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अच्छी सेहत के लिए पौष्टिक भोजन जरूरी

मौजूदा समय में स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता देखने में आ रही है। स्वस्थ शरीर के लिए स्वस्थ भोजन भी पौष्टिक होना चाहिए।

अच्छी सेहत के लिए पौष्टिक भोजन जरूरी
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  • बाबा मायाराम

आखिर मनुष्य ने ही जंगलों से तरह-तरह की फसलों के गुणधर्मों की पहचान कर खेतों में उन्हें उगाया है और इसी के परिणामस्वरूप आज हम बीजों के मामले में समृद्ध हैं। लेकिन आज हम देशी बीजों की संपदा खोते जा रहे हैं, इसी को संजोने व संवारने का प्रयास जन स्वास्थ्य सहयोग में किया जा रहा है।

मौजूदा समय में स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता देखने में आ रही है। स्वस्थ शरीर के लिए स्वस्थ भोजन भी पौष्टिक होना चाहिए। प्राकृतिक और बिना रासायनिक खेती से यह संभव है। इन दिनों चिकित्सक भी इसकी सिफारिश करते हैं। इसी के मद्देनजर प्राकृतिक व जैविक खेती बहुत ही महत्वपूर्ण हो जाती है। छत्तीसगढ़ में प्राकृतिक खेती का बहुत ही अच्छा प्रयोग किया जा रहा है। मैं यहां कई बार जाता रहता हूं। यहां की फसलें देखी हैं, किसान कार्यकर्ताओं, और डॉक्टरों से बातचीत की है। आज इस खेती के बारे में बात करना चाहूंगा, जिससे हम देशी खेती के बारे में समग्रता से समझ सकें।

छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में एक छोटा सा कस्बा है गनियारी। यहां का जन स्वास्थ्य सहयोग संस्था का अस्पताल है, जहां बीमारी के इलाज के साथ उसकी रोकथाम पर जोर दिया जाता है। स्वस्थ रहने के लिए लोगों को अच्छा भोजन मिले इसके लिए कृषि कार्यक्रम चलाया जा रहा है।

बिलासपुर जिले के कई गांवों में किसान जैविक खेती से धान पैदावार बढ़ा रहे हैं। जब वर्ष 2000 में जन स्वास्थ्य सहयोग नामक गैर सरकारी संस्था ने बिलासपुर जिले में स्वास्थ्य का काम शुरू किया और अपने अध्ययन के दौरान यह पाया कि ज्यादातर बीमारियों का संबंध कुपोषण से है तब संस्था ने अपना कृषि कार्यक्रम शुरू किया। जन स्वास्थ्य सहयोग ने अपने एक डेढ़ एकड़ की भाठा (कमजोर) ज़मीन पर बिना रासायनिक वाली जैविक खेती शुरूआत की, जो अब साढ़े चार एकड़ में फैल चुकी है।

आज यहां धान की 4 सौ ज्यादा किस्में संग्रहीत हैं जिनमें सुगंधित लाल चावल वाली, जल्द पकने वाली, किस्में काले चावल की हैं। इसके अलावा मडिया, कांग, कुटकी, ज्वार, मक्का और अरहर की किस्में हैं। चना, अलसी, कुसुम, मटर, भिंडी, उड़द आदि देशी किस्में भी हैं।

यह रंग-बिरंगे देशी बीज न केवल सौंदर्य से भरपूर हैं बल्कि स्वाद में भी बेजोड़ हैं। औषधि गुणों से सम्पन्न हैं और स्थानीय मिट्टी पानी और हवा के अनुकूल हैं।

आखिर मनुष्य ने ही जंगलों से तरह-तरह की फसलों के गुणधर्मों की पहचान कर खेतों में उन्हें उगाया है और इसी के परिणामस्वरूप आज हम बीजों के मामले में समृद्ध हैं। लेकिन आज हम देशी बीजों की संपदा खोते जा रहे हैं, इसी को संजोने व संवारने का प्रयास जन स्वास्थ्य सहयोग में किया जा रहा है।

गनियारी में एक-दो डिसिमल की छोटी-छोटी क्यारियों में देशी धान का प्रयोग करीब डेढ़ दशक से चल रहा है। मैं कई बार इस फार्म को देख चुका हूं और इसके प्रमुख कार्यकर्ता होम प्रकाश से चर्चा की है। होम प्रकाश ने बताया कि धान की कई किस्में हैं जिनमें हरून धान 70 से 100 दिन वाली, मध्यम 100 से 120 दिन वाली और गहरून 120 से 145 दिन वाली हैं। जो अलग-अलग किस्म की मिट्टी वाली ज़मीन में होती हैं।

मैं हाल ही में अप्रैल के महीने में यहां गया था, तब गर्मी में कुटकी और मड़िया की फसल लहलहा रही थी। हालांकि यह बारिश की फसलें हैं, लेकिन यहां गर्मी में बोने का प्रयोग किया जा रहा है। यहां के खेती के कार्यकर्ता कहते हैं कि कई बार बारिश में ज्यादा पानी से यह फसलें सड़ जाती हैं, क्योंकि इन्हें कम पानी की जरूरत है। इसलिए गर्मी में यह फसलें अच्छी होती हैं। यह गर्मी के धान का अच्छा विकल्प हो सकती हैं।

कृषि कार्यक्रम के कार्यकर्ता ओमप्रकाश साहू हैं। चूंकि वे खुद और उनकी पत्नी खेत में काम करते हैं, इसलिए उन्हें खेती की अच्छी जानकारी है। ये अरहर उत्तर प्रदेश से आई है, मडिया बस्तर से। कुसुम से तेल निकलता है और काबुली चना का दाना बड़ा होता है। धान की कई किस्में सुगंधित हैं और कई बिना पानी वाली। मुंगलानी (राजगीर) पौष्टिक होता है और ज्वार की रोटी हाजमे के लिए बहुत अच्छी मानी जाती है।

वे बताते हैं खेती के लिए ज़मीन का स्वास्थ्य भी सुधारना जरूरी है। रासायनिक खेती के कारण ज़मीन की उर्वरा शक्ति कमजोर होती जा रही है और उर्वर बनाने वाले सूक्ष्म जीवाणु खत्म होते जा रहे हैं। बेजा रासायनिक खाद के इस्तेमाल से ज़मीन सख्त होती जा रही है। भूमि की उर्वरा शक्ति को बढ़ाने के लिए मिश्रित फ़सलों को खेतों में बोया जाता है। यह परंपरागत तरीका है। देश के कई इलाकों में अलग-अलग तरह की मिश्रित फसलें होती हैं। बारहनाजा, नवदान्या और उतेरा आदि पद्धति अलग-अलग जगह प्रचलित है।

इसके अलावा, हरी खाद ढनढनी, सन, सोल, चरौरा को भी बोकर फिर मिट्टी में सड़ा दिया जाता है, जिससे ज़मीन उत्तरोत्तर उर्वर बनती जाती है। उन्होंने बताया कि इस भाठा कमजोर ज़मीन को हरी खाद से ही उर्वर बनाया है।

किसान कार्यकर्ता ने बताया कि धान की रासायनिक खेती में प्रति एकड़ 5-6 हजार रूपए लागत आती है और जैविक खेती में एक से डेढ़ हजार रूपए। अगर मेड़ पर पौधे लगाए तो इससे हमें लकड़ी, फल, शुद्ध हवा, और ज़मीन को पानी सब कु छ मिलेंगे।

आसपास के गांवों में जैविक खेती को प्रोत्साहन दिया जा रहा है। सब्जी-बाड़ी को बढ़ावा दिया जा रहा है। संस्था छोटे बच्चों के लिए फुलवारी (झूला घऱ) चला रही है, जहां सब्जी-बाड़ी लगाई है। इसमें हरी भाजियां लगाई हैं, जिससे बच्चों को ताजी हरी सब्जियां खाने मिले। इस तरह गांवों में सब्जी-बाड़ी की परंपरा को फिर से बढ़ावा दिया जा रहा है।

इसके अलावा, संस्था ने ऐसी पुस्तिकाएं भी प्रकाशित ही हैं, जिसमें स्थानीय फल, फूल, सब्जी, मशरूम, कंद-मूल और पौष्टिक अनाजों की जानकारी दी हैं, और उनमें पौष्टिकता के बारे में बताया है, जिससे लोग ऐसे पौधों को जानें, और उनकी बाड़ियों में लगाएं। इससे स्वस्थ रहने में मदद मिलेगी।

कुल मिलाकर, यह कहा जा सकता है कि यह प्रयोग अनूठा है। छत्तीसगढ़ में धान की विविधता है। इसके साथ कई और फसलें भी होती रही हैं। संस्था ने कृषि कार्यक्रम को प्राथमिकता दी है। संस्था के परिसर के साथ गांवों में भी किसानों के साथ जैविक खेती को प्रोत्साहन दिया जा रहा है। संस्था के परिसर में मरीजों व किसानों को इसकी जानकारी दी जाती है। अस्पताल के परिसर में बीजों की प्रदर्शनी लगी रहती है। कुल मिलाकर, यह कहा जा सकता है कि ऐसे ही प्रयोगों से मिट्टी-पानी के संरक्षण वाली देशी खेती बचेगी, लुप्त हो रहे देशी बीज बचेंगे, कृषि संस्कृति के साथ खाद्य सुरक्षा का भी संरक्षण होगा और लोगों को भी पोषणयुक्त भोजन मिलेगा, यह पूरी पहल सराहनीय होने के साथ अनुकरणीय है। इससे मिट्टी, पानी और पर्यावरण के संरक्षण के साथ छत्तीसगढ़ की ग्रामीण संस्कृ ति भी बचेगी।


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