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ललित सुरजन की कलम से नक्सलवाद - क्या सेना की जरूरत है

'भारत में ऐसा सोचने वालों की कमी नहीं है कि यह देश जनतंत्र के उपयुक्त नहीं है। उनके बीच एक छोटा वर्ग यह मानकर भी चलता है कि भारत को स्वतंत्र ही नहीं होना चाहिए था।

ललित सुरजन की कलम से नक्सलवाद - क्या सेना की जरूरत है
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'भारत में ऐसा सोचने वालों की कमी नहीं है कि यह देश जनतंत्र के उपयुक्त नहीं है। उनके बीच एक छोटा वर्ग यह मानकर भी चलता है कि भारत को स्वतंत्र ही नहीं होना चाहिए था। हम कई बार सुनते हैं कि इससे तो अंग्रेजों का राज ही अच्छा था। इसी तरह बहुत से लोग यह मानते हैं कि यहां तो मिलिट्री का राज होना चाहिए था। ऐसे लोग कल्पना करते हैं कि हंटर मारने से सब ठीक हो जाएगा। गनीमत है कि इस तरह की सोच रखने वाले बहुमत में नहीं हैं। जनतंत्र को हिकारत से देखने वाला यही वर्ग आम चुनावों में भाग नहीं लेता, लेकिन चुनाव के बाद निर्वाचित नेताओं के प्रति अपनी निष्ठा व्यक्त करने में एक क्षण भी नहीं गंवाता। जब जून 2005 में बस्तर में सलवा जुडूम की शुरुआत हुई थी तो इसी वर्ग ने रायपुर व अन्य शहरों में कारों और बाइकों पर सलवा जुडूम रैलियां निकाली थीं। इनका मकसद सरकार की निगाह में चढ़ना था। वे इसमें कामयाब भी हुए होंगे। वरना इस तथ्य को वे भी जानते थे कि रायपुर में रैली निकालने से नक्सलवाद खत्म नहीं होगा। आज यही लोग जब बढ़-चढ़ कर सेना का उपयोग करने की मांग कर रहे हैं तो इनके असली इरादे क्या हैं, यह समझा जा सकता है।'

(15 अप्रैल 2010 को प्रकाशित)


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