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हवाई चप्पल वाले विमान में या हवाई सेवाएं जमीन पर!

हैरानी की बात नहीं है कि हमारे उद्घाटन-वीर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने, पांच विधानसभाई चुनावों के लिए अपने प्रचार के औपचारिक चरण के लिए दिल्ली से रवाना होने से ठीक पहले, एक धमाकेदार उद्घाटन करना जरूरी समझा

हवाई चप्पल वाले विमान में या हवाई सेवाएं जमीन पर!
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  • राजेंद्र शर्मा

बुनियादी सुविधाओं के मामले में आर्थिक सामर्थ्य के इस संकट का, मांग का संकट बनकर इस तरह सामने आ खड़ा होना, खासतौर पर नव-उदारवादी आर्थिक व्यवस्था के अपनाए जाने का नतीजा है। जब तक बुनियादी सुविधाएं मुख्यत: सार्वजनिक क्षेत्र में थीं, तब तक चूंकि उन्हें आर्थिक लाभ कमाने की दृष्टि से संचालित नहीं किया जाता था, इन सुविधाओं की आपूर्ति की तंगी तो हो सकती थी, लेकिन उनके मांग की कमी की वजह से अनुपयोगी रह जाने का संकट नहीं हो सकता था।

हैरानी की बात नहीं है कि हमारे उद्घाटन-वीर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने, पांच विधानसभाई चुनावों के लिए अपने प्रचार के औपचारिक चरण के लिए दिल्ली से रवाना होने से ठीक पहले, एक धमाकेदार उद्घाटन करना जरूरी समझा। हम राजधानी दिल्ली से सटे नोएडा में निर्माणाधीन नये हवाई अड्डे के पहले चरण के उद्घाटन की बात कर रहे हैं। कहने की जरूरत नहीं है कि प्रधानमंत्री ने इस हवाई अड्डे के निर्माण को अपने राज में तेजी से हो रही प्रगति के साक्ष्य के रूप में ही पेश नहीं किया, देश के लिए जरूरी विकास के मॉडल के तौर पर भी पेश किया, जो उनकी पार्टी के डबल इंजन राज की ही कृपा से उत्तर प्रदेश को नसीब हो रहा है। यहां ढांचागत क्षेत्र के विकास के इस मॉडल की जरा नजदीक से पड़ताल करना अप्रासांगिक नहीं होगा, जिसे बहुत से विश्लेषणकर्ता नुमाइशी (वेनिटी) विकास मॉडल मानते हैं।

स्वाभाविक रूप से शनिवार 28 मार्च के जेवर एअरपोर्ट के उद्घाटन की खबरों ने राजधानी में और खासतौर पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में काफी सुर्खियां बटोरीं। आखिरकार, राजधानी से दिल्ली के वर्तमान अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से कुछ ही 12 किलोमीटर की दूरी पर यह नया हवाई अड्डा बन रहा है, जिसे न सिर्फ पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिलों के लिए हवाई यात्रा की सुगमता करने वाला बताया जा रहा था, बल्कि खबरों में तो 'देश का सबसे बड़ा हवाई अड्डा' कहकर भी प्रचारित किया जा रहा था। यह दूसरी बात है कि छोटे पिं्रट में दी जा रही जानकारियां, एक तरह से हाथ के हाथ इस दावे की अतिरंजना को भी उजागर कर रही थीं। सच्चाई यह है कि प्रधानमंत्री ने इस हवाई अड्डे के निर्माण के पहले चरण का ही उद्घाटन किया है, जिसमें कार्गो टर्मिनल तथा मरम्मत, रख-रखाव आदि से संबंधित हिस्से ही शामिल हैं। इस चरण पर करीब 11,200 करोड़ रुपए की लागत आई है। इस हवाई अड्डे का निर्माण चार चरणों में, 2040 तक पूरा होना है। फिलहाल, कुछ घरेलू उड़ानों के शुरू होने की चर्चा जरूर है, लेकिन उसकी भी कोई निश्चित तारीख तय नहीं की गयी है। हैरानी की बात नहीं होगी कि उत्तर प्रदेश के अगले विधानसभाई चुनाव से पहलेे, प्रधानमंत्री एक बार फिर इस हवाई अड्डे के किसी हिस्से का उद्घाटन करने के लिए यहां लौटें।

जहां तक संबंधित परियोजना का सवाल है, प्रधानमंत्री ने कहा कि यह एक ढांचागत परियोजना ही नहीं है बल्कि 'विकसित भारत-विकसित उत्तर प्रदेश अभियान का नया अध्याय है। यह एअरपोर्ट उत्तर भारत के लिए लॉजिस्टिक गेटवे बनकर निवेश, व्यापार और निर्यात को नयी गति देगा।...पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लिए विकास का नया द्वार खोलेगा', आदि। इतना ही नहीं, प्रधानमंत्री ने यह दावा भी किया कि इससे, 'किसानों, छोटे और लघु उद्योगों और युवाओं को व्यापक अवसर प्राप्त होंगे।' प्रधानमंत्री ने इस परियोजना के साकार होने के लिए किसानों के 'जमीन के योगदान' के लिए आभार ही व्यक्त नहीं किया, किसानों को यह सपना भी दिखाया कि उनके कृषि उत्पाद अब वैश्विक बाजारों तक पहुंचसकेंगे! प्रधानमंत्री ने यह दावा भी किया कि यह एअरपोर्ट पश्चिमी उत्तर प्रदेश के युवाओं को रोजगार और अवसरों की नयी दिशा देगा। लेकिन कैसे, यह स्पष्ट करने की उन्होंने जरूरत नहीं समझी।

प्रधानमंत्री इस मौके पर गिनती को तर्क बनाने का खेल नहीं खेलते यह तो संभव ही नहीं था। प्रधानमंत्री ने इसे अपने राज में उत्तर प्रदेश के तेजी से विकास कर रहे होने का पैमाना बनाया कि उत्तर प्रदेश अब पांच अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों वाला देश का पहला राज्य बन गया है। और यह भी कि मोदी के शासन संभालने से पहले, देश में कुल 74 हवाई अड्डे थे, जबकि अब तक यह संख्या बढ़कर 160 से अधिक हो चुकी है। हवाई अड्डों की संख्या और विकास के इसी समीकरण को और पुख्ता करते हुए, 28 मार्च के उद्घाटन ईवेंट से ठीक पहले, 25 मार्च को प्रधानमंत्री मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक ने क्षेत्रीय कनेक्टिविटी के लिए संशोधित उड़ान योजना को मंजूरी दी थी, जिसमें दस वर्ष में 100 हवाई अड्डे बनाने का ऐलान किया गया है। इस योजना के लिए 28,840 करोड़ रुपए के निवेश का लक्ष्य रखा गया है। अगर हवाई अड्डे बनना ही विकास का पैमाना है, तो जाहिर है कि मोदी राज में देश का बहुत तेजी से विकास हो रहा है।

लेकिन, यहीं उत्तर प्रदेश का ही एक और आंकड़ा सामने आकर खड़ा हो जाता है, जिसकी प्रधानमंत्री मोदी के हवाई क्षेत्र के विकास के दावों के जवाब में, समाजवादी पार्टी नेता, अखिलेश यादव ने याद दिलाई है। यह आंकड़ा जो वास्तव में एक आरटीआई के सरकारी जवाब में सामने आया है, यह दर्शाता है कि हवाई कनेक्टिविटी का विस्तार कर, अपेक्षाकृत कम आबादी के केंद्रों को उसके दायरे में लाने के इरादे से, पिछले पांच-छ: साल में उत्तर प्रदेश में हजारों करोड़ रुपए खर्च कर, 7 नये हवाई अड्डे शुरू किए गए थे। लेकिन, इनमें से पूरे 6 हवाई अड्डे बंद हो चुके हैं, जहां से नियमित रूप से कोई हवाई सेवा काम ही नहीं कर रही है। इनमें आजमगढ़, अलीगढ़, मुरादाबाद, आगरा, कुशीनगर, चित्रकूट आदि के हवाई अड्डे शामिल हैं। कहने की जरूरत नहीं है कि सैकड़ों करोड़ रुपए की लागत से और कीमती जमीन लगाकर बनाए गए हवाई अड्डे अगर हवाई यातायात का ही काम नहीं कर रहे हैं, तो उन्हें फिजूलखर्ची की निशानी भले माना जा सके, विकास की निशानी तो किसी भी तरह नहीं माना जा सकता है।

यह सिर्फ उत्तर प्रदेश की ही समस्या नहीं है। कम या ज्यादा, खासतौर पर पूरे ढांचागत क्षेत्र के विकास की यही समस्या है। चूंकि आम तौर पर यह माना जाता है कि ढांचागत सुविधाएं जितनी ज्यादा हों उतना ही बेहतर है, जोकि ऐसे विकासशील देश में स्वाभाविक भी है, जहां सुविधाओं की हमेशा तंगी रही है, यह समीकरण ढांचागत क्षेत्र में निवेश को आसानी से विकास का पर्याय बना देता है। लेकिन, इसमें यह भुला ही दिया जाता है कि हमारे समाज में इन सुविधाओं के उपयोग की सामर्थ्य कितनी है? उपयोग की समुचित सामर्थ्य के बिना बुनियादी सुविधाएं खड़ी की जाती हैं, तो उनका वही हश्र होता है जो उत्तर प्रदेश के उक्त नये हवाई अड्डों का हो रहा है। सिर्फ प्रधानमंत्री के यह कहने से कि वह 'हवाई चप्पल वालों को हवाई यात्रा करते देखना चाहते हैं', हवाई चप्पल वाले हवाई यात्रा नहीं करने लग जाएंगे। उल्टे ऐसे बुनियादी ढांचागत निर्माण सफेद हाथी ही साबित होते हैं, जिनका उपयोग तो कुछ नहीं है, बस जिनके रख-रखाव पर लगातार खर्चा और करना पड़ता है।

बेशक, बुनियादी सुविधाओं के मामले में आर्थिक सामर्थ्य के इस संकट का, मांग का संकट बनकर इस तरह सामने आ खड़ा होना, खासतौर पर नव-उदारवादी आर्थिक व्यवस्था के अपनाए जाने का नतीजा है। जब तक बुनियादी सुविधाएं मुख्यत: सार्वजनिक क्षेत्र में थीं, तब तक चूंकि उन्हें आर्थिक लाभ कमाने की दृष्टि से संचालित नहीं किया जाता था, इन सुविधाओं की आपूर्ति की तंगी तो हो सकती थी, लेकिन उनके मांग की कमी की वजह से अनुपयोगी रह जाने का संकट नहीं हो सकता था। लेकिन, अब जबकि बुनियादी सुविधाओं का ज्यादा से ज्यादा निजीकरण होता जा रहा है, मांग की तंगी से इन सुविधाओं के खाली पड़े रहने का संकट इतना आम हो चुका है कि उसकी तरफ ध्यान तक नहीं जाता है। सरकारी अस्पतालों में भारी भीड़ और निजी अस्पतालों में बैडों की बड़ी संख्या का किसी भी समय खाली पड़े होना, इसी का एक उदाहरण है। एक और इससे भी ताजा उदाहरण मोदी राज में शुरू की गयी नयी वंदे भारत आदि फैंसी ट्रेनों में बढ़ती संख्या में सीटें खाली जाना और साधारण ट्रेनों में भारी भीड़ें रहना है।

यहीं से हम विकास के नुमाइशी मॉडल पर आ सकते हैं। नव-उदारवादी आर्थिक व्यवस्था के तीन दशक के बाद और खासतौर पर नरेंद्र मोदी के राज में, विकास की परिकल्पना से ही जिस तरह से आम जनता को यानी अपनी मेहनत की रोटी खाने वालों को बाहर कर दिया गया है, उसका नतीजा यह है कि जनता का जीवन सुगम बनाने में सीधे निवेश के अर्थ में विकास की जिम्मेदारी से, शासन ने छुट्टी ही प्राप्त कर ली है। ऐसे में विकास का मुख्य अर्थ तो, पूंजीपतियों द्वारा निवेश और शासन का इसके लिए उन्हें ज्यादा से ज्यादा सार्वजनिक संसाधन थमाना ही रह गया है। फिर भी चूंकि कारपोरेट अब भी पूरी उत्पादक अर्थव्यवस्था संभालने की स्थिति में नहीं हैं, शासन द्वारा बढ़ते पैमाने पर अपने संसाधनों का बुनियादी क्षेत्र में लगाया जाना भी इसका जरूरी हिस्सा है, क्योंकि इससे फौरी तौर पर मेहनतकशों की एक बड़ी संख्या को रोजगार मिलता है और धीरे-धीरे इन सार्वजनिक सुविधाओं को बनाकर निजी क्षेत्रों के हवाले किया जा रहा होता है।

इसी की अगली विकृति, नुमाइशी परियोजनाओं के रूप में सामने आती है, जहां विकास का प्रतीक और वास्तव में झूठी प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाकर, ऐसी बुनियादी ढांचागत परियोजनाओं को थोपा जाता है, जिनका न सिर्फ आम लोगों के लिए कोई उपयोग नहीं होता है बल्कि जिनके लिए आम लोगों को, सीधे अपने हित के लिए उपलब्ध संसाधनों में कटौती के रूप में, असह्य कीमत भी चुकानी पड़ती है। नरेंद्र मोदी की बुलेट ट्रेन परियोजना, इस तरह की अकेली परियोजना नहीं है। विमानन से लेकर रेलवे तथा सड़क तक, मोदी राज की ज्यादा से ज्यादा बुनियादी सेवा विस्तार परियोजनाएं और शहरी क्षेत्र सुधार योजनाएं भी, ज्यादा से ज्यादा ऐसी नुमाइशी परियोजनाएं ही बनती जा रही हैं। यह विकास का ही अभिजातकरण है।

(लेखक साप्ताहिक पत्रिका लोक लहर के संपादक हैं।)


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