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देशोन्मुखी और जनहित की नीति से मिटेगी गरीबी

कोरोना की महामारी, युद्ध की समस्या और अब ईरान-इज़रायल युद्ध से उपजे ऊर्जा संकट से भारत जैसा करीब 150 करोड़ की आबादी का देश भीतर तक परेशान हो उठा है।

देशोन्मुखी और जनहित की नीति से मिटेगी गरीबी
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नीतीश कुमार सिंह

हमें अपने इतिहास को टटोलने की ज़रूरत है। फिर उन पुख्ता रास्तों पर आज के समय के लिहाज से कदम बढ़ाने होंगे, जिससे हम अपनी आर्थिक बुनियाद को मजबूत करते हुए देशोन्मुखी और गरीबों के लिए लाभदायी व्यवस्था का निर्माण कर सकें। इसमें गांव से शहर की ओर आर्थिक प्रवाह का तंत्र हो जो भारत की गरीबी को खत्म करने में निर्णायक भूमिका अदा कर सके।

भारत समेत दुनिया भर के लिए पिछला एक दशक कठिनाइयों से भरा रहा है। कोरोना की महामारी, युद्ध की समस्या और अब ईरान-इज़रायल युद्ध से उपजे ऊर्जा संकट से भारत जैसा करीब 150 करोड़ की आबादी का देश भीतर तक परेशान हो उठा है।

फिलहाल पेट्रोलियम पदार्थों- पेट्रोल और डीजल के दामों में बढ़ोतरी से बेहद गरीब आबादी और मध्य वर्ग की दाल-रोटी महंगी हो गई है। ऐसे में सरकारें हालातों पर काबू पाने के लिए इलेक्ट्रिक वाहन, वर्क फ्रॉम होम, कार पूलिंग और ऊर्जा के किफायती इस्तेमाल सरीखे तरीके अपनाने के लिए जनता से आह्वान कर रही हैं।

हालांकि गरीबी को जड़ से मिटाने का जतन आजादी के बाद से चल रहा है। इस आपदा भरे दशक में भी चिंता यह है कि इससे कैसे निपटा जाए। एक नजर डालें तो अंग्रेजों से पहले भारत के आर्थिक विकास का केंद्र गांव ही थे। शहर गांवों पर निर्भर थे। आज गांव शहरों पर। जब अंग्रेजों की शासन व्यवस्था हुई तो जिला और तहसील प्रासंगिक हो गये और कुछ अंग्रेजों ने पूरे भारत पर इसी व्यवस्था के बूते प्रशासन किया। हालांकि इसमें सिर्फ नियंत्रण और शोषण की वृत्ति ही अपनायी गयी।

आजाद भारत के संविधान निर्माताओं ने नीति निदेशक सिद्धांतों में गांव, गरीब, किसान और भूमिहीन को सशक्त बनाने की दिशा में सोचा। संविधान निर्माता डॉ. बीआर आंबेडकर इससे सहमति जताई और आर्थिक विकास की सोच को हरेक विचारधारा के लिए स्वतंत्र रखा। परंतु यह सवाल लाजमी है कि इसे कानूनी तौर पर क्यों बाध्यकारी नहीं किया गया जिससे सरकारों को लोक कल्याण करना आदेशमूलक होता। संविधान सभा के सदस्य इस पर भी सवाल उठाते हैं।

केटी शाह का कहना था-'राज्य के नीति निदेशक सिद्धांत आदेशमूलक व अनिवार्य कर्तव्य हों जिनकी मांग करने का प्रत्येक नागरिक के पास अधिकार हो और मांग की पूर्ति की जाए।' उन्होंने यह भी कहा कि यदि कोई राज्य सरकार इन कर्तव्यों का पालन न कर पाए तो समय-समय पर होने वाले निर्वाचनों में असफल होकर अपदस्थ हो जाएंगी। संविधान सभा को इस पर आगे बढ़कर जहां चाह वहां राह को अपनाना चाहिए।'

संविधान सभा में राज्य के नीति निदेशक सिद्धांत (अनुच्छेद 36 से 51) के 'आर्थिक प्रजातंत्र' के मुद्दे पर 19 नवंबर, 1948 को डॉ. आंबेडकर ने कहा, 'ऐसी अनेकों विधियां हैं जिनके माध्यम से लोग विश्वास करते हैं कि आर्थिक प्रजातंत्र की स्थापना की जा सकती है। ऐसे व्यक्ति भी हैं जो यह विश्वास करते हैं कि व्यक्तिवाद ही आर्थिक प्रजातंत्र का उत्तम रूप है, ऐसे भी हैं जो समाजवादी राज्य को आर्थिक प्रजातंत्र का सर्वोत्तम रूप समझते हैं। ऐसे भी हैं जो साम्यवादी विचारों को आर्थिक प्रजातंत्र का बिल्कुल ठीक रूप मानते हैं। यह सोचते हुए कि ऐसी अनेकों विधियां हैं जिनके द्वारा आर्थिक प्रजातंत्र की स्थापना की जा सकती है। हमने जान-बूझकर निदेशक सिद्धांतों में ऐसी भाषा का प्रयोग किया है जो निश्चित या संदिग्ध नहीं है। भिन्न-भिन्न विचारधाराओं के लोगों के लिए आर्थिक प्रजातंत्र के आदर्श को प्राप्त करने हेतु अपनी विधि के अनुसार प्रयास करने का रास्ता है। यानी जिस प्रकार से वह काम करना चाहे उसी प्रकार से कार्य करने का पूरा-पूरा अवसर प्रदान करने के संबंध में हमने काफी गुंजाइश रखी है।'

गौरतलब है कि आजादी के बाद प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने भी बिना वैचारिक घोषणा के आर्थिक दिशा में काम शुरू किया। पंचवर्षीय योजना के तहत देश से गरीबी व भुखमरी मिटाने के साथ-साथ औद्योगिक विकास की राह पकड़ी। इंदिरा गांधी के जमाने में 1962 और 1965 के युद्ध के बाद बने खराब आर्थिक हालातों के बीच 1971 में 'गरीबी हटाओ' का कार्यक्रम आया जो राजनीतिक रूप से चर्चित तो हुआ पर कारगर कम। साल 1991 में पीवी नरसिम्हा राव सरकार के दौरान उदारीकरण, वैश्वीकरण और निजीकरण की नीति तो अपनाई गई और इसके विचार के केन्द्र में भी गरीबी थी, परंतु उस दौर में पढ़े-लिखे वर्ग को ही इसका लाभ हुआ। गांव, गरीब इससे उतने अधिक लाभान्वित नहीं हो सके।

बहरहाल, आज और अंग्रेजी हुकूमत में कई समानताएं नज़र आती हैं। संविधान सभा के सदस्य के टी शाह ने बताया था कि गोपाल कृष्ण गोखले ने सर्वप्रथम अनिवार्य शिक्षा संबंधी विधेयक उपस्थित किया था तो उसे समय इस असाध्य बता दिया गया। इसको लेकर एक तरफ यह था कि 10 वर्ष में तीन करोड़ रुपये यानी तीन लाख रुपये प्रतिवर्ष का खर्च उस समय की भारतीय सरकार की आर्थिक व्यवस्था के लिए बहुत भारी-भरकम था, परंतु चार वर्ष में ही 30 करोड़ रुपये लड़ाई (विश्व युद्ध) पर बर्बाद किए गए थे जिससे भारत के लोगों का कोई संबंध नहीं था।

सही मायनों में हमें अपने इतिहास को टटोलने की ज़रूरत है। फिर उन पुख्ता रास्तों पर आज के समय के लिहाज से कदम बढ़ाने होंगे, जिससे हम अपनी आर्थिक बुनियाद को मजबूत करते हुए देशोन्मुखी और गरीबों के लिए लाभदायी व्यवस्था का निर्माण कर सकें। इसमें गांव से शहर की ओर आर्थिक प्रवाह का तंत्र हो जो भारत की गरीबी को खत्म करने में निर्णायक भूमिका अदा कर सके।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार और राजनीति शास्त्र के शिक्षक हैं।)


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