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खानपान पर राजनीति

भाजपा की दुविधा यह है कि वह भारतीयों की प्रचलित खानपान की आदतों और अपने शाकाहार लादने के एजेंडे के बीच संतुलन कैसे कायम करे।

खानपान पर राजनीति
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  • राम पुनियानी

भाजपा की दुविधा यह है कि वह भारतीयों की प्रचलित खानपान की आदतों और अपने शाकाहार लादने के एजेंडे के बीच संतुलन कैसे कायम करे। हर संभव अवसर पर वह और उसके सहयोगी संगठन शाकाहार को बढ़ावा देने की कोशिश करते हैं। किसी वजह से भाजपा मांसाहार को मुसलमानों से जोड़ती है। जबकि मांसाहार धर्म की सीमाओं के परे भारतीयों की खानपान की आदतों का अभिन्न अंग है।

आज के दौर में राजनीतिक प्रोपेगंडा से समाज के नजरिए को प्रभावित करने के बहुत से उदाहरण हमारे सामने हैं। खानपान की आदतें भी विभाजनकारी राजनैतिक प्रवृत्तियों के हाथ में एक औजार बन गईं हैं। यह तर्क दिया जाता है कि मुसलमान इसलिए अधिक हिंसक होते हैं क्योंकि वे मांसाहारी होते हैं। पवित्र गाय और गौमांस के सेवन को भी इससे जोड़ दिया गया और नतीजे में हम भारत में लिंचिंग की शुरूआत के साक्षी बने जिसके मुख्य शिकार मुस्लिम होते हैं किंतु साथ ही बड़ी संख्या में दलितों को भी इसका सामना करना पड़ता है। हाउसिंग सोसायटियों में किसे रहने की इजाजत दी जाए और किसे नहीं, यह भी खानपान की आदतों के आधार पर तय होने लगा है। हाउसिंग सोसायटियां फ्लैट बेचने की अनुमति देने के पहले खरीदार की खानपान की आदतों के बारे में पूछताछ करती हैं। यह मुद्दा अधिक जटिल स्वरूप में हाल में बंगाल में सामने आया जहां पूजा-पंडालों के आसपास मांसाहारी खाद्य सामग्री न रखने की सलाह दी गई। साथ ही, समाज का एक तबका यह मांग कर रहा है कि जैन धर्म के पर्यूषण पर्व के दौरान मांसाहारी खाद्य पदार्थों पर प्रतिबंध लगना चाहिए।

धीरेन्द्र कृष्ण शास्त्री (पर्चीवाले बाबा, जिन्हें प्रधानमंत्री अपना छोटा भाई कहते हैं) की दुर्गापूजा में मांसाहार पर निषेध की सलाह की मिलीजुली प्रतिक्रिया हुई। कुछ ही दिनों में बंगाल का सबसे बड़ा उत्सव, दुर्गा पूजा प्रारंभ होने वाला है। भाजपा हाल ही में पश्चिम बंगाल में सत्ता पर काबिज हुई है। बंगाल में भाजपा की राजनैतिक शक्ति में बढ़ोतरी के साथ-साथ वहां भगवान राम को बढ़ावा देने का सिलसिला शुरू हो गया है। भाजपा और उसके समर्थकों द्वारा भगवान राम पर केन्द्रित उत्सवों को बढ़ावा दिया जा रहा है। राम का सहारा लेने से भाजपा को उत्तर भारत में जबरदस्त चुनावी लाभ हुआ, जिसका प्रभाव पूरे देश के चुनावी परिदृश्य पर पड़ा।

भाजपा ने बंगाल में सत्ता संभालने के बाद बागेश्वर धाम के धीरेन्द्र शास्त्री को बंगाल आने का न्यौता दिया। वे हावड़ा के लिलुआह में हनुमान कथा सुनाने के लिए आए थे। उन्होंने लोगों को सलाह दी कि पूजा के दौरान मांसाहारी खाद्य पदार्थों को दुर्गा प्रतिमा से दूर रखा जाए। ऐसा ही परामर्श आरएसएस की सहयोगी संस्था व्हीएचपी द्वारा कुछ दिन पहले दिया जा चुका था। इससे बंगाली हिन्दू नाराज हो गए। इनमें वे हिन्दू भी शामिल थे जो स्वयं को 'हिन्दू राष्ट्रवादी' कहते हैं। कई प्रमुख बंगालियों ने अपना विरोध प्रदर्शित किया और वक्तव्य जारी कर कहा कि शास्त्री को हमें यह सिखाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए कि हम दुर्गापूजा कैसे मनाएं और क्या खाएं और क्या न खाएं। इस प्रतिक्रिया की वजह यह तथ्य है कि मछली और बकरे के मांस से बनने वाले व्यंजन दुर्गा उत्सव का लगभग अनिवार्य हिस्सा हैं। कई लोगों ने इस ओर ध्यान दिलाया कि मछली का बंगाली संस्कृ ति में बहुत महत्वपूर्ण स्थान है और मांसाहारी खाद्य पदार्थ हिंदू धर्म के कई धार्मिक संस्कारों का हिस्सा हैं। त्रिपुरा के पूर्व राज्यपाल तथागत रॉय से लेकर कई पत्रकारों, कंटेट क्रियेटरों, समाज के विभिन्न वर्गों के व्यक्तियों, जिनमें स्वयं को 'बंगाली हिन्दू राष्ट्रवादी' कहने वाले भी शामिल हैं, ने इसके प्रति विरोध प्रदर्शित किया। 'बंगालियों को यह न बताया जाए कि वे दुर्गा पूजा कैसे मनाएं' कोलकाता की कंटेट क्रियेटर श्रेयसी विश्वास बैनर्जी ने फेसबुक पर लिखा। उन्होंने एक वीडियो भी अटैच किया जिसमें उन्होंने कहा कि एक 'बाहरी व्यक्ति' विशिष्ट बंगाली धार्मिक और पाक परंपराओं के कायदे निर्धारित कर रहा है। कई लोगों ने शास्त्री के पोस्टरों को फाड़ा और विकृत किया।

शुभेन्दु अधिकारी, जिन्होंने शास्त्री का बहुत गर्मजोशी से स्वागत किया था, कोलकाता के कालीघाट मंदिर में एक समारोह में शामिल हुए और प्रसाद के रूप में तली हुई मछली का सेवन किया। कई लोगों ने कहा कि मछली बंगाली संस्कृति का केन्द्रीय तत्व है। भारत सभी दृष्टियों से अत्यंत विविधतापूर्ण है चाहे वह खानपान हो, वेशभूषा हो, भाषा हो या धर्म। हिन्दुओं के कई पंथ हैं और कई तरह की खानपान की आदतें और परंपराएं हैं। मटन के व्यंजन कश्मीरी ब्राह्मणों की संस्कृति का अपरिहार्य भाग है। खानपान की आदतें कई कारकों से निर्धारित होती हैं। भौगोलिक स्थिति उसका एक महत्वपूर्ण आधार होता है। तटीय क्षेत्रों में समुद्री भोजन आहार का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

हाल में संपन्न हुए ब्रिक्स सम्मेलन में प्रधानमंत्री द्वारा दिए गए रात्रिभोज में केवल शाकाहारी भोजन परोसा गया। संयोगवश शी जिनपिंग इस भोज में शामिल नहीं हुए, इसकी वजह चाहे जो भी रही हो। जहां विपक्ष ने अंतरराष्ट्रीय अतिथियों के लिए केवल शाकाहारी भोजन उपलब्ध कराने की आलोचना की वहीं किरन रिजिजू ने इसका बचाव करते हुए कहा कि अतिथियों ने मेनू की तारीफ की। इससे सरकार का यह नजरिया भी जाहिर होता है कि भारत केवल शाकाहारी व्यंजनों वाला देश है। उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हाल में राज्य के सभी जिलों के मुख्य व्यंजनों का एक मानचित्र प्रकाशित करवाया। इसमें लखनऊ के टुंडे कबाब का जिक्र नहीं था और केवल शाकाहारी व्यंजनों को सम्मिलित किया गया था, मानो उत्तरप्रदेश पूरी तरह शाकाहारी हो। एक अन्य घटनाक्रम में 14 मुसलमानों को केवल इसलिए नजरबंद कर दिया गया क्योंकि वे गंगा नदी में नौका विहार करते हुए रोजा अफ्तार के दौरान चिकन बिरयानी खा रहे थे। इस घटना का एक दिलचस्प पहलू यह है कि उसी समय वहां नौका विहार कर रहे उन हिन्दुओं के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई जो शराब पी रहे थे। यह है भाजपा सरकारों के हाल।

यह जानते हुए भी कि लगभग 70 प्रतिशत भारतीय मांसाहारी हैं, भाजपा सरकारों द्वारा शाकाहार को बढ़ावा दिया जा रहा है। यह अभियान कई स्थानों पर सफल भी हुआ है। गुजरात में, जहां पिछले तीन दशकों से भाजपा की सरकार है, मांसाहारी व्यंजन बेचने वाली दुकानें और रेस्टोरेंट लगभग गायब हो गए हैं। कई लोग गुजरात की सीमा के बाहर के निकटवर्ती स्थानों पर जाकर मांसाहार की अपनी इच्छा पूरी करते हैं।

भाजपा की दुविधा यह है कि वह भारतीयों की प्रचलित खानपान की आदतों और अपने शाकाहार लादने के एजेंडे के बीच संतुलन कैसे कायम करे। हर संभव अवसर पर वह और उसके सहयोगी संगठन शाकाहार को बढ़ावा देने की कोशिश करते हैं। किसी वजह से भाजपा मांसाहार को मुसलमानों से जोड़ती है। जबकि मांसाहार धर्म की सीमाओं के परे भारतीयों की खानपान की आदतों का अभिन्न अंग है। गुजरात जैसी जगहों पर तो उसका यह आक्रामक शाकाहारवाद चल जाता है, लेकिन पश्चिम बंगाल में उसे कड़े विरोध का सामना करना पड़ रहा है। शास्त्री और उनके जैसे अन्य बाबा, जो पिछले कुछ दशकों में बड़ी संख्या में ऊग आए हैं, भी आरएसएस-भाजपा की इस राजनीति के झंडाबरदार बने हुए हैं।

शास्त्री इसी दिशा में प्रयासरत थे और उनकी कोशिश एक विशिष्ट प्रकार की खानपान की आदतों को बढ़ावा देने की थी। मानव समाज विभिन्न चरणों में विकसित हुआ है और खानपान की आदतें अत्यंत विविधतापूर्ण रही हैं। भाजपा-आरएसएस और उनके राजनैतिक-सांस्कृतिक समर्थकों का शाकाहार का महिमामंडन करना विचाधारात्मक वजहों से है। वीगनवाद या शाकाहार को बढ़ावा देने की अन्य वजहें भी हो सकती हैं, किंतु लोगों की खानपान की आदतों का सम्मान करना एक लोकतांत्रिक समाज का अभिन्न अंग होना चाहिए। इस बाबा को मांसाहार पर प्रतिबंध लगाने की वकालत करने के लिए आलोचना का सामना करना पड़ रहा है। हो सकता है कि भाजपा कुछ अन्य तरीके अपनाकर अपने शाकाहारवाद पर टिके रहने की कोशिश करे जो 'मुसलमानों से नफरतÓ के उसके एजेंडे को आगे बढ़ाने में मददगार हो!

(अंग्रेजी से रूपांतरण अमरीश हरदेनिया)


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