राहुल मेहनत कर रहे हैं और कांग्रेसी उस पर पानी फेर रहे
राहुल के छात्रों के गूंज कार्यक्रम की अब चौतरफा चर्चा है। छात्रों से कोई पंगा नहीं ले सकता।

- शकील अख्तर
राहुल के छात्रों के गूंज कार्यक्रम की अब चौतरफा चर्चा है। छात्रों से कोई पंगा नहीं ले सकता। इसलिए न चाहते हुए भी गोदी मीडिया को छात्रों की आवाज दिखाना पड़ रही है। गोदी मीडिया देख चुका है कि छात्रों की बात न सुनने का खामियाजा मोदी सरकार को किस तरह उठाना पड़ा है। उसके शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा।
कांग्रेसी चाहते हैं राहुल चक्रव्यूह तोड़ दें। राहुल तोड़ सकते हैं। मगर राहुल उसे तोड़कर बाहर निकलना भी चाहते हैं। कांग्रेसियों को इसमें ज्यादा दिलचस्पी नहीं है कि राहुल चक्रव्यूह तोड़कर बाहर आएं। उन्हें केवल राहुल से चक्रव्यूह तुड़वाना है। क्योंकि उनमें से न तो कोई तोड़ सकता है न तोड़ना चाहता है।
राहुल को आप चाहे जितना अव्यवहारिक या आदर्शवादी कहें मगर इतना वह जानते हैं कि आज के समय केवल चक्रव्यूह तोड़ना ही महत्वपूर्ण नहीं है। तोड़कर बाहर निकलना भी है। लोकसभा में विपक्ष के नेता बनने के बाद राहुल ने यह बात कही थी। उन्होंने कहा था कि जो कौरवों ने अभिमन्यु के साथ किया था वही अब मोदी सरकार कर रही है। महाभारत में कौरव कामयाब हुए थे। अभिमन्यु को घेर कर मार लिया था। लेकिन अब अभिमन्यु मरेगा नहीं। चक्रव्यूह बेधेगा और बाहर भी आएगा।
राहुल ने यह बिल्कुल नया कान्सेप्ट दिया है। इससे पहले चक्रव्यूह बेधने की ही बात होती थी। मगर राहुल ने आज के समय के अनुसार उससे सुरक्षित बाहर निकलने की जो बात कही है वह एक आशावादी राजनीति का मैसेज है। और 12 साल से निराश एवं हताश जनता को इससे एक उम्मीद बंधती है। राहुल जनता में ही हौसला पैदा करके और खास तौर से छात्र एवं युवाओं को जगाकर ही इस चक्रव्यूह को तोड़ने और इससे बाहर निकलने की बात करते हैं।
राहुल के छात्रों के गूंज कार्यक्रम की अब चौतरफा चर्चा है। छात्रों से कोई पंगा नहीं ले सकता। इसलिए न चाहते हुए भी गोदी मीडिया को छात्रों की आवाज दिखाना पड़ रही है। गोदी मीडिया देख चुका है कि छात्रों की बात न सुनने का खामियाजा मोदी सरकार को किस तरह उठाना पड़ा है। उसके शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा। और प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री अमित शाह संसद के दोनों सदनों में से किसी एक में भी नहीं आ पाए।
लेकिन कांग्रेस के ही कुछ नेताओं की गलतियों के कारण कई बार बेवजह बाजी पलट जाती है। जिस दिन राहुल का अब तक का सबसे सफल गूंज कार्यक्रम इन्दौर में हो रहा था उसी दिन दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ के चुनावों का नतीजा निकल रहा था।
दिल्ली में इस बार जो माहौल था भाजपा उससे बहुत डरी हुई थी। हर चीज उसके खिलाफ जा रही थी। और ऐसे में दिल्ली यूनिवर्सिटी के चुनाव से एक हफ्ते पहले सत्य निकेतन की बिल्डिंग गिर जाने जिसमें दिल्ली यूनिवर्सिटी के ही पढ़ने वाले कई छात्र दबकर मर जाने की घटना ने उसे पूरी तरह निराश कर दिया था।
लेकिन अगर बल्लेबाज ही हिट विकेट हो जाएं तो कितने ही निराश बालर और टीम हो जीत जाती है। दिल्ली का हर चुनाव पूरे देश को संदेश देता है। चाहे लोकसभा हो या दिल्ली विश्वविद्यालय का चुनाव। यहां केवल छात्र संघ का चुनाव ही नहीं दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक संघ डूटा भी राजनीति की नब्ज बताता है। अभी छात्र संघ डूसू चुनाव के चार दिन पहले ही दिल्ली विश्वविद्यालय के सबसे प्रभावी शिक्षक नेता माने जाने वाले और तीन बार डूटा के अध्यक्ष रहने वाले आदित्य नारायण मिश्रा ने बड़ी तादाद में युनिवर्सिटी के शिक्षकों के साथ कांग्रेस मुख्यालय आकर कांग्रेस ज्वाइन की। इसका डूसू चुनाव पर स्वाभाविक असर पड़ना था।
उससे पहले दिल्ली के जंतर मंतर पर ही छात्रों का बड़ा धरना और फिर संसद मार्च में लाठी, आंसू गैस, पैलेट गन चलने से पूरा माहौल भाजपा विरोधी बना हुआ था। छात्र राजनीति के लिए इससे अनुकूल माहौल कुछ नहीं हो सकता। मगर एक नेता द्वारा अपने बेटे को टिकट दिलाकर एनएसयूआई का पूरा पैनल लंगड़ा कर दिया गया। जिस उपाध्यक्ष सीट पर उस नेता के बेटे वीर चतरथ को लड़ाया वहां एनएसयूआई को नोटा से भी कम वोट मिले। इस पोस्ट पर नोटा को 4359 और एनएसयूआई को 4313 वोट मिले।
शर्मनाक! और यह नेता कौन है जिसने अपने बेटे को टिकट दिलाया? एक भारी अहंकारी वह व्यक्ति जिसे कांग्रेस के नए मुख्यालय इन्दिरा भवन का पूरा चार्ज दे रखा है। जहां वह किसी भी नेता, कांग्रेस के 24 अकबर रोड वाले मुख्यालय से गए किसी अधिकारी को घुसने से रोक सकता है। अपमान कर सकता है।
यह हमने लिखा नेता और अधिकारी के लिए। कार्यकर्ता और कर्मचारी की तो बात ही नहीं है। उन्होंने तो इन्दिरा भवन जाना ही छोड़ दिया। एनएसयूआई के नेता, सदस्य और दिल्ली यूनिवर्सिटी के दूसरे तमाम छात्र कांग्रेस के 24 अकबर रोड वाले मुख्यालय आते रहते हैं। पॉलिटिकल पार्टी का दफ्तर जैसा होना चाहिए खुला वह वैसा ही है। दिल्ली के छात्र क्या देश भर से लोग वहां आते हैं। बैठते हैं। कैंटिन में सही दाम में चाय पीते हैं। ऐसे ही सही कीमत में खाना खा लेते हैं। आगे बताते हैं यहां के उचित दाम आपको।
पहले जरा इन्दिरा भवन की बात। लेकिन उससे भी पहले पार्लियामेंट की नई बिल्डिंग की बात। पार्लियामेंट की नई बिल्डिंग के बनने के औचित्य पर हम शुरू से सवाल उठाते रहे हैं। उसकी कमियों पर बहुत लिखा। अखबार में भी और ट्वीटर पर भी। लेकिन अभी पिछले कुछ समय से हमने लिखना बंद कर दिया।
कांग्रेस के लोगों को मोदी की बनाई नई संसद की कमियां पढ़ने में बहुत मजा आता था। एक दिन एक बड़े नेता ने पूछा कि अब आप नई बिल्डिंग पर क्यों नहीं लिखते हैं? हमने कहा क्योंकि हमने उससे खराब स्थिति एक और नई बिल्डिंग की देख ली। उन्होंने कहा कौन सी? हमने कहा आप का नया मुख्यालय। इन्दिरा भवन। चुप हो गए। जैसे सत्ता पक्ष का भी कोई सांसद, या मंत्री भी नए संसद भवन की तारीफ नहीं कर सकता है। वैसे ही कांग्रेस का कोई नेता इन्दिरा भवन की व्यवस्थाओं का बचाव नहीं कर पाता है।
अब हमने ऊपर कैंटिन और रेट की बात कही थी वह बताते हैं। इन्दिरा भवन की कैंटिन के रेट इतने ऊंचे रखे हैं कि वहां काम करने वाले कर्मचारियों को भी चाय पीना हो तो बाहर जाना पड़ता है। यह बताने की तो शायद जरूरत नहीं है कि कार्यस्थलों पर कैंटिन इसलिए खोली जाती है और सब्सिडाइज रेट पर चाय खाना स्नेक्स रखे जाते हैं कि वर्कर को कहीं बाहर खाने चाय पीने नहीं जाना पड़े।
अब रेट देख लीजिए। चाय 25 रुपए की। जीएसटी मिलाकर 28 की पड़ती है। अब सोचिए एक कर्मचारी या कभी गलती से चला गया कोई कार्यकर्ता या छात्र कैसे पी सकता है। अब जरा तुलनात्मक रूप से और बता दें तो आपके और समझ में आ जाएगा। यही चाय कांग्रेस के 24 अकबर रोड मुख्यालय में 10 रुपए की मिलती है। और जिक्र संसद की नई बिल्डिंग का भी किया है तो वहां का भी बता दें वहां 5 रुपए की है।
बहुत सारे आइटम हैं। ज्यादा नहीं बता रहे। चाय के बाद खाना ही इम्पार्टेन्ट है तो 24 अकबर रोड में 45 रुपए में मिनी लंच और संसद में 50 रुपए में। यहां फाइव स्टार होटलों की तरह हाफ प्लेट या मिनी का काम ही नहीं। थाली है 200 रुपए की। और जीएसटी अलग। एक आइटम और बता दें। 24 अकबर रोड में सागर रत्ना का कैंटिन है जिसका डोसा दुनिया भर में मशहूर है। केवल 45 रुपए का। पार्लियामेंट में अशोका की कैंटिन है वहां 30रुपए का। और इन्दिरा भवन में पता नहीं किसे ठेका दे रखा है 170 प्लस जीएसटी।
और लास्ट बात यह और बता दें कि पत्रकार कैंटिन में नहीं जा सकता। अगर कोई गलती से ले गया तो वहां से उठाने के लिए उसका एडमिनिस्ट्रेटर आ जाता है। एडमिनिस्ट्रेटर मतलब वही जिसने अपने बेटे को लड़वा कर पूरे एनएसयूआई पैनल को हरवाया। राहुल के इन्दौर गूंज कार्यक्रम का मजा खराब किया। लब्बोलुवाब यह है कि राहुल अकेले पूरी लड़ाई लड़ रहे हैं। कांग्रेसी उनकी टांग खींचने में लगे हैं। ये कांग्रेसी वह हैं जो दलाली और चमचागिरी में सिद्धहस्त हैं। इन्हें सिर्फ अपने से अपने परिवार से अपने स्वार्थों से मतलब है। राहुल से और कांग्रेस से इन्हें सिर्फ फायदा उठाना है। अब राहुल इनसे कैसे मुक्त हो पाते हैं यह एक बड़ा सवाल है। क्योंकि यह लोग उनके पास कोई इन्फारमेशन ही नहीं पहुंचने देते। जिस इन्दिरा भवन के लिए कांग्रेस के लाखों कार्यकर्ताओं, सिम्पेथाइजरों ने जो भी जिससे बना सहयोग किया है वहां उनके साथ क्या होता है यह भी राहुल तक शायद ही पहुंच पाता हो।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार है)


