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बरसात में प्रकृति की अनुपम छटा!

बरसात का मौसम आते ही धरती के सौंदर्य की छटा देखती ही बनती है।

बरसात में प्रकृति की अनुपम छटा!
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  • बाबा मायाराम

बारिश से जमीन, चट्टानें और पेड़ों की खाली डालियों में नई जान आ जाती है। चारों तरफ हरियाली फूट पड़ती है। पेड़ों की शाखाएं सरसराती हवा में डोलने लगती हैं। उनके पत्ते चमकने लगते हैं। हवा में लहराने लगते हैं। चिड़ियां फुदकने लगती हैं। उनके गीत बहुत सुहाते हैं। इस दौरान सात भाई, भारद्वाज, टिटहरी, बगुला, किंगफिशर भी दिख जाते हैं। तितलियां तो कई प्रकार की हैं।

बरसात का मौसम आते ही धरती के सौंदर्य की छटा देखती ही बनती है। जो पेड़ गर्मी में सूखे, उदास और बेजान से नजर आते हैं, वे मानसून की बारिश आते ही हरे-भरे और सजीव हो उठते हैं। हरे-भरे खेत, तालाब, रंग-बिरंगे पक्षी, तितलियां, तरह-तरह के कीट-पतंगे मन मोह लेते हैं, बरबस अपनी ओर खींचते हैं।

बारिश से जमीन, चट्टानें और पेड़ों की खाली डालियों में नई जान आ जाती है। चारों तरफ हरियाली फूट पड़ती है। पेड़ों की शाखाएं सरसराती हवा में डोलने लगती हैं। उनके पत्ते चमकने लगते हैं। हवा में लहराने लगते हैं। चिड़ियां फुदकने लगती हैं। उनके गीत बहुत सुहाते हैं।

जब कभी मैं सुबह या दोपहर को किताब पढ़ रहा होता हूं, तो गुड़हल के पेड़ पर फूलों का रस का स्वाद चखने आईं चिड़ियों की आवाज से चुप्पी टूटती है। उनका एक फूल से दूसरे फूल पर कूदना, फुदकना निहारना सुकून देता है। सूर्यपक्षी ( सनवर्ड) विशेष रूप से आता है। वह दिखने में भी बहुत सुंदर होता है।

मैं रोज सुबह की सैर करता हूं। कभी साइकिल से तो कभी पैदल जाता हूं। पक्षी देखना, प्रकृति को निहारना, लोगों से मिलना और विशेष तौर से किसानों से बात करता हूं।

इस दौरान सात भाई, भारद्वाज, टिटहरी, बगुला, किंगफिशर भी दिख जाते हैं। तितलियां तो कई प्रकार की हैं। ड्रेगन फ्लाई ( छत्तीसगढ़ में इसे फुरफुंदी कहते हैं) की भी कई प्रजातियां हैं। सैकड़ों कीट-पतंगे हैं। यह सब धरती की सुंदरता को कई गुना बढ़ा देती हैं और मन को खुशी से भर देते हैं।

पक्षी भी हमारी तरह प्रकृति का हिस्सा हैं। लेकिन इन दिनों वे संकट में हैं, जलवायु बदलाव से गर्मी ज्यादा बढ़ गई है, जिसे वे सहन नहीं कर पाते हैं। पक्षी परागीकरण में, खाद्य श्रृंखला में, फसलों के कीट नियंत्रण में बहुत उपयोगी हैं। जंगल को बढ़ाने के लिए भी पक्षियों का योगदान है। कई पेड़ों के बीज पक्षी खाते हैं और उनकी विष्ठा के माध्यम से ये बीज मिट्टी में मिल जाते हैं, जब नमी मिलती है, तब अंकुरित हो जाते हैं। इस तरह नया पेड़ बनता है। पक्षियों की विष्ठा खेतों को उर्वर बनाती है। कौआ, चील और गिद्ध अच्छे सफाईकर्मी की तरह काम करते हैं।

पक्षी अवलोकन कई तरह से उपयोगी है। परिवेश व पर्यावरण के प्रति जागरुकता तो इससे बढ़ती ही है, पक्षी प्रेम और उनके प्रति संवेदनशीलता भी बढ़ती है। इससे जैव विविधता व पर्यावरण का संरक्षण तो होता ही है, टिकाऊ विकास का नजरिया भी मजबूत होता है। आजकल डॉक्टर बताते हैं कि मानसिक स्वास्थ्य में भी पक्षी संगीत मददगार है।

इन दिनों नदियों में पानी बढ़ गया है। कुछ दिन पहले बाढ़ भी आई थी।

जो नदी नाले गर्मी में सूख जाते हैं, या कहें अदृश्य हो जाते हैं, बारिश में इधर-उधर से बहने लगते हैं। सड़कों पर पानी बह जाता है। ऊंचे स्थानों, जंगलों से और पहाड़ियों से निकलकर झरने कल-कल बहने लगते हैं। इनको देखकर ऐसा लगता है जैसे गुमा हुआ व्यक्ति अचानक से मिल जाता है।

नदियों के आसपास चहल-पहल बढ़ गई है। मछुआरे जाल लेकर मछली पकड़ते दिखते हैं। जो नदियां अब साफ हो गई हैं, उनका कचरा बाढ़ के पानी से बह गया है। सुबह की सैर करने वाले भी पहले की अपेक्षा ज्यादा दिखते हैं। इनमें छुट्टी के दिन बच्चे भी शामिल होते हैं।

बारिश आते ही मौसम में नई बहार आ जाती है। जगह-जगह से छोटे-बड़े पौधे निकल आते हैं। पेड़ों के बीच से, चट्टानों की दरारों से और जहां आप सोच भी नहीं सकते वहां से पौधे झांकने लगते हैं। कई बार सांप, केकड़े, बिच्छू भी दिखते हैं।

बारिश के दौरान पेड़ों से बूंदें टपकना, पेड़ों की डालियों में लड़ियों सी सज जाती हैं। वनों के ऊपर छतरी से छाए बादल मंडरा रहे हैं, धुएं सा आभास होता है, पानी की फुहार गिरती रहती है, रिमझिम-रिमझिम, धीरे-धीरे। पेड़ों की पत्तियां हवा में झिलमिलाती हैं तो बहुत ही सुंदर लगती हैं। अगर शाम को कई बार आकाश में तारों के बीच सुंदरता कई गुना बढ़ जाती है।

मैंने इन दिनों हरे-भरे शानदार भू दृश्य देखें हैं, खेत, और गांव भी, और लबालब भरे कई तालाब भी, जो बहुत ही मनमोहक और अविस्मरणीय दृश्य थे।

छत्तीसगढ़ में तालाबों की पानीदार परंपरा रही है। छत्तीसगढ़ समेत देश के कई राज्यों में अच्छी तालाबों की पानीदार परंपराएं रही हैं। इसे गांव-समाज, व्यक्तियों व समुदायों ने बरसों से मिलकर बनाया है। इस पर सामलाती मेहनत की है। यह तालाब संस्कृति सदियों पुरानी है। इसके इर्द-गिर्द लोगों का जीवन जुड़ा है। यह जीवन पद्धति का हिस्सा है। शादी-विवाह से लेकर तीज-त्यौहार में इसका महत्वपूर्ण स्थान है।

छत्तीसगढ़ में रतनपुर में तो तालाब ही तालाब हैं। वैसे यहां हर गांव में कई तालाब हैं। यहां तालाबों को तरिया कहा जाता है। उनमें कमल के फूल खिले होते हैं। बतखें तैरती हैं। पक्षियों का कलरव होता है। जनजीवन की चहल-पहल होती है। मछुआरे मछली पकड़ते हैं। सिंघाड़े व कमल ककड़ी होती है। कई तरह की हरी भाजियां होती हैं। मवेशियों का यहां पानी पीने के लिए एकत्र होते हैं। एक अलग ही नज़ारा होता है। यानी इनकी अनुपम छटा निराली होती है, साथ ही इनसे लोगों की आजीविका भी जुड़ी होती है।

इन दिनों खेतों में धान की निंदाई-गुड़ाई चल रही है। कुछ दिन पहले बियासी हो रही थी। कई किसान अब बियासी हल-बैल से नहीं करते, ट्रेक्टर के आने बाद से पारंपरिक तरीके पीछे छूटते जा रहे हैं। लेकिन छिड़का बोनी के बाद जहां-जहां पौधे नहीं उगते वहां दूसरी जगह जहां ज्यादा पौधे होते हैं, वहां से उखाड़ कर रोपते हैं। इसे चलाई कहते हैं। जिससे खेत में फसल अच्छी हो।

कुल मिलाकर, बारिश का मौसम बहुत ही सुंदर होता है। यह न केवल सौंदर्य की दृष्टि से बल्कि लोगों की खाद्य सुरक्षा, आजीविका, पशुपालन सभी की दृष्टि से उपयोगी होता है। प्रकृति बिना रुके अपना काम करती रहती है। केंचुएं उसे उर्वरक बनाते हैं। पक्षी फसलों के लिए उपयोगी हैं। तालाब, न केवल मनुष्य के लिए बल्कि पशु-पक्षी बल्कि अन्य जीव-जगत के लिए भी उपयोगी हैं। जलवायु बदलाव के दौर में प्रकृति, जैव विविधता, पर्यावरण का संरक्षण और भी जरूरी हो गया है, जिससे धरती की जीवनदायिनी शक्ति बची रहे, जिससे मनुष्य के साथ सभी जीव-जगत का पालन पोषण हो, यह आवश्यक है। और इसकी अनूठी सुंदरता का संरक्षण होता रहे। क्या हम इस दिशा में आगे बढ़ना चाहेंगे।


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