगाना ही जरूरी नहीं है बल्कि उनकी देखरेख व परवरिश भी जरूरी है इसलिए गांव के सभी युवाओं ने इसकी जिम्मेदारी ली है।

गांव के बुजुर्ग कन्हैयालाल बतलाते हैं कि यह तालाब 350 बरस पुराना है। जब गांव बसा तब भी तालाब था। पहले इसे काला नाडा के नाम से जानते थे। लक्ष्मीनाथ भगवान का मंदिर गांव में है, वह भी काफी पुराना है। हाल में मनरेगा के तहत तालाब की खुदाई भी करवाई गई है। तीन तरफ दीवारें बनवाई गईं हैं।

वे आगे बताते हैं कि तालाब की रखवाली के लिए एक चौकीदार रखा गया है, जिसे गांव वाले चंदा करके मानदेय देते हैं। तालाब से पानी सभी टैंकरों से ले जा सकते हैं पर पानी की कमी होने पर उस पर रोक भी लगाई जाती है। इसके बाद सिर पर घड़े से और ऊंटगाड़ी से पानी ले जा सकते हैं। शादी-विवाह व सार्वजनिक कार्यक्रमों के समय शौच आदि के लिए मना करने की सूचना दी जाती है। तालाब के आसपास कोई पशु मर जाते हैं तो तुरंत ही उठवाने की व्यवस्था की जाती है। इसके अलावा, भेड़-बकरियों को भी चरने पर मनाही है, विशेषकर पेड़ों के आसपास। अमावस, पूनों और ग्यारस को गांव के लोग सामूहिक रूप से साफ-सफाई का काम करते हैं।

मूलाराम गूजर ने बताया कि तीन साल पहले तालाब का पानी खत्म हो गया था, तब खुदाई करवाई गई, जिसकी उपजाऊ मिट्टी किसानों ने खेतों में डाली। इसके अलावा, बेरियां व कुईयां भी हैं, जिनमें पानी आता था। गांव में दो कुएं भी हैं लेकिन सामान्य दिनों में 10 गांव के लोग इस तालाब से पानी लेते हैं।

कुल मिलाकर, रामसर गांव के युवाओं की तालाब के आसपास पेड़ लगाने की मुहिम ने क्षेत्र के लोगों को नई राह दिखाई है। इससे न केवल तालाब का भूदृश्य हरा-भरा हो रहा है, पक्षियों का यहां बसेरा है, बल्कि तालाब भी काफी साफ-स्वच्छ व सुंदर है। इससे यह भी पता चलता है कि इतनी पुरानी तालाब संस्कृति की समाज ने कैसे सार संभाल की है। उसे बचाया है, और यह उनकी दैनंदिन जरूरत भी है। मिल- जुलकर इसकी साफ-सफाई और पानी के इस्तेमाल की नियमावली बनाई है। हालांकि यह अलिखित है, पर कड़ाई से इसका पालन किया जाता है। युवा भी इस पूरी संस्कृति से जुड़े हैं। उनमें पर्यावरण के प्रति नई चेतना पैदा हुई है। रामसर तालाब की सार-संभाल व रखरखाव भी अच्छा है, युवाओं ने बुजुर्गों की इस धरोहर को संभालने का जिम्मा लिया है, जो सराहनीय होने के साथ अनुकरणीय भी है।


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