मोदी का पलायन और राहुल का आगमन, बदलते कल की तस्वीर
ऐसे साहस का व्यक्ति और कोई याद नहीं आता। डा.मनमोहन सिंह ने कहा था- इतिहास मेरे साथ इस मीडिया के मुकाबले बेहतर न्याय करेगा।

- शकील अख्तर
एक बात तो यह कि सरकार मानती है कि पेपर लीक करवाने वाला बड़ा मफिया है और करोड़ों रुपया देने की उसकी हैसियत है। दूसरी सबसे मुख्य बात कि जोर इस पर होना चाहिए कि अब पेपर लीक नहीं होगा। सरकार बात बदल रही है कि अगर होगा तो फिर यह यह करेंगे। बाद में आप कुछ भी करते रहो उससे क्या?
ऐसे साहस का व्यक्ति और कोई याद नहीं आता। डा.मनमोहन सिंह ने कहा था- इतिहास मेरे साथ इस मीडिया के मुकाबले बेहतर न्याय करेगा। और इतिहास ने अभी बता दिया जब सुप्रीम कोर्ट ने उन पर लगाए गए सारे आरोप खत्म कर दिए। लेकिन यहां बात मनमोहन सिंह की नहीं उस शख्स की हो रही है जिसके साथ मीडिया ने मनमोहन सिंह से भी ज्यादा दुश्मनी भरा व्यवहार किया। और केवल मीडिया नहीं था। पूरी सरकार थी उसके पीछे और अंधभक्तों की एक बड़ी भीड़।
मगर वह शख्स न डिगा, न डरा न रुका। और अब जब उसने अपनी मेहनत और हिम्मत से परिस्थितियां बदल दी हैं तो कहा जा सकता है कि इतिहास से पहले समय को राहुल के साथ न्याय करना होगा। वह वक्त आ गया है।
प्रधानमंत्री मोदी जिनके बारे में मीडिया, उनकी पार्टी के लोग और भक्तयह कहते थे कि वे नहीं तो और कौन? उनका ग्राफ गिरना शुरू हो गया है। मोदी एक घटना दुर्घटना के बने नेता हैं। खुद उनकी पार्टी के अटल अडवानी और दूसरे नेताओं की तरह लगातार सार्वजनिक रूप से काम करके उभरे नेता नहीं। गोधरा ट्रेन अग्निकांड के बाद हुए गुजरात दंगों से पहले उनकी गिनती भाजपा में भी बहुत पिछली पंक्ति के नेताओं में होती थी।
केन्द्र में बीजेपी की सरकार थी। अटल, आडवानी, मुरली मनोहर जोशी और इसके बाद की सेंकड केटेगरी के नेताओं की भी लंबी लिस्ट थी। बहुत नाम हैं। जसवंत सिंह, यशवंत सिन्हा, प्रमोद महाजन इन्हें आप टाप सेंकड में डाल सकते हैं। इसके बाद नेतृत्व की सेंकड लाइन में अरुण जेटली, सुषमा स्वराज, वैंकय्या नायडू जैसे बहुत नाम हैं। मोदी उस समय गिनती में ही नहीं आते थे।
मगर गोधरा और उसके बाद गुजरात दंगों का ऐसा उपयोग किया गया कि मोदी सीधे उस समय के प्रधानमंत्री वाजपेयी से कैमरे के सामने बहस करने लगे कि कर तो रहे हैं। जब वाजपेयी ने राजधर्म पालन करने की बात कही तो उस समय मुख्यमंत्री मोदी ने यही जवाब दिया था कि- कर तो रहे हैं। प्रधानमंत्री वाजपेयी नहीं कह पाए कि नहीं कर रहे हैं। इसीलिए हमने शुरू में लिखा कि एक घटना दुर्घटना से बने उभरे नेता मोदी।
और अब एक और घटना आंदोलन से गिरते मोदी। छात्रों के आंदोलन ने मोदी का सारा रौब, रुतबा खत्म कर दिया। वे छात्रों को बुलाकर उनसे बात नहीं कर पा रहे। रील जो गंभीर जिम्मेदार मैसेज का जरिया नहीं मानी जाती उसके द्वारा युवतम पीढ़ी से कनेक्ट करने की कोशिश कर रहे हैं। हाय फ्रेन्ड्स बोलने या जेन जी की दूसरी शब्दावली, स्टाइल उपयोग करने से यह पीढ़ी कनेक्ट नहीं होती है। यह होती है प्यार विश्वास और भय रहित माहौल से।
मोदी ऊंचे सिंहासन पर बैठकर क्षमादान देने की बात करते हैं। इतिहास में वह घटना किस तरह घटी थी वह अलग बात है। मगर 65 साल से पहले बनी फिल्म मुगले आजम में जैसे शहंशाह अकबर के सामने उस समय की नई पीढ़ी का प्रतिनिधि सलीम कहते हंै कि मेरे उसूल आपकी माफी के मोहताज नहीं हैं जिल्ले इलाही! वह जिल्ले इलाही की परंपरा आज भी चली आ रही है। शहंशाह अकबर को तो दूसरे कहते थे। मगर यहां तो मोदी खुद ही कहने लगे कि वे नान बायलोजिकल हैं। अवतार पुरुष। जिल्ले इलाही का मतलब भी कुछ इसी दिशा में होता है। ईश्वर का प्रतिनिधि।
तो आज के बच्चे उनकी माफी के मोहताज नहीं हैं। उनकी तो मांग है कि प्रधानमंत्री मोदी माफी मांगें। लाठी, आंसू गैस, करंट मारने वाली लोहे की राड तो सब चलाए ही मगर लड़कियों के साथ जिस तरह शर्मनाक व्यवहार किया गया और पेलेट गन चलाई गई खासतौर से उसके लिए मोदी माफी मांगें। मगर वे उल्टा कह रहे हैं कि मैंने माफ किया। यह वही सर्वशक्तिमान होने के गुमान है जिसमें अकबर माफ करने की बात करता है और सलीम कहते हैं कि न मैं झुकूंगा और आप ज्यादा से ज्यादा क्या कर सकते हैं लाश में तबदील तो वह लाश भी झुकेगी नहीं।
22 से ज्यादा बच्चे मरे ही हैं। जान दे दी उन्होंने। उस पर मोदी ने क्या कहा। उन्हें भी माफ करने की बात कहकर उन बच्चों के मां-बाप के जख्मों को और गहरा कर सकते हैं। बच्चों का कसूर क्या था? क्यों करनी पड़ी उन्हें खुदकशी? जिस कारण कि पेपर लीक होना उस पर तो प्रधानमंत्री ने एक शब्द नहीं कहा। अब पेपर लीक होगा तो और कड़ी सज़ा होगी का विधेयक संसद में पहुंचा दिया। खुद नहीं आए उस पर बोलने।
लेकिन जैसा हमने आज की बात शुरू की है कि उसने अपनी हिम्मत, मेहनत और छात्रों के प्रति अपनी संवेदना, जुड़ाव से बाजी पलट दी राहुल का कहना है कि प्रधानमंत्री मोदी लोकसभा में मेरे सामने नहीं आ सकते। संसद के बजट सत्र के बाद इस चल रहे मानसून सत्र में भी यह बात साबित हो गई। पेपर लीक विधेयक पर नहीं आए और उस वंदे मातरम बिल पर भी नहीं जो उनकी फेवरेट पिच रही है।
अभी छह महीने पहले वंदे मातरम के 150 वर्ष पूरे होने पर कांग्रेस पर इस तरह बरसे थे जैसे उनके संगठन का गीत रहा हो। उससे तो कांग्रेस के हर अधिवेशन शुरू होता है। लेकिन अब वंदे मातरम या कोई भी ऐसा इशु जिससे उन्हें लगता है कि भावनाएं भड़काई जा सकती हैं सब लाइम लाइट में लाने की कोशिश करते हैं। मगर इस बार वंदे मातरम जिसको कानून बना रहे हैं पर बोलने भी लोकसभा राज्यसभा किसी भी सदन में नहीं आए।
तो यह मोदीजी के पलायन के साथ राहुल का आगमन का नया परिदृश्य बनता दिख रहा है। अब सवाल बदल गया है भाजपा में राहुल के सामने कौन?
नीट पेपर लीक के बाद से साफ दिख रहा है कि मोदीजी परिस्थितियों पर नियंत्रण खोते जा रहे हैं। उनकी कोशिश सफल नहीं हो रही है। छात्रों को माफ करने की बात उलटी पड़ रही है। इसी तरह पेपर लीक का विधेयक जो एक संशोधन विधेयक ही है लीक रोकने की बात नहीं करता है। लीक हो जाने पर पहले के मुकाबले ज्यादा सज़ा और जुर्माने का बात करता है। जुर्माना करोड़ों में।
एक बात तो यह कि सरकार मानती है कि पेपर लीक करवाने वाला बड़ा मफिया है और करोड़ों रुपया देने की उसकी हैसियत है। दूसरी सबसे मुख्य बात कि जोर इस पर होना चाहिए कि अब पेपर लीक नहीं होगा। सरकार बात बदल रही है कि अगर होगा तो फिर यह यह करेंगे। बाद में आप कुछ भी करते रहो उससे क्या?
22 स्टूडेंट जिन्होंने जान दी इसके लिए नहीं रुक पाए न कि लीक करने वालों की सज़ा कड़ी की जाएगी। उनकी जान तो इसलिए गई कि पेपर लीक होने से उन्हें अपने मां-बाप के किए खर्चें और आगे फिर करने वाले खर्चों की भयावह तस्वीर दिखने लगी। मां-बाप कहां से लाएंगे पैसा? कितना कर्जा लेंगे? हमारी वजह से! हम ही चले जाते हैं दुनिया से।
प्रधानमंत्री मोदी ने एक शब्द भी बोला। वे कह रहे हैं कि दिल चाहता है आपसे बात करता ही रहूं। अपनी इंस्टा पर डाली लेटेस्ट रील में कह रहे थे।
बच्चे जो सुनना चाह रहे हैं वह आप कह नहीं रहे। अब पेपर लीक नहीं होंगे, विश्वविद्यालयों अन्य उच्च शिक्षण संस्थानों में जो राहुल गांधी का आरोप है कि आरएसएस के लोग बिठा कर रखे गए हैं, जो अयोग्य हैं उन्हें हटाया जाएगा।
पेलेट गन चलाने के लिए माफी मांगी जाएगी। चलाने का आदेश देने वाले को पद से हटाया जाएगा। बच्चे यह सुनना चाहते हैं। अनावश्यक और अप्रसांगिक बातें तो वे अपने मां-बाप से लेकर दादा-दादी, नाना-नानी जिन्हें वे बहुत प्यार करते हैं उनकी भी नहीं सुनते। ख्याल रखते हैं उनका। मगर जब वे बेवजह खुद को लादने लगते हैं तो बच्चे उस पेरेन्टल प्रेशर में आने से इन्कार कर देते हैं। मोदी जी आप कहां हैं?
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार है)


