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स्त्रियों के प्रति कुंद होतीं जन संवेदनाएं

अभी उत्तराखंड में अंकिता भंडारी के लिये न्याय की लड़ाई लड़ी ही जा रही है, उन्नाव की पीड़िता के घाव सूखे नही हैं

स्त्रियों के प्रति कुंद होतीं जन संवेदनाएं
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  • कनुप्रिया

एक समय था जब निर्भया के लिये पूरा देश हिल उठा था, उसके प्रति इंसाफ़ के लिये सड़कों पर आ गया था, सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया गया था। यहां तक कि कांग्रेस के सत्ताच्युत होने में निर्भयाकांड एक बड़ा कारण बन गया था, जबकि सरकार ने तुरंत उसका अपने ख़र्च पर इलाज कराया, आरोपियों को गिरफ्तार किया, फांसी हुई।

अभी उत्तराखंड में अंकिता भंडारी के लिये न्याय की लड़ाई लड़ी ही जा रही है, उन्नाव की पीड़िता के घाव सूखे नही हैं, हाथरस की पीड़िता के साथ हुआ अन्याय आवाज़ की तलाश में ही है कि कानपुर से 14 साल की लड़की के साथ बलात्कार की ख़बर आ गई, इस बार बलात्कारी एक यू ट्यूबर और सब इंस्पेक्टर है। सड़क से बच्ची का अपहरण करके, 2 घण्टे उसके साथ गैंगरेप करने के बाद उसे बुरी हालत में घर के बाहर फेंक दिया गया। पुलिस ने पहले तो प्राथमिकी दज़र् ही नहीं की, बाद में सीनियर पुलिस अफसर तक पीड़िता के परिजन पहुंचे तो रिपोर्ट दज़र् हुई तब तक बलात्कारी पुलिस वाला फ़रार हो गया।

दु:खद ये भी है कि अब ऐसी ख़बरें आती हैं तो हम चौंकते भी नहीं, ये हमारी चेतना को झिंझोड़ता ही नहीं। ऐसी घटनाओं का होना मानो हमारे सामाजिक दैनिक दिनचर्या में शामिल हो गया है। आप गूगल करेंगे तो हर दिन स्त्रियों, बच्चियों के प्रति जघन्य अपराध की कोई न कोई ख़बर मिल ही जायेगी और सबसे ऊपर जिस प्रदेश का नाम मिलेगा वो अपने आप में एक मिनी हिन्दू राष्ट्र है। वहां धर्म के सबसे बड़े ठेकेदारों की डबल इंजन सरकार है।

दरअसल पिछले 11 सालों में जिस योजना पर सरकार ने सबसे ज़्यादा काम किया है वो है बलात्कारी बचाओ योजना। बल्कि जिस शिद्दत से बलात्कारियों को प्रोत्साहन दिया गया है, इसे बलात्कारी बनाओ योजना भी कहें तो अतिशयोक्ति नही होगी, दुनिया में इसकी कोई दूसरी मिसाल नहीं मिलती।

बलात्कारियों के प्रोत्साहन के लिये उन्हें लगातार ज़मानत दी जाती है (हाल ही में बलात्कारी बाबा आसाराम को 10 महीने में चौथी बार ज़मानत मिली और राम रहीम को 15 वीं बार पैरोल)। जेल से बाहर आने पर बलात्कारियों का फूल मालाओं से स्वागत किया जाता है, कभी उनके पक्ष में भगवा झंडों के साथ जुलूस निकाले जाते हैं। कभी उन पर क़ानून की धार पूरी तरह कुंद हो जाती है, वो ऐसी मार करता है कि अपराधी को चोट ही नहीं लगती। मसलन महिला खिलाड़ियों के यौन शोषण के आरोपी बृजभूषण शरण सिंह के ख़िलाफ़ भारतीय दंड संहिता की धारा 354 (महिला की लज्जा भंग करना) और 354ए (लैंगिक उत्पीड़न) के तहत 'चार्ज फ्रेमÓ हुए, मगर जांच एजेंसियों ने उन्हें कभी गिरफ्तार ही नहीं किया, 2023 से वो ज़मानत पर हैं, उनकी जमानत का कभी विरोध भी नहीं हुआ। मीडिया ज़्यादातर बलात्कार की घटनाओं पर चुप रहता है, चर्चा नहीं करता, मानो यह सामाजिक चिंता का विषय ही नहीं।

उधर यौन शोषण के प्रति न्यायालयों का रवैया ये है कि न्याय के लिये पीड़िताओं को न्यायालयों के ख़िलाफ़ धरना देने की नौबत आ जाती है। पिछले ही साल इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने एक फ़ैसले में कहा था कि किसी नाबालिग लड़की के स्तन पकड़ना, उसके पजामे की डोरी तोड़ना और कपड़े उतारने का प्रयास करना, बलात्कार की कोशिश साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। ऐसी कई शर्मनाक और महिलाओं को न्याय के लिये हतोत्साहित करती हुई टिप्पणियां पिछले कुछ सालों में विभिन्न प्रदेशों के न्यायालयों ने की हैं, जो समाज में बलात्कारियों को पर्याप्त प्रोत्साहन देती हैं।

इस सबके बाद त्रासदी ये है कि पीड़िताओं के ख़िलाफ़ ही सोशल मीडिया पर उन्हें मानसिक और भावनात्मक स्तर पर तोड़ने और उनके संघर्ष के प्रति समाज के भीतर नकारात्मक नज़रिया बनाने के लिए अभियान चलाये जाते हैं। मसलन महिला पहलवानों के ख़िलाफ़ ऐसा ही अभियान चलाया गया था कि उनका आंदोलन राजनीतिक है, उनके यौन शोषण की बात झूठ है और आरोपी बिल्कुल निर्दोष है इत्यादि इत्यादि। अब एक अभियान उन्नाव की पीड़िता के विरुद्ध चलाया जा रहा है, एआई के ज़रिए उनके झूठे वीडियो बनाए जा रहे हैं जिनसे ज़ाहिर हो कि वह स्वयं एक बेशरम महिला है और उसने जानबूझ कर आरोपी कुलदीप सेंगर को फंसाया है।

तिस पर करेले पर नीम चढ़ा यह कि ख़ुद सरकार बहादुर यौन शोषकों और बलात्कारियों के लिये वोट मांगते हैं, उनके साथ तस्वीरें खिंचवाते हैं, उनको सोशल मीडिया पर फॉलो करते हैं और उनके ख़िलाफ़ मामलों पर पूरी तरह चुप्पी मार जाते हैं। मणिपुर में महिलाओं के साथ हुए जघन्य यौन अपराधों पर सरकार ने जिस तरह ख़ामोशी इख्तियार की उससे साबित हुआ कि सरकार किस क़दर महिलाओं के प्रति संवेदनहीन है।

आख़िर इससे अधिक प्रोत्साहन बलात्कार को और कैसे दिया जा सकता है? एक बलात्कारी समाज बनाने में सरकार की तरफ़ से कोई कमी रही हो तो बताइए।

अब इतना ही बचता है कि सरकार द्वारा सार्वजनिक मंचों पर यौन शोषकों को समाज के मॉडल की तरह प्रस्तुत किया जाए ताकि युवा पीढ़ी उनसे प्रेरणा ले सके। उनके नाम पर पुरस्कार बांटे जायें, उनकी प्रशंसा में पुस्तकें लिखी जायें, सड़कों और स्कूलों के नाम उनके नाम पर रखे जायें, उन्हें पद्म सम्मान से सम्मानित किया जाये, ताकि एक सम्पूर्ण बलात्कारी समाज का लक्ष्य यथाशीघ्र प्राप्त किया जा सके, उसे उपलब्धि की तरह दिखाया जा सके।

और ये सब हो रहा है घोर सनातनी, धार्मिक सरकारों के राज में, जो हिंदू राष्ट्र बनाने का दंभ भरती हैं और मंदिरों की प्रतिष्ठा पर्व मना-मना कर ही गर्वित हुए जा रही है। धार्मिकता का आलम ये है कि धर्म के सबसे ऊंचे पायदान पर बैठे संत और बाबा लोग स्त्रियों के ख़िलाफ़ अनर्गल बयान देते हैं, जिससे उनकी गरिमा को कड़ी चोट पहुंचती है। मसलन धीरेन्द्र शास्त्री का एक शर्मनाक बयान जिसमें उसने बिना सिंदूर की मांग वाली महिलाओं को ख़ाली प्लॉट की संज्ञा दी गई, जिस पर कोई भी क़ब्ज़ा कर सकता है। बागेश्वर धाम में लड़कियों की तस्करी के आरोप लगे तो बिना जांच किये आरोप लगाने वाले प्रोफेसर के ख़िलाफ़ ही रिपोर्ट दज़र् कर ली गई। बाबा अनिरुद्ध आचार्य ने अपने सत्संग में कहा कि 25 साल की लड़की 4 जगह मुंह मार चुकी होती है, बाबा प्रेमानंद का कहना है कि सौ में से अब 2-4 लड़कियों ही पवित्र होती होंगी।

ये बोल-वचन तब हैं जब देश के अधिकतर बाबाओं पर यौन शोषण के गंभीर आरोप हैं। यहां तक कि सेलिब्रिटी बाबा सद्गुरु के आश्रम में भी बच्चों के यौन शोषण के आरोप कई अभिभावकों ने लगाए हैं। मगर धर्मान्ध लोगों की सोचने-समझने की शक्ति इस क़दर छीन लेता है कि फिर भी ये तथाकथित धार्मिक गुरु पूज्य बने रहते हैं। भक्तों मेंं उनकी पद धूलि लेने के लिये ऐसी भगदड़ मचती है कि लोग दब-कुचल कर जान से हाथ धो बैठते हैं, जैसा कि हाथरस के एक गांव में सूरजपाल उफ़र् भोले बाबा के मामले में हुआ।

सच तो ये है कि धर्म एक ऐसा गटर हो चुका है जिसमें समाज के सबसे सड़े हुए, गंदे तबके को प्राणवायु मिलती है, उसके गुनाहों को संरक्षण मिलता है। धर्म, अपराधियों और यौन शोषकों की अंतिम शरणस्थली बन चुका है, तभी तो धीरेंद्र शास्त्री की सनातन एकता यात्रा में अश्लील कंटेंट और घोटालों की आरोपी शिल्पा शेट्टी और एकता कपूर शामिल होकर स्याह से सफ़ेद हो जाती हैं।

एक समय था जब निर्भया के लिये पूरा देश हिल उठा था, उसके प्रति इंसाफ़ के लिये सड़कों पर आ गया था, सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया गया था। यहां तक कि कांग्रेस के सत्ताच्युत होने में निर्भयाकांड एक बड़ा कारण बन गया था, जबकि सरकार ने तुरंत उसका अपने ख़र्च पर इलाज कराया, आरोपियों को गिरफ्तार किया, फांसी हुई और राहुल गांधी ने निर्भया के भाई को पढ़ाने लिखाने और पायलट बनाने में निजी तौर पर मदद की। मगर इन सबसे भी जनता के भीतर आक्रोश कम नहीं हुआ था।

आज उसी देश की जनता की सम्वेदनाएं स्त्रियों के प्रति मानो कुंद हो गईं, जबकि देश की जनता पहले से ज़्यादा धार्मिक हैं, देश में पहले से कहीं ज़्यादा मंदिर बन रहे हैं और धार्मिक प्रवचन हो रहे हैं। मगर स्त्रियों पर, मासूम बच्चियों पर यौन शोषण, बलात्कार और हत्या की ख़बरें आती हैं और चली जाती हैं। जनता आक्रोशित नहीं होती, मानो हिन्दू राष्ट्र के लिये स्त्रियों की अस्मिता और गरिमा की बलि स्वीकार्य है, बल्कि ऐसा होना उसने सामान्य मान लिया है।

(लेखिका खादी और ग्रामोद्योग के क्षेत्र में सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता हैं।)


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