सीईसी के 'बिना अधिकार' और 'गैर-कानूनी' कामों के लिए प्रधानमंत्री मोदी ज़िम्मेदार
भारत के तीन चुनाव आयुक्तों में से दो ने मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार गुप्ता के नेतृत्व में चुनाव आयोग के कुछ फैसलों पर अपनी आपत्ति दर्ज की है

- डॉ. ज्ञान पाठक
चुनाव आयोग की विश्वसनीयता न केवल उसके आयुक्तों की व्यक्तिगत ईमानदारी पर निर्भर करती है, बल्कि उन संस्थागत सुरक्षा उपायों पर भी निर्भर करती है जो उन्हें राजनीतिक दबाव से बचाते हैं। यहीं पर हम सिर्फ सीईसी ज्ञानेश कुमार की व्यक्तिगत ईमानदारी को दोष नहीं दे सकते, खासकर तब जब उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ मिलकर पूरे चुनावी लोकतंत्र को हथियाने की कोशिश करते देखा जा रहा है।
भारत के तीन चुनाव आयुक्तों में से दो ने मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार गुप्ता के नेतृत्व में चुनाव आयोग के कुछ फैसलों पर अपनी आपत्ति दर्ज की है और उन्हें 'गैर-कानूनीÓ और 'बिना अधिकार केÓ भी बताया है। इंडियन एक्सप्रेस की एक जांच में पता चला है कि पिछले दस महीनों में कम से कम 14 बार आपत्तियां उठाई गई थीं। हालांकि, यह मामला सिफ़र् सीईसी की जवाबदेही से कहीं आगे का है, क्योंकि वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह द्वारा नियुक्त किए गए पसंदीदा व्यक्ति हैं। उन्हें सीईसी और अन्य ईसी की नियुक्ति के लिए 2023 में लाए गए कानून के तहत नियुक्त किया गया था, जिसने चुनाव आयोग को उनके नियंत्रण में ला दिया।
उस कानून के तहत, केवल सीईसी को संवैधानिक सुरक्षा प्राप्त है और उन्हें केवल महाभियोग के ज़रिए ही हटाया जा सकता है। महाभियोग का यह प्रावधान कितना बेअसर हो गया है, इसे भारत के उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के 21 जुलाई 2025 को दिए गए इस्ती$फे (जो तुरंत लागू हुआ) के ताज़ा उदाहरण से समझा जा सकता है। महाभियोग का प्रावधान उनके लिए कोई सुरक्षा कवच साबित नहीं हुआ और सबसे ऊंचे स्तर से महाभियोग की धमकी का एक साधारण संदेश ही उनका इस्तीफ़ा लेने के लिए काफ़ी था।
यह घटना बताती है कि सीईसी के पद पर ज्ञानेश कुमार कितने कमज़ोर हैं। उनके पास प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आदेशों का पालन करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। जहां तक बाकी दो चुनाव आयुक्तों की बात है, उन्हें ऐसी कोई संवैधानिक सुरक्षा प्राप्त नहीं है। सीईसी और दो ईसी की नियुक्ति और सेवा शर्तों से जुड़े 2023 के कानून के तहत, उनका कार्यकाल पूरी तरह से सीईसी की इच्छा पर निर्भर करता है, जो अप्रत्यक्ष रूप से सरकार की इच्छा है। दो ईसी के पास केवल आपत्ति जताने की शक्ति है, जो उन्होंने की भी, लेकिन मौजूदा हालात में दोनों ईसी से यह उम्मीद करना बहुत ज़्यादा होगा कि वे इस मामले को तार्किक निष्कर्ष तक ले जाएं।
हमने पहले देखा है कि कैसे एक ईसी को चुनाव आयोग की कुछ गतिविधियों पर आपत्ति जताने की भारी कीमत चुकानी पड़ी थी और उन्हें नुकसान उठाना पड़ा था क्योंकि सरकार ने उनकी पत्नी के खिलाफ़ कथित टैक्स चोरी के लिए कार्रवाई शुरू कर दी थी। ये घटनाएं साफ़ तौर पर बताती हैं कि भारत का चुनाव आयोग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सीधे नियंत्रण में कैसे काम करता है। इसलिए, सीईसी ज्ञानेश कुमार पर महाभियोग चलाने की विपक्ष की मांग से भारत के चुनाव आयोग की जवाबदेही की समस्या हल नहीं होगी, जो चुनावी लोकतंत्र का संरक्षक और रक्षक है।
भारत में जुलाई 2025 से मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) किया जा रहा है, जो बहुत विवादित हो गया है। इसने भारत के नागरिकों को भारी परेशानी में डाल दिया है और अब तक 13 करोड़ से ज़्यादा मतदाताओं के नाम हटा दिए गए हैं। इससे पहले, हरियाणा और महाराष्ट्र समेत कई राज्यों में राज्य चुनावों को प्रभावित करने के लिए दूसरे राज्यों से बड़ी संख्या में मतदाताओं को जोड़ा गया था। यह सब कानूनों की आड़ में किया गया, जिनमें हेरफेर की गई थी।
एसआईआर में भी हेरफेर की गई, और इसका फ़ायदा हमेशा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा को मिला। सर्वोच्च न्यायालय ने भी एसआईआर पर न्याय करने के बजाय उससे सफलतापूर्वक सम्पन्न कराने के लिए पर्यवेक्षक की भूमिका अदा की। सर्वोच्च न्यायालय सीईसी और अन्य ईसी की नियुक्ति और सेवा शर्तों के लिए 2023 के कानून को चुनौती देने वाले मामले पर भी अभी तक कोई $फैसला नहीं लिया है। उस कानून ने भारत के मुख्य न्यायाधीश को नियुक्ति समिति से बाहर कर दिया है। सर्वोच्च न्यायालय का रूख रहस्यमय रहा है- उदाहरण के लिए, उसने चुनावी बॉन्ड योजना को असंवैधानिक माना, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा द्वारा असंवैधानिक तरीके से पैसे इक_ा करने के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने से इंकार कर दिया।
इसलिए, इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट से सामने आई बात चुनाव आयोग के भीतर के आपसी प्रशासनिक मतभेदों से कहीं आगे की है। यह एक ज़्यादा गंभीर सवाल उठाती है कि क्या चुनाव पर नज़र रखने वाली संस्था सच में स्वतंत्र रह सकती है, जब मौजूदा सरकार का इस संवैधानिक संस्था पर निर्णायक प्रभाव हो?
चुनाव आयोग की विश्वसनीयता न केवल उसके आयुक्तों की व्यक्तिगत ईमानदारी पर निर्भर करती है, बल्कि उन संस्थागत सुरक्षा उपायों पर भी निर्भर करती है जो उन्हें राजनीतिक दबाव से बचाते हैं। यहीं पर हम सिर्फ सीईसी ज्ञानेश कुमार की व्यक्तिगत ईमानदारी को दोष नहीं दे सकते, खासकर तब जब उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ मिलकर पूरे चुनावी लोकतंत्र को हथियाने की कोशिश करते देखा जा रहा है- ऐसे कानून और नियम लाकर जिन पर भारत की संसद में कभी चर्चा तक नहीं हुई।
यह याद रखना चाहिए कि सीईसी और अन्य ईसी की नियुक्ति और सेवा शर्तों से जुड़ा 2023 का कानून तब पारित किया गया था जब विपक्ष के लगभग सभी सदस्यों को लोकसभा से निलंबित कर दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिकाओं में बताया गया था कि इस मुद्दे पर लगभग कोई बहस नहीं हुई थी, और विपक्ष के सांसदों के निलंबन के बाद उनकी अनुपस्थिति में 'वॉइस वोट' (मौखिक मतदान) के ज़रिए कानून को जल्दबाजी में पारित कर दिया गया था।
आज चुनाव आयोग की विश्वसनीयता का सवाल और भी अहम हो गया है, क्योंकि यह बात सामने आई है कि दो चुनाव आयुक्तों ने कई मौकों पर वोटर लिस्ट की प्रक्रियाओं, फ़ॉर्म 6 में बदलाव और आयोग के टेक्नालॉजी प्रणाली के कामकाज को लेकर आपत्तियां जताई थीं। वोटर लिस्ट का डेटा केन्द्रीयकृत किया गया था और फैसले लेने में चुनाव आयुक्तों को शामिल नहीं किया गया था।
अब मुख्य सवाल यह है कि अगर खुद आयुक्त ही अहम चुनावी फैसलों की कानूनी वैधता, अधिकार या उन्हें लागू करने के तरीके पर असहमत हों, तो ऐसी असहमति की ठीक से जांच, रिकॉर्डिंग और समाधान सुनिश्चित करने के लिए कौन-सी संस्थागत व्यवस्था है?
सबसे चिंताजनक संस्थागत मुद्दों में केंद्रीय मतदाता सूची पर नियंत्रण का मामला शामिल था, जिसमें ज़मीनी स्तर और राज्यों के चुनाव अधिकारियों को भी उस प्रणाली तक सीमित पहुंच ही दिया गया था, जिससे वे अपने फैसले रिकॉर्ड नहीं कर पाते थे। अप्रत्यक्ष रूप से, सीईसी पूरी प्रणाली को चुनाव अधिकारियों के बजाय टेक्नालॉजी से जुड़े लोगों के ज़रिए नियंत्रित करते हैं।
दो चुनाव आयुक्तों ने 'फॉर्म 6' को लेकर भी सवाल उठाए, जो कि बहुत गंभीर बात है, क्योंकि यह न केवल नए मतदाताओं के लिए बल्कि उन लोगों के लिए भी प्रवेश द्वार है जिन्हें ड्राफ्ट वोटर लिस्ट में शामिल नहीं किया गया था। दोनों चुनाव आयुक्तों ने कहा कि- ये बदलाव बिना अधिकार के किए गए थे और इन्हें हटा दिया जाना चाहिए। हालांकि, ये बदलाव अभी भी लागू हैं। इससे कानूनी अधिकार, प्रक्रिया में पारदर्शिता और वोटर रजिस्ट्रेशन तक समान पहुंच को लेकर सवाल उठते हैं।
इसलिए, इस पूरे मामले की गंभीरता से सार्वजनिक जांच होनी चाहिए—न केवल सीईसी ज्ञानेश कुमार के कामकाज की, बल्कि उन वजहों की भी जिनसे उन्हें कानून का उल्लंघन करने और मनमाने ढंग से काम करने की ताकत मिलती है, जबकि वे साथी चुनाव आयुक्तों द्वारा उठायी गए आपत्तियों या टिप्पणियों पर ध्यान नहीं देते।


