नवीन (नितिन) भाजपा का युग
नितिन नवीन का कार्यकारी से पूरा अध्यक्ष बनना भी सम्पन्न हो गया है। उम्मीद के अनुसार उनको निर्विरोध चुन लिया गया

- अरविन्द मोहन
नितिन नवीन को अध्यक्ष बनाकर यह संदेश तो स्वाभाविक रूप से दिया गया है कि भाजपा में कार्यकर्ता का महत्व है और वंशवादी या व्यक्ति केंद्रित पार्टियों में यह संभव नहीं है। इससे भाजपा के हर कार्यकर्ता के मन में उत्साह बढ़ेगा। यह पहली बार नहीं हुआ है। पार्टी ने राज्यों का मुख्यमंत्री और केंद्र का मंत्रिमंडल बनाने में भी उसने एकदम से नए लोगों को अवसर दिया है।
नितिन नवीन का कार्यकारी से पूरा अध्यक्ष बनना भी सम्पन्न हो गया है। उम्मीद के अनुसार उनको निर्विरोध चुन लिया गया। विरोध की उम्मीद किसी को नहीं होगी लेकिन उस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की तरफ से भी किसी तरह का विलोम स्वर सुनाई नहीं दिया जिसे निवर्तमान अध्यक्ष जे पी नड्डा ने गैर जरूरी सहयोगी घोषित कर दिया था। तब से संघ काफी नाराज था और खुद संघ प्रमुख ने की अमूकों पर अपनी नाराजगी का संकेत दिया था। हालांकि इस कथन के बाद संघ के लोगों ने महाराष्ट्र, हरियाणा, दिल्ली और बिहार में भाजपा की जीत में महत्वपूर्ण भूमिका भी निभाई। यह माना जा रहा था कि वह भाजपा पर अपनी पसंद का अध्यक्ष चुनने का दबाव बना रही थी। अब नितिन नवीन के नाम पर संघ का अनुमोदन जरूर लिया गया होगा लेकिन उनको चुनकर भाजपा के मौजूदा नेतृत्व ने संघ को यह संदेश तो दिया ही कि उन्हें अपनी चलानी है और संघ की ज्यादा परवाह उन्हें नहीं है। नड्डा जी का कथन भी जुबान फिसलना नहीं था। लेकिन क्या संघ हर समय चुप रहेगा और समर्थन देता ही रहेगा यह आगे देखने की चीज होगी।
लेकिन नितिन नवीन के साथ भाजपा की राजनीति में एक बड़ा बदलाव तो हो ही रहा है। उनकी उम्र और युवापन खास चीज है। उन्होंने अभी तक बहुत उल्लेखनीय काम नहीं किया है लेकिन उनका व्यवहार, उत्साह और निष्ठा एकदम अलग है। लेकिन इतने भर से कोई 14 करोड़ सदस्यों वाली पार्टी का नेता नहीं बन जाता। उनका चुनाव पार्टी के उसे नेतृत्व ने किया है जिसने भाजपा को लगभग अजेय बनाया है, देश को लगभग पूरा ही भगवा रंग से रंग दिया है। यह उसकी सफलता है कि कहीं से चूं तक नहीं हुआ। यह समूह या दो तीन लोगों की मंडली किसी भी तरह पार्टी पर से अपनी पकड़ कम नहीं करेंगी। क्योंकि लोक सभा में भाजपा की स्थिति ऐसी है कि यहां से संदेश बदलते ही सरकार बदलने का खेल शुरू हो जाएगा। सो एक मायने में नितिन नवीन का चुनाव जेनरेशन चेंज या बड़ा बदलाव है लेकिन दूसरी तरफ एक निरन्तरता को बनाए रखना भी है। भाजपा अभी किसी ऐसे कद्दावर नेता को अध्यक्ष बनाने का जोखिम मोल नहीं ले सकती जिस पर मौजूदा नेतृत्व का पूरा नियंत्रण नहीं रहे।
नितिन नवीन को अध्यक्ष बनाकर यह संदेश तो स्वाभाविक रूप से दिया गया है कि भाजपा में कार्यकर्ता का महत्व है और वंशवादी या व्यक्ति केंद्रित पार्टियों में यह संभव नहीं है। इससे भाजपा के हर कार्यकर्ता के मन में उत्साह बढ़ेगा। यह पहली बार नहीं हुआ है। पार्टी ने राज्यों का मुख्यमंत्री और केंद्र का मंत्रिमंडल बनाने में भी उसने एकदम से नए लोगों को अवसर दिया है। लेकिन हर बार वह सफल ही रही है यह दावा नहीं किया जा सकता। कर्नाटक और उत्तराखंड में खुद पार्टी को बार-बार नया नेता सामने करना पड़ा और उनका प्रदर्शन संदिग्ध रहा। यही बात महाराष्ट्र के लिए भी कही जा सकती है तो बिहार में उसे आज तक नेता ही नहीं मिला। राजस्थान, ओडिशा, छतीसगढ़ और मध्यप्रदेश के उसके मुख्यमन्त्रियों को योगी आदित्यनाथ जैसा सफल नहीं माना जा सकता। इसलिए यह कहा जा सकता है कि नेतृत्व के पास कोई अल्लादीन का चिराग नहीं है। इसलिए जितनी परीक्षा नितिन नवीन की है उतनी ही केन्द्रीय नेतृत्व अर्थात नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी की भी है। नवीन का असफल होना उनको कमजोर करेगा।
यह कहने भर की बात है कि नितिन नवीन की परीक्षा बंगाल, असम, कर्नाटक, केरल और पुड्डुचेरी विधान सभा के चुनाव में होगी। इन राज्यों में असल परीक्षा सिर्फ बंगाल में होगी। तृणमूल कांग्रेस को हराना भाजपा का पुराना सपना है लेकिन इधर वहां भाजपा ढलान पर दिखने लगी है। भाजपा को तमिलनाडु, केरल और पुड्डुचेरी में ज्यादा उम्मीद नहीं है और असम का चुनाव भी हेमंत बिस्व सरमा और नरेंद्र मोदी के नाम पर लड़ा जाना है। बंगाल में नितिन नवीन की परीक्षा इस नाम से भी होगी कि क्या वे कायस्थ होने भर से बंगाल के भद्रलोक समाज में भाजपा की पैठ बनवा देंगे? हम जानते हैं कि सारी कोशिश करके भी भाजपा बंगाल के भद्रलोक में जगह नहीं बना पाई है और उसमें ब्राह्मण और वैद्य के साथ कायस्थ महत्वपूर्ण घटक हैं। यहां कायस्थों की आबादी भी ठीक-ठाक है पर भाजपा और नितिन नवीन की असली परीक्षा अगले साल होने वाले उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में होगी। इसकी वजह योगी आदित्यनाथ हैं जो पिछले लोक सभा चुनाव के समय से ही भाजपा के केन्द्रीय नेत्तृत्व को चुनौती दे रहे हैं। भाजपा अध्यक्ष के चुनाव में देरी की वजह संघ के साथ योगी जी की नाराजगी थी। अमित शाह बनाम योगी की लड़ाई नितिन नवीन के आने भर से समाप्त नहीं होगी लेकिन उनके संभाले संभालेगी यह भी आसान नहीं है। इसलिए उनके नेतृत्व की असली परीक्षा उत्तर प्रदेश चुनाव में ही होगी।
एक और बात कही जा रही है कि भाजपा के पदाधिकारियों की आयु सीमा साठ साल तय हो सकती है। 45-46 साल के अध्यक्ष के नेतृत्व को मनवाने के लिए और एक ढंग की टीम बनाने में यह चीज जरूरी मानी जाती है। हमने देखा है कि 2014 में सत्ता संभालते ही नरेंद्र मोदी ने 75 वर्ष की उम्रसीमा को लागू भी किया। अब लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी जैसे लोगों को किनारे करने से कुछ लाभ हुए होंगे लेकिन नोटबंदी और कोरोना की तालाबंदी में एक व्यक्ति के मनमाना फैसला करने का रास्ता भी खुला जो अंतत: देश के लिए नुकसानदेह साबित हुआ। काफी सारे लाभ हुए हैं तो अनुभव का लाभ देश को नहीं मिला। राजनीति कुश्ती नहीं हैं जिसमें शरीर बल और चुस्ती फुर्ती सर्वोपरि महत्व की चीज है। राजनीति में अनुभव, विचारधारा और निष्ठा की चीज है और उम्र बढ़ाने से ये चीजें बढ़ती जाती हैं। इसलिए ऐसा करना भाजपा के अंदर भी हड़बड़ाहट पैदा करेगा यह देखने में आ सकता है। आज की भाजपा जिस पीढ़ी ने बनाई है वह कम से कम साठ साल की है। एक झटके में उनको संगठन के काम से विमुख करना संभव नहीं है।


