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प्राइम मक्खन और कंधों पर कंकाल वाला भारत

2024 के चुनाव में भाजपा ने ओडिशा पर शासन करने में सफलता हासिल कर ली थी।

प्राइम मक्खन और कंधों पर कंकाल वाला भारत
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— सर्वमित्रा सुरजन

2024 के चुनाव में भाजपा ने ओडिशा पर शासन करने में सफलता हासिल कर ली थी। जो बीजू जनतादल लगातार एनडीए का हिस्सा बना रहा, वो मोदी के दौर में अलग हो गया और ओडिशा में उसी की सत्ता भाजपा ने खत्म कर दी। लोगों से यही वादा किया गया कि बीमारू राज्यों की श्रेणी में शामिल ओडिशा में अब विकास होगा। लेकिन यहां लगातार प्रताड़ना की खबरें आ रही हैं।

श की ताजा घटनाओं पर दो अलग-अलग तरह के कैरिकेचर देखने मिले। अमूल मक्खन के विज्ञापन में इस बार फुटबॉल खिलाड़ी बने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को दर्शाते हुए लिखा गया है सेंटर के फॉरवर्ड, अमूल प्राइम मक्खन। पाठक जानते हैं कि फुटबॉल के खेल में सेंटर-फॉरवर्ड की स्थिति पर खेल रहे खिलाड़ी की भूमिका सबसे अहम होती है। सेंटर फॉरवर्ड विरोधी टीम के गोल के सबसे पास यानी केंद्रीय स्थिति में खेलने वाला मुख्य हमलावर होता है। उसकी प्राथमिक भूमिका गोल करना है। एक कुशल सेंटर-फॉरवर्ड न केवल गोल दागेगा, बल्कि गेंद को अपने पास रख कर अपने बाकी साथियों के लिए अवसर बनाकर विपक्षी रक्षा पंक्ति को पूरी तरह व्यस्त रखता है। तो अमूल के हिसाब से नरेन्द्र मोदी इस समय ऐसे ही गोल के पास खड़े हैं, बल्कि गोल दाग भी रहे हैं और विपक्ष को हैरान-परेशान कर रहे हैं। सेंटर के फॉरवर्ड की मुख्य पंक्ति के साथ नीचे अमूल ने लिखा है- अमूल प्राइम मक्खन। अब पाठक इसका भी विश्लेषण अपनी-अपनी तरह से कर सकते हैं। पीएम मोदी को फुटबॉल में अहम भूमिका में खेलने वाला बताकर क्या कंपनी ने प्राइम मक्खन लगाया है यानी हद दर्जे की चाटुकारिता दिखाई है या फिर तंज कसा है। अमूल का मकसद जो भी रहा हो, लेकिन इस बहाने मोदी का फु टबॉल खेलना फिर से चर्चा में आ गया। हालांकि पिछले पांच दिनों में केवल फुटबॉल खेलने का वीडियो प्रधानमंत्री ने नहीं बनवाया है, बल्कि खाली समय बिताने के लिए और भी बहुत कुछ किया है।

प.बंगाल में चुनावी रैली में टीएमसी और कांग्रेस को कोसते-कोसते प्रधानमंत्री थक गए तो हुगली नदी पर नौकाविहार करने चले गए। अपना कैमरा भी साथ ले गए। उनकी शूटिंग टीम ने उन्हें तस्वीरें उतारते हुए अपने कैमरों में उतारा। एक पुराना गीत है- सुनयना, आज इन नज़ारों को तुम देखो और मैं तुम्हें देखते हुए देखूं। बस इसी भाव के साथ मोदीजी की वीडियो कैमरा टीम ने उनका वीडियो बनाया है। प.बंगाल से मोदी सिक्किम पहुंचे, वहां गंगटोक में रोड शो हुआ, तो फिर वीडियो बना। इसके बाद युवा खिलाड़ियों के साथ साहब ने फुटबॉल भी खेला, वो भी बाकायदा फुटबॉल खिलाड़ियों की पोशाक में। इसका भी वीडियो बना। फुटबॉल खेलते हुए तो अखिलेश यादव, राहुल गांधी के भी वीडियो बने हैं, लेकिन इसके लिए उन्हें तामझाम की जरूरत नहीं पड़ी। अखिलेश यादव के कुर्ते पायजामा में ही फुटबॉल खेलते कई वीडियो हैं। जब वो मैसूर में कॉलेज में पड़ते थे, तभी फुटबॉल खेलते हुए ही उनकी नाक में फैक्चर हुआ था। इसी तरह राहुल गांधी भी कई बार युवाओं या बच्चों के साथ फुटबॉल खेलते देखे गए हैं। उन्हें भी कॉलेज के दिनों में फुटबॉल खेलते समय घुटने में गंभीर चोट लगी थी, जिसका ऑपरेशन हुआ और लंबे समय तक फिजियोथेरेपी चली। यह पुरानी चोट भारत जोड़ो यात्रा के दौरान फिर से उभर आई थी, जिससे उन्हें दर्द और चलने में परेशानी हुई। अफसोस कि मोदीजी ऐसी किसी चोट से अपना रिश्ता नहीं जोड़ सकेंगे, क्योंकि नहीं पता कि उन्होंने कॉलेज के दिनों में क्या पढ़ाई की और कौन से खेल खेले? लेकिन अब फुटबॉल खेलकर उन्होंने अपनी इस कसक को भी पूरा कर लिया है, बस किसी चोट का जिक्र नहीं है। वैसे उनके शासन में जनता को ही खूब चोटें मिली हैं और उसे मलहम भी खुद ही लगाना पड़ रहा है। दूसरा कैरिकेचर इसी से जुड़ा है। उसका वर्णन आगे होगा। फिलहाल मोदीजी का फुटबॉल खेलना प.बंगाल चुनाव के बीच सोची समझी रणनीति दिखती है।

क्योंकि बंगाल के लोगों की फु टबॉल के प्रति दीवानगी जगजाहिर है। यहां के मैदान में ममता बनर्जी ने फुटबॉल को किक मारते हुए पिछले चुनावों में कहा था खेला होबे और वाकई तब भाजपा के साथ खेल हो गया था। उसे हार का सामना करना पड़ा था। अब किक मोदीजी ने मारी है, तो देखना होगा कि खेल हुआ या नहीं। हालांकि गंगटोक में फुटबॉल खेलने पहुंचे प्रधानमंत्री मोदी को कांग्रेस ने याद दिलाया कि पास में ही मणिपुर भी है, जो फिर से हिंसा से ग्रस्त है और वहां के बच्चे, युवा भी फुटबॉल खेलना पसंद करते हैं। हिंसा के कारण राहत शिविरों में रह रहे बच्चों के लिए राहुल गांधी ने फुटबॉल भी भिजवाई है। तो प्रधानमंत्री चाहते तो सिक्किम के बाद मणिपुर जाते, वहां भले फुटबॉल नहीं खेलते, लेकिन कम से कम हालात का जायजा लेते तो पुलिस प्रशासन को भी बल मिलता और लोगों को राहत की उम्मीद बंधती। लेकिन प्रधानमंत्री सिक्किम से उत्तरप्रदेश में अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी चले गए। गृहमंत्री अमित शाह भी 27 तारीख तक प.बंगाल में ही थे, वे भी मणिपुर नहीं गए। बल्कि गुजरात चले गए। इन दोनों की प्राथमिकता केवल चुनाव जीतना और भाजपाशासित राज्यों की गिनती बढ़ाना है। उसके बाद राज्यों में चाहे लोग कंकाल ढोने पर मजबूर हो जाएं, इन्हें फर्क नहीं पड़ता।

2024 के चुनाव में भाजपा ने ओडिशा पर शासन करने में सफलता हासिल कर ली थी। जो बीजू जनतादल लगातार एनडीए का हिस्सा बना रहा, वो मोदी के दौर में अलग हो गया और ओडिशा में उसी की सत्ता भाजपा ने खत्म कर दी। लोगों से यही वादा किया गया कि बीमारू राज्यों की श्रेणी में शामिल ओडिशा में अब विकास होगा। लेकिन यहां लगातार प्रताड़ना की खबरें आ रही हैं। लड़कियों की असुरक्षा, सांप्रदायिक तनाव, आदिवासी उत्पीड़न, विकास के नाम पर जंगलों का काटना यह सब तो लगातार हो ही रहा है, लेकिन अब एक ऐसा वीडियो सामने आया जो आत्मनिर्भर, विकसित भारत के मुंह पर करारा तमाचा है। देश ने कई बार बीमार परिजन को कंधे पर ढोकर अस्पताल ले जाते देखा है, कंधों पर या ठेलों पर अपने प्रियजन की लाश ले जाने के मार्मिक दृश्य भी सामने आए हैं, क्योंकि गरीब को एंबुलेंस नहीं मिलती। लेकिन एक बूढ़े व्यक्ति को कब्र से अपनी बहन का कंकाल निकालकर कंधे पर ढोना पड़े, ताकि वो बैंक में यह दिखा सके कि देखो ये मर चुकी है, तो इसकी मार्मिकता, हालात की भयावहता, प्रशासन की सूखती संवेदना, सरकारों की निष्ठुरता को किन शब्दों में बयां किया जाए। इस दृश्य के लिए शब्द चूक गए लेकिन टाइम्स ऑफ इंडिया के कार्टूनिस्ट संदीप अध्वर्यू ने इस पर एक सटीक कैरिकेचर बनाया है। जिसमें अर्द्धनग्न आदिवासी के कंधे पर उसकी बहन का कंकाल है और लिखा है कि- ओडिशा में बैंक ने दावे को खारिज किया तो अपनी बहन के कंकाल को कंधे पर ले जाता शख्स। इसके नीचे के वाय सी लिखकर उसका विस्तार बताया गया है- नो योअर कॉर्प्स यानी अपने शव को पहचानो। जबकि बैंकिंग शब्दावली में के वाय सी का मतलब होता है, नो योअर कस्टमर। इसके नीचे एक और मारक लाइन लिखी है कि फाइनेंशियल इंक्लूज़न का आखिरी पड़ाव। फाइनेंशियल इंक्लूजन यानी वित्तीय समावेशन का अर्थ समाज के कमजोर, वंचित और ग्रामीण वर्गों को सस्ती, सुलभ और जिम्मेदार बैंकिंग व वित्तीय सेवाएं (जैसे खाता, ऋण, बीमा, पेंशन) प्रदान करना है। इसका मुख्य उद्देश्य गरीब आबादी को औपचारिक बैंकिंग प्रणाली से जोड़कर, उन्हें आर्थिक रूप से सशक्त बनाना और साहूकारों के चंगुल से बचाना है।

भाजपा की सरकार में किस तरह वित्तीय समावेशन किया जा रहा है, उसकी पोल ओडिशा की इस घटना ने खोल दी है। दरअसल क्योंझर जिले में 52 बरस से जीतू मुंडा अपनी बहन की मौत के बाद उसके ग्रामीण बैंक खाते से 19,300 रुपये निकालना चाहते थे। उन्होंने बैंक मैनेजर को कई बार बताया कि दो महीने पहले उनकी बहन की मौत हो चुकी है। लेकिन बैंक मैनेजर लगातार खाताधारक को लाने या क़ानूनी वारिस के दस्तावेज़ देकर मृत्यु का प्रमाण पेश करने पर ही ज़ोर देता रहा तो थक-हार कर जीतू ने श्मशान घाट से अपनी बहन का कंकाल ही लाकर बैंक में दिखा दिया कि देखो ये मर चुकी है और मैं ही इसका वारिस हूं। बैंक में कंकाल देखकर अफरातफरी मची, पुलिस आई, बीडीओ आए और जीतू को समझा कर वापस भेजा गया तो वो फिर अपनी बहन का कंकाल कंधे पर लादकर श्मशान घाट ले गए। बैंक मैनेजर का कहना है कि जीतू ने पहले अपनी बहन के लकवाग्रस्त होने की बात कही और बाद में बताया कि वो मर गई है। इसके अलावा यह भी कहा कि बीते दो महीनों में जीतू कभी पैसे निकालने बैंक नहीं आए। मृतका के दो अन्य क़ानूनी वारिस भी हैं और वे भी पैसे निकालने बैंक आए थे, इसलिए बैंक ने जीतू से क़ानूनी दस्तावेज़ पेश करने को कहा। बहरहाल, अब जीतू और बाकी दो वारिसों को 19300 रूपए दे दिए गए हैं कि वे आपस में बांट लें। जीतू मुंडा को डिस्ट्रिक्ट रेड क्रॉस फंड से 30,000 रुपये की आर्थिक सहायता दी गई है। जिला प्रशासन ने बताया है कि इसके अलावा उन्हें मृत्यु प्रमाण पत्र और क़ानूनी वारिस का प्रमाण पत्र जारी किया गया है। बैंक मैनेजर पर कार्रवाई की बात भी की गई है।

लेकिन क्या इससे कंधे पर कंकाल ढोने की मजबूरी खत्म हो जाएगी? यह सवाल उस भाजपा से करना चाहिए जिसका दावा है कि 2014 के बाद देश को असली आजादी मिली। जो ओडिशा की ही एक आदिवासी महिला को राष्ट्रपति पद पर बिठाने का श्रेय लेती है और दावा करती है कि उसके शासन में दलित, आदिवासी, पिछड़े हर तबके की चिंता की जा रही है। प्रधानमंत्री मोदी के हिसाब से तो देश में दो ही जातियां हैं गरीब और अमीर, तो जीतू मुंडा को वो किस जाति में रखने वाले हैं, क्योंकि उसने तो कंकाल ढोकर अपना वाजिब हक हासिल किया है। क्या मोदी के सपनों का विकसित भारत ऐसा ही होगा जहां विक्रमादित्य के कंधों पर वेताल सवार रहे। वीडियो बनवा कर अगर मोदी कभी थकें या ऊब जाएं तो इन सवालों पर भी विचार करें।


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