पेड़ लगाना पानी को बचाना भी है
पेड़ों के आसपास की मिट्टी में कई तरह के जंतु होते हैं। कीड़े-मकोड़ों का भी वास होता है।

पेड़ों के आसपास की मिट्टी में कई तरह के जंतु होते हैं। कीड़े-मकोड़ों का भी वास होता है। इन पेड़ों के आसपास कुकुरमुत्ते (मशरूम) भी उगते हैं। इनमें से कई बहुत ही स्वादिष्ट होते हैं। ये कई आकारों व रंग के होते हैं। इन सबका आश्रयस्थल पेड़ों के आसपास ही होता है।
पेड़ ही पानी है। मध्य भारत की ज्यादातर नदियां जंगल और पहाड़ से उद्गमित होकर बहती हैं। पेड़ पानी का ही एक रूप है। अगर हमें नदियों को, जलस्रोत को बचाना है तो हमें पेड़ों को भी बचाना होगा। आज इस स्तंभ में पेड़ों के बारे में ही बात करना चाहूंगा, जिससे पेड़ों के साथ पर्यावरण व परिवेश के बारे में समझा जा सके।
मुझे याद आ रही है, मेरी उत्तराखंड की यात्रा, जहां मैंने टिहरी गढ़वाल जिले के एक गांव का जंगल देखा था। यह सामाजिक कार्यकर्ता विजय जड़धारी का गांव है, जो चिपको आंदोलन से भी जुड़े रहे हैं, उन्होंने उनके गांव जड़धार में उजड़े जंगल को घने जंगल में बदल दिया है। इस काम में उन्हें गांव को पूरा सहयोग मिला है। इससे वहां के सूख चुके जलस्रोत भी फिर से पानीदार हो गए हैं। उनके गांव में गया हूं, उनके साथ इस जंगल में घूमा हूं।
विजय जड़धारी बताते हैं कि टिहरी-गढ़वाल की चंबा-मसूरी पट्टी में पहले अच्छा और सुंदर जंगल था। इस गांव में भी था।पहाड़ के ढलानों से हरियाली की चादर हटने से बाढ़ और भूस्खलन का खतरा बना रहता था। शायदआज हरियाली की चादर हटने से भी बाढ़ जैसी आपदाएं आ रही हैं।
वे आगे बताते हैं कि जड़धार गांव के लोगों ने मिलकर तय किया कि जंगल को बचाया जाए। इसके लिए एक वन सुरक्षा समिति बनाई गई। जंगल से किसी भी तरह के हरे पेड़, ठूंठ, यहां तक कि कंटीली हरी झाड़ियों को काटने पर रोक लगाई गई। कोई भी व्यक्ति यदि अवैध रूप से हरी टहनी या झाड़ी काटता है तो उस पर जुर्माना लगाया जाएगा, ऐसा तय किया गया।
इससे कुछ ही समय में सूखे पानी के जलस्रोत फिर फूट पड़े, सदानीरा हो गए। ये सदाबहार जलस्रोतों से ही साल भर गांवों को पीने का पानी मिलता है। चौड़ी पत्ती के जंगल बारिश के पानी का स्पंज हैं। वे पानी को सोखकर रखते हैं। जहां ऐसे जंगल होते हैं वहां जलस्रोत सदानीरा होते
चिपको आंदोलन के प्रेरणास्रोत सुंदरलाल बहुगुणा वृक्ष खेती की बात करते थे। वे कहते थे कि हमारी अरण्य संस्कृति है, जहां ऋषि मुनि भी जंगल से कंद मूल फल खाकर रहते थे। इन दिनों वृक्ष खेती का भी प्रचलन बढ़ रहा है।
कुछ समय पहले मैं महाराष्ट्र के अमरावती जिले के रवाला गांव गया था। वहां गांधीवादी सामाजिक कार्यकर्ता बसंत फुटाणे ने वृक्ष खेती का काफी अच्छा प्रयोग किया है। उनके खेत में संतरा के 500 पेड़ हैं। इसके अलावा, आंवला, रीठा, बेर, भिलावा, महुआ, दक्खन इमली, इमली, तेंदू, अगस्त, अमलतास, मुनगा, कचनार, चीकू, अमरूद, जामुन, सीताफल, करौंदा, पपीता, बेल, कैथ, इमली, रोहन, नींबू, नीम इत्यादि के फलदार व छायादार पेड़ हैं। वृक्ष खेती के तो और भी कई प्रयोग हैं।
हमारे नर्मदापुरम ( होशंगाबाद ) में भी प्राकृतिक खेती का एक प्रयोग हुआ है, मैं उसे देखने गया था। यह किसान खेत में हल नहीं चलाते थे, और जमीन के अंदर प्राकृतिक रूप से मौजूद कीड़े मकोड़े, जीव जंतुओं की दुनिया है, उसका इस्तेमाल खेती में करते थे।
वे केंचुआ, सूक्ष्म जीवाणु, जो अच्छी फसल के आवश्यक हैं, उसे बचाने का प्रयास करते थे। मिट्टी की गोलियां बनाकर खेत में फेंकते थे, और फसल उगाते थे।
पेड़ों का महत्व सर्वविदित है। उनका स्वभाव देने का है। फल, फूल, पत्तियां, छाया तो देते ही हैं। मशहूर लेखक शेल सिल्वरस्टाइन की किताब गिविंग ट्री है, जिसकी हिन्दी में प्रस्तुति अरविंद गुप्ता ने की है। यह पुस्तिका बहुत ही प्रेरणादायक है। इसमें पेड़ जीवन भर क्या देता है, इसकी कहानी है।
इसमें एक पेड़ की कहानी है। एक लड़का पेड़ के पास रोज आता था। पेड़ भी उसे प्यार करता था। पेड़ के पत्ते एकत्र करता था। वह उनकी माला बनाता था। उसके तने पर चढ़ता है, टहनियों पर झूलता था। लुका-छिपी का खेल खेलता था। जब वह थक जाता था तब पेड़ की छांव में सो जाता था।
इस सबसे पेड़ भी बहुत खुश था। इस तरह समय बीतता गया। लड़का बड़ा हो गया। पेड़ अपने आप को अकेला महसूस करने लगा। एक दिन वही लड़का आया। उसने पेड़ से कहा मुझे कुछ पैसे चाहिए, तो उसने कहा मेरे फल तोड़ लो और शहर में बेच दो, तुम्हे पैसे मिल जाएंगे। लड़के ने ऐसा ही किया। कुछ दिन बाद उसे अपने परिवार के लिए घऱ की जरूरत हुई. वह फिर पेड़ के पास आया। मेरे पास घर नहीं है। पेड़ ने कहा, मेरी शाखें काट लो और घऱ बना लो। लड़का कई दिनों बाद तक नहीं आया। जब आया तब पेड़ के पास तना और ठूंठ ही बचा था, पेड़ ने कहा इस पर बैठो और आराम करो। यानी वह दानी पेड़, हमेशा ही कुछ देता रहता है।
पेड़ औषधियों के काम आते हैं। नीम इनमें से एक है। नीम बहुत ही उपयोगी पेड़ है। गांवों में चोट लगने पर इसका लेप लगाया जाता है। नीम की दातौन तो करते ही हैं। बीमारियों से बचने के लिए भी इसकी पत्तियों को चबाया जाता है। मेरे पिताजी प्राय: इसकी कोमल पत्तियों को चबाया करते थे, कहते थे इससे बीमारियों से बचाव होता है।
इसकी पत्तियों को अनाज के साथ मिलाकर रखा जाता था,माना जाता है कि इससे कीटों से बचाव होता है। पक्षी भी इसकी निबौलियों को चाव से खाते हैं। इसी प्रकार, आम तो फल देता ही है, बहुत घनी छाया भी देता है। बबूल भी काफी उपयोगी है। इसकी पत्तियां बकरियां खाती हैं।
पेड़ों के आसपास की मिट्टी में कई तरह के जंतु होते हैं। कीड़े-मकोड़ों का भी वास होता है। इन पेड़ों के आसपास कुकुरमुत्ते (मशरूम) भी उगते हैं। इनमें से कई बहुत ही स्वादिष्ट होते हैं। ये कई आकारों व रंग के होते हैं। इन सबका आश्रयस्थल पेड़ों के आसपास ही होता है।
कुल मिलाकर, पेड़ों से साफ हवा मिलती है, फल, फूल और पत्ते मिलते हैं और हरियाली होतीहै। जलवायु बदलाव के दौर में पेड़ों व हरियाली से वायुमंडल में गीन हाउस गैस सोखने की क्षमता बढ़ती है। यह जलवायु बदलाव कम करने का तरीका है। जैविक खेती में ग्रीन हाउस गैस का उत्सर्जन है ही नहीं, दूसरी ओर मिट्टी बेहतर होती है। जलवायु बदलाव के दौर में अधिक विकट व अचानक बदलाव वाले मौसम का सामना करने की क्षमता इसमें होती है। यानी पेड़ लगाना, जल संरक्षण, हरियाली बढ़ाने और नए फलदार पेड़ लगाने का काम बहुत महत्वपूर्ण व उपयोगी है। हमें अगर नदियां भी बचाना है तो पेड़ लगाना ही उपयोगी है।


