प्रवासी भारतीय दिवस : गांधीजी की विरासत से वैश्विक भारत तक
इतिहास की कुछ तिथियां केवल अतीत की स्मृति नहीं, भविष्य की दिशा भी तय करती हैं

- अरुण कुमार डनायक
भारत पिछले कई वर्षों से विश्व में सर्वाधिक रेमिटेंस प्राप्त करने वाला देश है। प्रवासी भारतीयों द्वारा भेजा गया रेमिटेंस न केवल विदेशी मुद्रा भंडार को सुदृढ़ करता है, बल्कि अर्थव्यवस्था, शिक्षा, स्वास्थ्य और स्टार्टअप सहित छोटे व्यवसायों को भी आधार देता है। जून 2025 तक भारतीय बैंकों में एनआरआई जमा राशियां लगभग 3.6 बिलियन डॉलर रहीं, जबकि वित्त वर्ष 2024-25 में रेमिटेंस बढ़कर 135.46 बिलियन डॉलर पहुंच गया।
इतिहास की कुछ तिथियां केवल अतीत की स्मृति नहीं, भविष्य की दिशा भी तय करती हैं। 9 जनवरी ऐसी ही एक तिथि है, जब 1915 में महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे और स्वतंत्रता आंदोलन को नई दिशा मिली। राजनीतिक निराशा के दौर में उन्होंने देश का भ्रमण कर भारत की आत्मा को समझा और व्यापक जन-आंदोलन की नींव रखी। इसी ऐतिहासिक वापसी की स्मृति में 9 जनवरी को प्रवासी भारतीय दिवस मनाया जाता है—जो गांधीजी की विरासत और विदेशों में बसे भारतीयों के योगदान दोनों का सम्मान करता है।
भारत विश्व का सबसे बड़ा प्रवासी समुदाय वाला देश है। 1990 में जहां प्रवासी भारतीयों की संख्या लगभग 66 लाख थी, आज विश्व भर में लगभग 3.5 करोड़ भारतीय रहते हैं, जिनमें करीब 1.6 करोड़ अप्रवासी भारतीय और लगभग 1.95 करोड़ विदेशी नागरिकता प्राप्त भारतीय मूल के लोग शामिल हैं। विभिन्न अनुमानों के अनुसार, अमेरिका में 55 लाख, संयुक्त अरब अमीरात में 36 लाख और मलेशिया में 28 लाख भारतीय मूल के लोग निवास करते हैं। इसके अलावा अन्य देशों में भी बड़ी संख्या में भारतीय बसे हुए हैं। खाड़ी देशों में कुल प्रवासी भारतीयों का लगभग आधा हिस्सा निवास करता है। यूरोप और खाड़ी देशों में भारतीय कुशल एवं अर्ध-कुशल पेशेवरों की बढ़ती मांग के चलते श्रमिकों की अंतरराष्ट्रीय आवाजाही अब केवल आर्थिक विषय नहीं रह गई है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक संवाद का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गई है। आज भारत कई देशों के साथ द्विपक्षीय समझौतों में कौशल-आधारित श्रम सहयोग, सामाजिक सुरक्षा और सुरक्षित आव्रजन को केंद्रीय विषय के रूप में आगे बढ़ा रहा है।
भारत पिछले कई वर्षों से विश्व में सर्वाधिक रेमिटेंस प्राप्त करने वाला देश है। प्रवासी भारतीयों द्वारा भेजा गया रेमिटेंस न केवल विदेशी मुद्रा भंडार को सुदृढ़ करता है, बल्कि अर्थव्यवस्था, शिक्षा, स्वास्थ्य और स्टार्टअप सहित छोटे व्यवसायों को भी आधार देता है। जून 2025 तक भारतीय बैंकों में एनआरआई जमा राशियां लगभग 3.6 बिलियन डॉलर रहीं, जबकि वित्त वर्ष 2024-25 में रेमिटेंस बढ़कर 135.46 बिलियन डॉलर पहुंच गया—पिछले वर्ष से करीब 14 प्रतिशत अधिक, जो वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच प्रवासी भारतीयों के भरोसे और निरंतर योगदान को दर्शाता है।
प्रवासी भारतीयों ने विज्ञान और शिक्षा में वैश्विक नवाचार को बढ़ावा दिया—जैसे कल्पना चावला, सत्य नडेला और सुंदर पिचाई; राजनीति में ऋषि सुनक, अनिरुद्ध जगन्नाथ, महिला प्रवासियों ने व्यापार और सामाजिक क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया—जैसे इंदिरा नूयी, और मीरा नायर; वहीं रविशंकर, जुबिन मेहता जैसे कलाकारों ने सांस्कृतिक उपलब्धियों के माध्यम से भारत की वैश्विक छवि को सशक्त किया।
संकट की घड़ियों में प्रवासी भारतीयों की भूमिका और भी स्पष्ट होती है—कोविड-19 के दौरान रेमिटेंस जीवनरेखा बना रहा, जबकि 2018 की केरल बाढ़ में खाड़ी देशों से व्यापक आर्थिक और राहत सहायता पहुंची। राष्ट्रीय स्वाभिमान के संकट में भी प्रवासी भारतीय भारत के साथ मजबूती से खड़े रहे। इसका सशक्त उदाहरण मई 1998 के पोखरण परमाणु परीक्षण हैं, जब प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भारत ने अपनी परमाणु क्षमता का सार्वजनिक प्रदर्शन किया। इसके बाद अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के प्रशासन ने ग्लेन संशोधन के तहत अनेक आर्थिक प्रतिबंध लगाए। इस चुनौतीपूर्ण समय में वाजपेयी के आह्वान पर एनआरआई समुदाय ने रेमिटेंस बढ़ाया इससे विदेशी मुद्रा भंडार को स्थिरता मिली और प्रतिबंध काफी हद तक निष्प्रभावी हुए। यह सहयोग आर्थिक ही नहीं, बल्कि भारत की संप्रभुता और आत्मसम्मान के प्रति प्रवासी भारतीयों की गहरी प्रतिबद्धता का प्रमाण था।
भारत सरकार और रिज़र्व बैंक ने प्रवासी भारतीयों को विकास-यात्रा से जोड़ने के लिए कई पहलें की हैं। ओसीआई कार्ड ने वीज़ा-मुक्त यात्रा, संपत्ति स्वामित्व और व्यापारिक भागीदारी को आसान बनाया है, जबकि एनआरई/एनआरओ खाते और एफसीएनआर जमाएं सुरक्षित निवेश व कर रियायतें देती हैं। डिजिटल भारत के तहत यूपीआई के अंतरराष्ट्रीय विस्तार से विदेशी मोबाइल नंबरों के माध्यम से भी भारत में भुगतान और लेन-देन संभव हुआ है। इसके अतिरिक्त, विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम (फेमा) के नियमों को सरल बनाकर निवेश, व्यापार और रेमिटेंस से जुड़ी प्रक्रियाओं को आसान किया गया है। कर नियमों के अनुसार एनआरआई की वही आय भारत में कर योग्य मानी जाती है जो भारत में स्थित संपत्ति, व्यापार, सेवाओं या आय-स्रोत से उत्पन्न हो—जैसे संपत्ति के हस्तांतरण से पूंजीगत लाभ, भारत में दी गई सेवाओं का वेतन, भारतीय कंपनियों से लाभांश, ब्याज तथा भारत से जुड़ी रॉयल्टी या तकनीकी सेवा शुल्क। साथ ही, दोहरी कराधान से बचाव समझौतों के माध्यम से सरकार यह सुनिश्चित करती है कि एक ही आय पर भारत और विदेश—दोनों जगह कर न देना पड़े, जिससे प्रवासी भारतीयों को कर-राहत मिलती है। संकट की घड़ी में हेल्पलाइन, पासपोर्ट सेवाएं और कांसुलर सहायता यह सुनिश्चित करती हैं कि प्रवासी विदेश में भी देश का संरक्षण और सहयोग पा सकें।
प्रवासी भारतीय चाहते हैं कि निवेश प्रक्रियाएं सरल और पारदर्शी हों, दोहरी नागरिकता पर व्यापक संवाद हो, और संपत्ति, कर व उत्तराधिकार कानून स्पष्ट हों, ताकि वे दीर्घकालीन योजना बना सकें। साथ ही, वे अपने बच्चों को शिक्षा, संस्कृति और भाषा के माध्यम से भारत से जुड़े रहने के पर्याप्त अवसर चाहते हैं, जिससे आने वाली पीढ़ियां अपनी जड़ों और पहचान के साथ दृढ़ता से जुड़ी रहें। ट्रम्प प्रशासन द्वारा लागू उच्च टैरिफ और पेशेवर भारतीयों से जुड़े वीज़ा निर्णय वहां बसे भारतीयों के लिए चिंता का विषय हैं, जिससे रोज़गार और आय पर दबाव पड़ा और भारत से आयातित वस्तुएं महंगी हुई हैं; इस संदर्भ में वे भारत सरकार से प्रभावी कूटनीतिक हस्तक्षेप की अपेक्षा रखते हैं।
प्रवासी भारतीय दिवस केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि भविष्य का संकल्प है। कभी जिन्हें ब्रेन ड्रेन का प्रतीक माना गया, वही प्रवासी आज ब्रेन गेन और इनकम गेन के रूप में ज्ञान, तकनीक, निवेश और वैश्विक नेटवर्क के माध्यम से भारत की सामर्थ्य बन चुके हैं। उनकी उद्यमिता और नवाचार आर्थिक शक्ति को सुदृढ़ करते हैं, जबकि संस्कृति, भाषा और मूल्यों का प्रसार भारत की सॉफ्ट पावर को वैश्विक स्तर पर मजबूत करता है। भौगोलिक दूरी के बावजूद उनकी जड़ें भारत में हैं, और उनकी बौद्धिक व आर्थिक भागीदारी भारत को उभरती शक्ति से आगे बढ़ाकर वैश्विक नेतृत्व की ओर ले जाती है।
प्रवासी भारतीय दिवस हमें याद दिलाता है कि जहां भी भारतीय हैं, वहां भारत जीवित है—आर्थिक सामर्थ्य, सांस्कृतिक चेतना और मानवीय मूल्यों के साथ।
(लेखक भारतीय स्टेट बैंक के सेवानिवृत सहायक महाप्रबंधक हैं )


