पद्म विभूषण, धर्मेंद्र और कानून-सम्मान के मंच पर परंपरा बनाम वैधता का प्रश्न
धर्मेंद्र का जीवन और योगदान निर्विवाद रूप से असाधारण रहा है। हिंदी सिनेमा में उनका छह दशकों का सफर एक युग की तरह देखा जाता है।

- अरुण कुमार डनायक
धर्मेंद्र का जीवन और योगदान निर्विवाद रूप से असाधारण रहा है। हिंदी सिनेमा में उनका छह दशकों का सफर एक युग की तरह देखा जाता है। शोले, मेरा गांव मेरा देश, चरस जैसी फिल्मों ने उन्हें भारतीय सिनेमा का अमर चेहरा बनाया। 24 नवंबर 2025 को 89 वर्ष की उम्र में उनके निधन के साथ यह युग समाप्त हुआ। सरकार ने उनके निधन के बाद उन्हें मरणोपरांत यह उच्च सम्मान देना फिल्म जगत के सम्मान के रूप में देखा जा सकता है।
25 मई 2026 को पद्म पुरस्कार के समारोह में जब धर्मेंद्र के लिए मरणोपरांत पद्म विभूषण की घोषणा हुई, तो स्वाभाविक रूप से वह क्षण भावनाओं से भरा था। मंच पर सम्मान ग्रहण करने पहुंचीं हेमा मालिनी को 'धर्मेंद्र की पत्नी' कहकर संबोधित किया गया। यह क्षण स्वाभाविक रूप से हृदयस्पर्शी था, लेकिन साथ ही उसने एक गंभीर प्रश्न भी खड़ा किया— क्या सार्वजनिक और संवैधानिक मंचों पर सामाजिक स्वीकृति, कानूनी वैधता से ऊपर रखी जा सकती है? या फिर हम अनजाने में उन परंपराओं की ओर लौट रहे हैं जिन्हें आधुनिक भारत ने दशकों पहले पीछे छोड़ दिया था। यह प्रश्न केवल औपचारिक संबोधन का नहीं, बल्कि कानून और सामाजिक व्यवहार के बीच के उस अंतर का है, जिसे हम अक्सर अनदेखा कर देते हैं।
धर्मेंद्र का जीवन और योगदान निर्विवाद रूप से असाधारण रहा है। हिंदी सिनेमा में उनका छह दशकों का सफर एक युग की तरह देखा जाता है। शोले, मेरा गांव मेरा देश, चरस जैसी फिल्मों ने उन्हें भारतीय सिनेमा का अमर चेहरा बनाया। 24 नवंबर 2025 को 89 वर्ष की उम्र में उनके निधन के साथ यह युग समाप्त हुआ। सरकार ने उनके निधन के बाद उन्हें मरणोपरांत यह उच्च सम्मान देना फिल्म जगत के सम्मान के रूप में देखा जा सकता है।
लेकिन सम्मान देने की प्रक्रिया में एक कानूनी-नैतिक प्रश्न अनिवार्य रूप से उभरता है। हिंदू विवाह अधिनियम (1955) ने हिंदू समाज में बहुपत्नी प्रथा को समाप्त कर एक विवाह को मान्य किया। पहली पत्नी के जीवित रहते बिना तलाक दूसरी शादी करना द्विविवाह का अपराध है, जिसके लिए सजा का प्रावधान है। हालांकि ऐसी अमान्य शादी से जन्मे बच्चों को सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के अनुसार पिता की संपत्ति में पूरा उत्तराधिकार प्राप्त है। धर्मेंद्र और प्रकाश कौर के बीच तलाक नहीं हुआ था। ऐसे में 1980 में हेमा मालिनी के साथ हुआ उनका विवाह, कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, विधिक दृष्टि से वैध नहीं माना जा सकता। कानूनी दृष्टि से यह विवाह विवादित माना जाता रहा है। कानून स्पष्ट है—पहली शादी के रहते दूसरी शादी करना अपराध है।
मीडिया में यह भी चर्चा रही कि धर्मेंद्र और हेमा ने कथित रूप से इस्लाम अपनाकर निकाह किया था, ताकि हिंदू कानून की बाधा से बचा जा सके। हालांकि धर्मेंद्र ने सार्वजनिक रूप से इसे हमेशा नकारा। 2004 के लोकसभा चुनाव में भाजपा प्रत्याक्षी के रूप में दाखिल हलफनामे में उन्होंने पत्नी के रूप में केवल प्रकाश कौर का नाम लिखा और हेमा मालिनी का कोई उल्लेख नहीं किया। विपक्ष ने आरोप लगाया कि उन्होंने दूसरी शादी छिपाई। यह विवाद अदालत तक पहुंचा और लंबे समय तक चर्चा में रहा।
यहीं से यह प्रश्न और जटिल हो जाता है—क्या किसी अमान्य विवाह को सार्वजनिक मंच पर वैध सामाजिक पहचान दी जा सकती है? और यदि दी जाती है, तो क्या यह कानून की भावना के विपरीत नहीं है? एक ओर संसद द्वारा पारित हिंदू विवाह अधिनियम है, जिसने बहुपत्नी प्रथा को समाप्त किया; दूसरी ओर राष्ट्रपति भवन का मंच है, जहां उसी कानून के विपरीत संबोधन किया जाता है।
ऐसे मामलों में यह प्रश्न उठता है कि क्या परिवार के सभी पक्षों को प्रक्रिया में शामिल किया गया था? यद्यपि यह निजी क्षेत्र का विषय है, लेकिन जब मामला राष्ट्रपति भवन के औपचारिक मंच तक पहुंचता है, तो यह केवल निजी नहीं रह जाता।
इतिहास बताता है कि ऐसे मामलों में राज्य ने कई बार विधिक वैधता को प्राथमिकता दी है। राष्ट्रपति द्वारा सरकार की सलाह पर पूर्व इन्दौर रियासत के उत्तराधिकार विवाद में अमेरिकी पत्नी से जन्मे बेटे रिचर्ड होल्कर (शिवाजीराव होल्कर) को उत्तराधिकारी मानने से इनकार कर दिया गया था। अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के दौरान विनायक दामोदर सावरकर को भारत रत्न देने के प्रस्ताव पर तत्कालीन राष्ट्रपति केआर नारायणन द्वारा आपत्ति जताई गई थी—यह दिखाता है कि संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों ने समय-समय पर संस्थागत मर्यादाओं की रक्षा की है।
इसी संदर्भ में यह प्रश्न और तीखा हो जाता है कि जब देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर एक महिला राष्ट्रपति आसीन हैं, तब महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए बनाए गए कानूनों की इस प्रकार की अनदेखी क्या एक विरोधाभास नहीं है?
यह मुद्दा उस व्यापक सामाजिक मनोविज्ञान को उजागर करता है, जहां हम कानून को स्वीकार तो करते हैं, लेकिन व्यवहार में परंपरागत मान्यताओं से संचालित होते रहते हैं।
यहां हेमा मालिनी, और सनी देओल के राजनीतिक जीवन का संदर्भ भी दिलचस्प है। जहां पिता, पुत्र का राजनीतिक सफर अपेक्षाकृत सीमित रहा, वहीं हेमा मालिनी का सार्वजनिक जीवन अधिक लंबा और स्थिर रहा है। इससे यह भी संकेत मिलता है कि सामाजिक स्वीकृति और राजनीतिक पहचान, कानूनी जटिलताओं के बावजूद, अपने रास्ते बना लेती है।
लेकिन यही वह बिंदु है जहां लोकतांत्रिक व्यवस्था को अधिक सजग होने की आवश्यकता है। क्योंकि यदि राज्य के औपचारिक मंचों पर भी कानून और सामाजिक सुविधा के बीच अंतर धुंधला होने लगे, तो यह एक खतरनाक मिसाल बन सकता है।
यह विरोधाभास उस ऐतिहासिक संघर्ष की याद दिलाता है जो बहुपत्नी परंपरा और आधुनिक भारत के संवैधानिक मूल्यों के बीच चला। हिन्दू स्मृतियों में पुरुषों को अनेक पत्नियां रखने की अनुमति थी। लेकिन स्वतंत्र भारत में डॉ. भीमराव आंबेडकर और जवाहरलाल नेहरू ने हिंदू स्त्रियों के अधिकारों को मजबूत करने के लिए हिंदू कोड बिल लाये । इसका जबरदस्त विरोध हुआ—रूढ़िवादी कांग्रेस नेता, दक्षिणपंथी संगठन, भारतीय जनसंघ और हिन्दुमहासभा, साधु संत—सभी इसके खिलाफ खड़े हो गए। यहां तक कि राष्ट्रपति डाक्टर राजेन्द्र प्रसाद ने इस पर हस्ताक्षर करने से मना कर दिया था। बिल पास होता न देख डाक्टर आम्बेडकर ने मंत्रिमंडल से त्यागपत्र दे दिया था। अंतत: 1955-56 में इसे कई हिस्सों में बांटकर पारित किया गया।
यह प्रसंग उन परंपरागत मानसिकताओं की झलक अवश्य देता है, जिन्हें आधुनिक कानून पीछे छोड़ने का प्रयास करता है। यह घटना उस मानसिकता की झलक देती है, जहां पुरुष-केंद्रित सामाजिक मान्यताएं अब भी विधिक सिद्धांतों पर हावी होती दिखती हैं।
अंतत:, यह घटना हमें एक असुविधाजनक लेकिन आवश्यक प्रश्न के सामने खड़ा करती है—
क्या हम कानून को केवल एक औपचारिक व्यवस्था मानते हैं, या उसे अपने सार्वजनिक आचरण का वास्तविक आधार भी बनाते हैं? यह प्रसंग हमें यह याद दिलाता है कि भारत में कानून और सामाजिक स्वीकृति के बीच की दूरी अब भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है—और जब यह दूरी राज्य के औपचारिक मंचों पर दिखने लगे, तो उस पर गंभीर विचार आवश्यक हो जाता है।
(लेखक एवं समाजसेवी )


