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घरेलू सोने का उपयोग कर विदेशी मुद्रा बचाने की पेशकश

अब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भारतीयों से अपील की कि कम से कम एक साल के लिए भारत में सोने का आयात टाला जा सकता है, तो उन्होंने ऐसा उस बड़ी अनिश्चितता के संदर्भ में किया जिसका सामना देश कर रहा है।

घरेलू सोने का उपयोग कर विदेशी मुद्रा बचाने की पेशकश
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  • ए वासुदेवन

मध्य पूर्व में अभी के शांति प्रयास शायद जल्द कामयाब न हों और इसलिए भारत को ऊर्जा की दूसरी मांगों को पूरा करने के लिए दूसरे रणनीतिक समाधान ढूंढने होंगे। इस स्थिति को देखते हुए न केवल ईंधन बल्कि सोने और अन्य सामानों के बड़े पैमाने पर आयात पर (मूल्य के हिसाब से) निर्भरता कम करनी ज़रूरी है। सोना ऐसी ही एक चीज़ है।

अब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भारतीयों से अपील की कि कम से कम एक साल के लिए भारत में सोने का आयात टाला जा सकता है, तो उन्होंने ऐसा उस बड़ी अनिश्चितता के संदर्भ में किया जिसका सामना देश कर रहा है। यह अपील खासकर मध्य पूर्व में संघर्ष और होर्मुज स्ट्रेट के बंद होने या लगभग बंद होने की वजह से बड़े पैमाने पर आपूर्ति में रुकावटों के कारण की गई। भारत अभी 72 अरब अमेरिकी डॉलर प्रति वर्ष से ज़्यादा के सोने का आयात करता है। इसके परिणामस्वरूप व्यापार असंतुलन तेजी से बढ़ गया है। भारत का फॉरेन एक्सचेंज रिज़र्व 700 अरब डॉलर से नीचे गिर गया है और कुल विदेश पूंजी निवेश नगण्य हो गया है। अगर खाद, ईंधन (कच्चा तेल और गैस) और दूसरे ज़रूरी सामान के स्टॉक में और कमी होती है तो कुल रिज़र्व मुश्किल से ही काफ़ी बफर दे पाएगा। अकेले भारत का ईंधन आयात कुल ज़रूरतों का 85 प्रतिशत से ज़्यादा है। समय-समय पर लगने वाले प्रतिबंध और अचानक आने वाली धमकियों से बढ़ते टकराव के हालात ने ईंधन आपूर्ति पर असर डाला है जिससे कच्चे तेल की कीमतें 100 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल के आसपास और कभी-कभी उससे भी ज़्यादा बढ़ी हैं। मध्य पूर्व में अभी के शांति प्रयास शायद जल्द कामयाब न हों और इसलिए भारत को ऊर्जा की दूसरी मांगों को पूरा करने के लिए दूसरे रणनीतिक समाधान ढूंढने होंगे।

इस स्थिति को देखते हुए न केवल ईंधन बल्कि सोने और अन्य सामानों के बड़े पैमाने पर आयात पर (मूल्य के हिसाब से) निर्भरता कम करनी ज़रूरी है। सोना ऐसी ही एक चीज़ है। जहां तक सोने की बात है, भारतीय परिवारों के पास पारंपरिक रूप से आपातकालीन स्थितियों से निपटने, संपत्ति के तौर पर और शादियों जैसे मौकों पर गहनों के रूप में इस्तेमाल करने की ज़रूरत को पूरा करने के लिए सोना होता है।

भारतीय परिवारों के पास सोने का काफ़ी स्टॉक है। फिर भी सोने की मांग इतनी बढ़ रही है कि कुल आयात में इसके आयात का हिस्सा 2013-14 में लगभग 6 प्रतिशत से बढ़कर 2025-26 में अनुमानित 9.25 प्रतिशत हो गया है। परिवारों के पास मौजूद सोने के अलावा, रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया (आरबीआई) के पास भी अप्रैल, 2026 के आंकड़ों के अनुसार 120 अरब अमेरिकी डॉलर मूल्य का सोना है। हिंदू, इस्लामी, सिख, ईसाई और बौद्ध धर्मों का प्रतिनिधित्व करने वाले धार्मिक संस्थानों, ट्रस्टों, बोर्डों आदि के पास भी सोने का काफ़ी स्टॉक है। कुछ अनुमानों के अनुसार इन संस्थानों के पास 2500 से 4000 टन सोना है।

अप्रैल 2026 में रिजर्व बैंक का गोल्ड रिज़र्व कुल विदेशी मुद्रा रिज़र्व का लगभग 17 प्रतिशत थे। ये मैक्रो-इकानॉमिक स्थिरता लाने में मदद करते हैं और एक सुरक्षा कवच प्रदान करते हैं जिसका उपयोग विदेशी मुद्रा की दरों में उतार-चढ़ाव को कम करने के लिए किया जा सकता है।

अगर घरों में सोने की मांग को पूरा करना है तो एक तरीका हो सकता है कि यह देखा जाए कि क्या धार्मिक संस्थान और ट्रस्ट बिना किसी बड़े नुकसान के इसे पूरा कर सकते हैं। यह कोई नया विचार नहीं है लेकिन इस पर अमल किया जा सकता है क्योंकि इन संस्थानों को ऐसे लोग चलाते हैं जो किसी भी अन्य नागरिक की तरह ही सामाजिक और राष्ट्रीय हितों के प्रति जागरूक हैं।

इसलिए भारत सरकार इन संस्थानों को 1 औंस (1 औंस लगभग 28.35 ग्राम), 2 औंस और 5 औंस के सोने के सिक्के और 10 औंस की टिकिया (टैबलेट) जारी करने और उन्हें व्यक्तियों/छोटे व्यापारियों को एक निश्चित सीमा तक (जैसे प्रति खरीदार 'प्रति दिन' 20 औंस से अधिक नहीं, साथ ही खरीदारों के पैन नंबर के साथ बिक्री का विवरण आयकर कार्यालयों को भेजे जाने के निर्देश के साथ) बेचने के लिए मना सकती है। औंस वजन या आयतन मापने की एक इकाई है जो मुख्य रूप से अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों में प्रचलित है। इसमें एक बायबैक (वापस खरीदने) का विकल्प भी हो सकता है जिसकी कीमत एक साल बाद कीमती धातुओं या किसी प्रमुख विदेशी मुद्रा के फ़्यूचर मार्केट्स से तय की जा सकती है। इसके अलावा ये संस्थान, रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया को बायबैक विकल्प के साथ सोने की छड़ें (गोल्ड बार) बेच सकते हैं जिसमें यह शर्त हो कि इस विकल्प का इस्तेमाल दो साल की अवधि के बाद किया जाएगा। हालांकि बिक्री की मात्रा प्रत्येक संस्थान के पास मौजूद कुल सोने के 50 प्रतिशत से अधिक नहीं होनी चाहिए। ज़रूरत पड़ने पर इस समझौते को और दो साल के लिए बढ़ाया जा सकता है।

इन संस्थानों से होने वाली कमाई का इस्तेमाल पहले की तरह ही शिक्षण संस्थानों, अस्पतालों, प्रिंट या डिजिटल किताबों वाली पब्लिक लाइब्रेरी और दूसरे सामाजिक कामों के लिए किया जा सकता है। इससे भी ज़्यादा फ़ायदेमंद यह होगा कि कमाई का एक बड़ा हिस्सा (जैसे कुल कमाई का 75-80 प्रश) टेक्नालॉजी और साइंस से जुड़े रिसर्च पर खर्च हो ताकि ऐसा नवाचार अपनाया जाए जिनसे उत्पादकता बढ़ाई जा सके। उदाहरण के लिए नए और अनोखे तरीकों से 'रेयर अर्थ एलिमेंट्स' का इस्तेमाल करने से कई उद्योगों- जैसे वाहन उद्योग, नवीकरणीय ऊर्जा, उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स उपकरणों, रक्षा और एयरोस्पेस, लेज़र तकनीक, औद्योगिक विनिर्माण इत्यादि में उत्पादन बढ़ाने में मदद मिलेगी।

सभी नवाचारों का पेटेंट कराया जाएगा और जो लोग इन पेटेंट्स का इस्तेमाल करना चाहेंगे उन्हें इसके लिए कीमत चुकानी होगी। पेटेंट के इस्तेमाल से मिलने वाली रकम को एक तय अनुपात (जैसे 20:80) में उस खास संस्थानों और असल रिसर्चर (या रिसर्च कराने वाली संस्थाओं) के बीच बांटा जाएगा।

ऊपर दिए गए प्रस्ताव में यह बात है कि यह मौजूदा अनिश्चितता से विकास के लिए पैदा हुई मुख्य चुनौती को काफी हद तक हल करता है। सामान्य सकल घरेलू उत्पाद (ग्रास डोमेस्टिक प्रॉडक्ट- जीडीपी) में निवेश लगभग 32 फीसदी है और दुनिया भर में आर्थिक मंदी, बाहरी व्यापार और दूसरी दिक्कतों के मौजूदा हालात में इस अनुपात को और बढ़ाना भले ही विदेशी निवेशकों के लिए टैक्स के नियम आसान हों तो भी अगले 12 महीनों में तो बिल्कुल भी मुमकिन नहीं होगा। जीडीपी में निवेश के अनुपात के आलोक में यह नवाचारों और नई तकनीकी प्रक्रियाओं को अपनाने से संभव हुई उत्पादकता वृद्धि ही है जो काफी हद तक भारत की आर्थिक वृद्धि को सुरक्षित रखना सुनिश्चित करेगी।

(लेखक रिज़र्व बैंक के पूर्व प्रबंध निदेशक हैं। सिंडिकेट: द बिलियन प्रेस)


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