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साइकिल की सवारी में बेहतरी हमारी

गांव में स्थित स्वयंसेवी संस्था के कार्यकर्ता साइकिल से चलते थे। संस्था की ओर से सचल पुस्तकालय (मोबाइल लाइब्रेरी) संचालित किया जाता था।

साइकिल की सवारी में बेहतरी हमारी
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  • बाबा मायाराम

गांव में स्थित स्वयंसेवी संस्था के कार्यकर्ता साइकिल से चलते थे। संस्था की ओर से सचल पुस्तकालय (मोबाइल लाइब्रेरी) संचालित किया जाता था। यह हमारे लिए अनोखा था। इसमें कार्यकर्ता की साइकिल में टंगे दो झोले होते थे, उनमें किताबें भरी होती थीं। गांवों की चौपालों पर किताबें फैला दी जाती थीं,और फिर गांव के बच्चे, वयस्क और बड़े किताबें उलटते पलटते थे, और पढ़ने के लिए किताबें ले जाते थे।

वैश्विक स्तर पर तेल के संकट को देखते हुए साइकिल की सवारी ही सबसे बेहतर है। यह न केवल हमें तेल संकट से बचाती है, बल्कि प्रदूषण से भी निजात दिलाती है। स्वास्थ्य की दृष्टि से भी बेहतर है और दुर्घटनाओं से भी बचाती है। जून के पहले सप्ताह में विश्व साइकिल दिवस भी है। आज इस कॉलम में इस पर ही बात करना चाहूंगा, जिससे हम आत्मनिर्भर होने की दिशा में आगे बढ़ सकें।

अगर मैं बचपन को याद करूं तो उस समय मोटर साइकिल और कार बहुत कम थीं। अधिकांश लोग पैदल और बैलगाड़ी से चलते थे। कुछ लोगों के पास ही साइकिल हुआ करती थी। साइकिल दुकानों से किराये पर मिलती थीं। प्रति घंटे के हिसाब से किराया लिया जाता था।

साइकिल दुकानों पर मरम्मत करवाने वालों की भीड़ लगी रहती थी। हमारे घर भी हरक्यूलिस साइकिल थी, यह पुरानी थी, जिसे मेरे पिताजी ने उनके किसी मित्र से खरीदा था। मैंने भी उसी साइकिल से चलाना सीखा।

उस दौर में सड़कों पर साइकिलें दिखा करती थीं। किसान, अपना अनाज बाजार ले जाकर बेचते थे, पशुपालक घास का गट्टर ले जाते थे। दूध वाले, सब्जी वाले, लाते ले जाते थे, बेचते थे। दूरदराज के गांवों में शहर में रहने वाले शिक्षक भी साइकिल से स्कूल जाते थे।

सरकारी बसें चलती थीं, पर दिन में एक दो ही बार। वह भी बहुत लेट होती थीं। अगर कहीं जाना होता था, तो कई-कई घंटे बस के इंतजार में बैठना पड़ता था। बसों से आने-जाने वाले यात्रियों को देखकर कौतूहल होता था। गांवों में वैसी भी जीवन की गति धीमी होती है, ऐसे में कोई भी नया व्यक्ति बस से आता था तो उसकी चर्चा होती थी।

साप्ताहिक बाजार, जो हमारे पास के कस्बे में शुक्रवार को लगता था, उस दिन सड़कों पर गठरियां लेकर चलने वाले लोगों को देखना अच्छा लगता था। रंग-बिरंगे कपड़ों में कतारबद्ध रैला चलता रहता था। बैलगाड़ियों की चूं चर्र... की आवाजें सुनाई पड़ती थीं। मेहमानी व रिश्तेदारी में लोग पैदल आया जाया करते थे। शादी-विवाह या बारातों में बैलगाड़ी का उपयोग किया जाता था। साइकिल व बैलगाड़ी, नदी या कुओं से पानी भरने के काम भी आती थीं।

हमारे गांव में स्थित स्वयंसेवी संस्था के कार्यकर्ता साइकिल से चलते थे। संस्था की ओर से सचल पुस्तकालय (मोबाइल लाइब्रेरी) संचालित किया जाता था। यह हमारे लिए अनोखा था। इसमें कार्यकर्ता की साइकिल में टंगे दो झोले होते थे, उनमें किताबें भरी होती थीं। गांवों की चौपालों पर किताबें फैला दी जाती थीं, और फिर गांव के बच्चे, वयस्क और बड़े किताबें उलटते पलटते थे, और पढ़ने के लिए किताबें ले जाते थे। मेरे लिए भी किताबों की दुनिया यहीं खुली थी।

दूध वाले, गांव से दूध एकत्र कर शहर ले जाते थे। वे घर-घर से दूध इक_ा करते थे, और फिर साइकिल से नजदीकी रेलवे स्टेशन जाते थे, वहां से ट्रेन से बड़े शहर दूध बेचने जाते थे। और शाम को वापस उसी ट्रेन से वापस आ जाते थे।

स्कूली विद्यार्थी भी हाईस्कूल की कक्षाओं में पढ़ने के लिए साइकिल से जाते थे। साइकिल की दुकानें ज्यादा नहीं थीं, इसलिए घरों में ही साइकिल मरम्मत का सामान हुआ करता था। हवा भरने के लिए पंप, पिचिंस, पाना इत्यादि। अगर जब कभी साइकिल पंचर हो जाती थी, तो घर पर ही पंचर बना लेते थे। अक्सर हमें स्कूल जाते समय ही पता चलता था कि साइकिल पंचर है, तो जल्दी-जल्दी पंचर बनाते थे।

आजकल सरकार स्कूली बच्चों के लिए निशुल्क साइकिल वितरण करती है। यह बहुत ही अच्छी योजना है। यह कई राज्यों में है। जब भी स्कूली बच्चों को साइकिल चलाते देखते हैं, तो एक अलग ही तरह का सुखद एहसास होता है। ऐसे दृश्य हमें रोमांचित करते हैं।

विशेषकर, यह लड़कियों के लिए तो आजादी की प्रतीक है। उनके लिए आने-जाने के लिए यह बहुत ही सुविधाजनक है। 90 के दशक में साक्षरता अभियान के दौरान साइकिल से पढ़ने-पढ़ाने का सिलसिला काफी चल रहा था। हमारे गांव में स्वैच्छिक संस्था के कार्यकर्ता रात्रिकालीन शालाएं लगाते थे। बिना पढ़े-लिखे लोगों को पढ़ाने आते थे, वह भी साइकिल से आते थे।

शुक्रवार के दिन इसी संस्था की एक महिला डॉक्टर साइकिल से गांव आती थीं और एक ग्रामीण के आंगन में बैठकर गांव के लोगों की छोटी-मोटी बीमारियों का इलाज करती थीं। इस कार्यक्रम का नाम जरूरी दवाई सुविधा रखा गया था। गांव में किसी महिला को साइकिल चलाते देखना कौतूहल जगाता था। क्योंकि एक तो लोग उस समय साइकिल ही कम चलाते थे, और महिलाएं तो बिलकुल भी साइकिल नहीं चलाती थीं।

डाकिया और पेपर बांटने वाला तो रोज ही साइकिल से आते हंै, जिनका सभी को इंतजार रहता है। इनकी पहचान ही साइकिल से होती है। डाकिया, तो दूर-दराज के गांवों में साइकिल से आता जाता था। हमारे गांव में कस्बे से वही डाक लाता था। मुझे याद है, जब मैं गांव में था, डाकिया के साइकिल की घंटी से ही मैं समझ जाता था कि डाकिया आया है, कौतूहल से भर जाता था। अगर कोई पोस्टकार्ड आता था, तो बड़े जतन से कई दिनों तक रखते थे।

लगातार तेल के दाम बढ़ते जा रहे हैं और तेल के भंडार खत्म होने की कगार पर हैं। अगर हम साइकिलों का उपयोग करें तो हमें मोटरवाहनों में प्रयोग होने वाला पेट्रोल व डीजल को आयात नहीं करना पड़ेगा या कम से कम करना पड़ेगा। इससे हमें कुछ अर्थव्यवस्था में राहत महसूस होगी।

अच्छी सेहत के लिए साइकिल चलाना जरूरी है। साइकिल चलाने वालों को अलग से शारीरिक कसरत की जरूरत नहीं होती, क्योंकि इससे मांसपेशियों की अच्छी कसरत हो जाती है। तनाव भी कम होता है। हमारी गति भी धीमी होगी, या नियंत्रित होगी, जिससे हमें सामान्य बने रहने में मदद मिलेगी।

मोटरसाइकिल की अपेक्षा साइकिल काफी हल्की होती हैं, इसे बच्चे से लेकर बुजुर्ग भी चला सकते हैं। सड़क हादसों का जोखिम भी नहीं रहता। अगर साइकिल से गिर भी जाएं तो ज्यादा चोट नहीं आती। जबकि अन्य वाहनों से सड़क हादसे गंभीर होते हैं।

साइकिल के लिए पार्किंग की समस्या नहीं है। न तो खड़ी करने के लिए और न ही सड़क पर चलाने के लिए इसे ज्यादा जगह चाहिए। इसे घर में रखा जा सकता है। जबकि कारों के लिए सड़क पर, पार्किंग में सभी के लिए जगह चाहिए,जो एक बड़ी समस्या है।

साइकिल से सड़क जाम होने की समस्या नहीं है। इसे संकरे रास्तों व गलियों में चलाया जा सकता है। अगर इसके लिए अलग से लेन हो तो, न तो यह दूसरे वाहनों की गति में रूकावट होगी और न ही साइकिल चलाने वालों को असुविधा का सामना करना पड़ेगा। साइकिल उनके लिए भी अच्छी है, जो भीड़ से बचना चाहते हैं।

पर्यटक और पक्षी दर्शकों के लिए भी साइकिल बहुत अच्छी है। इत्मीनान से देखना, क्योंकि चलते-चलते हर पल, हर क्षण दृश्य बदलते रहते हैं, जरा भी भूल हुई कि अच्छे दृश्य देखने से रह जाएंगे। मैं जब कभी यात्रा में जाता हूं तो आंखों को विश्राम नहीं मिल पाता, क्योंकि मैं समझता हूं कि जरा भूल हुई कि कुछ ऐसा देखने से रह जाएगा तो जो मुझे देखना अच्छा लगता। साइकिल में आराम से सभी दृश्य देखे जा सकते हैं।

सड़कों पर वाहनों का बोझ बढ़ता जा रहा है। सड़क जाम, दुर्घटनाएं, प्रदूषण की खबरें आती रहती हैं। साइकिल के चलन से इन सभी में कमी आ सकती है। छोटे व कस्बों में इन्हें बढ़ावा दिया जा सकता है। दुनिया के कई देश साइकिल को बढ़ावा दे रहे हैं। क्या हम भी इस दिशा में आगे बढ़ना चाहेंगे?


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