खंडित हो गई मोदी की छवि, अब सुधार मुश्किल
31 अक्टूबर को मोदी ने गुजरात में आरोप लगाया था कि विदेश जाकर देश-विरोधी ताक़तों के सहारे देश को कमज़ोर करने की साज़िश रची जा रही है।

31 अक्टूबर को मोदी ने गुजरात में आरोप लगाया था कि विदेश जाकर देश-विरोधी ताक़तों के सहारे देश को कमज़ोर करने की साज़िश रची जा रही है। इस पर राहुल गांधी ने मोदी को खुली बहस की चुनौती दी थी। और कहा था कि आप विदेशी मदद से प्रधानमंत्री बने और विदेशी मदद से ही प्रधानमंत्री बने हुए हैं। आपकी आर्थिक व्यवस्था पूरी तरह विदेशियों के नियंत्रण में और समर्थन से है।
नरेन्द्र मोदी अब लाख कोशिश कर लें, लेकिन अब किसी भी तरह वे अपनी उस छवि को खंडित होने से नहीं रोक सकते, जो उनके प्रचार तंत्र ने बड़ी मेहनत से गढ़ी थी। नयी पीढ़ी को हमेशा अपने लिए एक नायक की तलाश रहती है, ऐसा व्यक्ति जो हर तरह से उन्हें प्रेरित करे और उनकी नाराजगी को अभिव्यक्ति दे। 2014 के तत्कालीन लोकतांत्रिक भारत में जब दस सालों की यूपीए सरकार की कुछ बातों और देश के हालात को लेकर तब की नयी पीढ़ी में नाराजगी थी, तब नरेन्द्र मोदी को किसी अवतार की तरह पेश किया गया था कि देश इनके हाथों में सौंपों और बस सारी समस्याओं से मुक्ति पाओ। लोगों ने इस प्रचार पर यकीन कर मोदी को प्रधानमंत्री बनाया। उनके वादे भी कितने लुभावने थे-हर साल दो करोड़ रोजगार, सबके खाते में 15-15 लाख, काला धन वापस लाना, सस्ता तेल, सस्ती गैस उपलब्ध करना, बुलेट ट्रेन चलाना, काशी को क्योटो बनाना। लेकिन समय बीतते न बीतते ये तमाम वादे जुमले साबित हो गए। बल्कि अब तो हाल ऐसा है कि जुमलों और वादों के बीच का अंतर ही खत्म हो गया है। 2014 से 2026 आ गया, समस्याएं खत्म नहीं हुईं, बल्कि नयी समस्याएं खड़ी हो गईं। जैसे वोट का अधिकार खत्म हो गया, जिस राम मंदिर के लिए लोगों ने खून बहाने से परहेज नहीं किया, वहां चढ़ावा चोरी हो गया, युवाओं के सामने पढ़ने और रोजगार पाने के मौके खत्म कर दिए गए। इन सब पर जनता का गुस्सा बढ़ता गया। लेकिन अपनी सत्ता के सुखों में कैद मोदी ने जनता की भावनाओं को देखना जरूरी नहीं समझा। ऐसे में नयी पीढ़ी का मोह भंग मोदी और उनके वादों से हो चुका है।
देश का युवा देख रहा है कि यह सरकार इतनी लाचार है कि विपक्ष के खिलाफ पदयात्रा निकाल रही है और लोकतंत्र बचाने की मांग कर रही है। इस बीच राहुल गांधी ने मोदी की अवतारी छवि को चूर-चूर करने के लिए एक बड़ा प्रहार कर दिया है।
31 अक्टूबर को देश में शायद पहली बार विपक्ष ने मॉक पार्लियामेंट का आयोजन किया। जिसमें ज्ञानेश कुमार पर महाभियोग प्रस्ताव लाया गया। फिर एक नवंबर को इंडिया ब्लॉक की रामलीला मैदान में महारैली हुई, जिसमें जनता का जोश देखकर मोदी सरकार सकते में है। इसके बाद 2 नवंबर को राहुल गांधी ने मोदी को खुली बहस की चुनौती दी और फिर 3 नवंबर को वापस अपनी चुनौती को दोहराया। चार दिन के ये चार हमले मोदी सरकार पर काफी भारी पड़ चुके हैं, यह भाजपा नेताओं की प्रतिक्रियाएं बता रही है।
दरअसल 31 अक्टूबर को मोदी ने गुजरात में आरोप लगाया था कि विदेश जाकर देश-विरोधी ताक़तों के सहारे देश को कमज़ोर करने की साज़िश रची जा रही है। इस पर राहुल गांधी ने मोदी को खुली बहस की चुनौती दी थी। और कहा था कि आप विदेशी मदद से प्रधानमंत्री बने और विदेशी मदद से ही प्रधानमंत्री बने हुए हैं। आपकी आर्थिक व्यवस्था पूरी तरह विदेशियों के नियंत्रण में और समर्थन से है। विदेशी सोशल मीडिया पूरी तरह आपके साथ खड़ा है। मैं आपको इस मुद्दे पर खुली बहस की चुनौती देता हूं। कोई भी मंच, किसी भी समय। हिम्मत है तो आइए। आप नहीं आएंगे, क्योंकि जो मैं आपके बारे में जानता हूं आप उससे डरते हैं।
मोदी ने 3 तारीख तक इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी तो राहुल ने फिर कहा कि 24 घंटे हो गए मोदी जी। मैंने आपको चैलेंज दिया है। आप कहते हो कि विपक्ष देशद्रोही है। किसी भी स्टेज पर आप जगह चुनिए, मेरे साथ डिबेट कीजिए। देशद्रोही कौन है? विदेशी फोर्सेस का कनेक्शन किसका है और किस तरह का कनेक्शन है? जल्दी से जल्दी कीजिए, डरिए मत।Ó उन्होंने कहा, 'दोनों मिलेंगे, मीडिया होगी, देश के युवा होंगे, टेबल होगी। एक तरफ़ आप बैठोगे, एक तरफ़ मैं बैठूंगा। जिसको आप जज बनाना चाहते हो, बना दो. मोहन भागवत जी को बिठा दो, चलो और फिर डिबेट करते हैं।Ó राहुल ने यह भी कहा कि मुझ पर कम से कम 45 मामले मानहानि के लगे हुए हैं। लेकिन इस डिबेट के मामले में, विदेशी कनेक्शन के मामले में आप मानहानि का मुक़दमा नहीं लगा रहे हो। लगाइए ना, वहां भी खुलकर डिस्कस करेंगे। ये सब डिस्कस करते हैं, आइए। हैप्पी दिवाली, मोदी जी।'
मोहन भागवत को जज बनाने और विदेशी कनेक्शन पर बहस की चुनौती देकर राहुल ने भाजपा के सामने दीपावली के पहले ही बड़ा बम फोड़ दिया है। आनन-फानन में तमाम भाजपा नेता मोदी के सामने रक्षापंक्ति बनाकर खड़े हो गए हैं। जैसे शतरंज में राजा को शह और मात से बचाने के लिए कैसलिंग की जाती है, यानी राजा को हाथी की आड़ में कर दिया जाता है, और फिर बाकी मोहरे सामने आते हैं, वही खेल इस समय मोदी के लिए रचा जा रहा है। किरण रिजिजू ने तो राहुल की चुनौती को गंभीर मानने से इंकार कर दिया, यानी बहस का सवाल ही नहीं। निशिकांत दुबे ने कहा पहले मुझसे बहस कीजिए फिर मेरे नेता पर आइए। गृहमंत्री अमित शाह ने कहा, नरेंद्र मोदी की सरकार हर मुद्दे पर चर्चा के लिए तैयार है। संसद चलने दो। हम विशेष सत्र बुलाकर एसआईआर पर चर्चा के लिए तैयार हैं। आप संसद चलने दीजिए और चर्चा में दो-दो हाथ कर लीजिए। देश की जनता को मालूम हो जाएगा कि सही क्या है और झूठ क्या है। हालांकि शाह भी इस बात को अच्छे से जानते हैं कि पूरे मानसून सत्र में राहुल से बचने के लिए मोदी-शाह संसद परिसर में होते हुए भी सदन में नहीं आए। आखिरी दिन वंदेमातरम के लिए खड़े होकर चार मिनट में चले गए। जबकि इस दौरान विपक्ष के सांसदों ने एसआईआर, चुनाव सुधार पर चर्चा का मुद्दा उठाया, मगर मोदी-शाह जवाब देने नहीं आए।
निर्मला सीतारमण, गिरिराज सिंह जैसे तमाम सांसद भी अब राहुल को संसद में बहस के लिए बुला रहे हैं। पता नहीं ये सांसद अपने प्रधानमंत्री से क्यों नहीं कहते कि हमने आपको सदन का नेता चुना है तो जवाब देने के लिए आप खुद आइए, हमें आगे मत करिए। खैर ये लोग तो फिर भी सांसद हैं तो राहुल को संसद आने कह सकते हैं। मगर दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता न जाने किस हक से राहुल से कह रही हैं कि आप संसद आकर बहस कीजिए और फिर उसमें 1975 से लेकर 1984 तक सबका जिक्र कर रही हैं। बिल्कुल मोदी वाला अंदाज है ये कि आप सीधे सवाल का सीधा जवाब देने की जगह बस विपक्ष को कोसते रहें। रेखा गुप्ता को क्या इतना भी नहीं पता कि वे केवल दिल्ली विधानसभा में बोलने का हक रखती हैं, संसद में नहीं।
असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वासरमा तो रेखा गुप्ता से एक कदम आगे निकले। उन्होंने राहुल गांधी को इस बात पर घेरा कि अपनी चुनौती के आखिरी में उन्होंने लाल गुलाब के साथ मोदी को हैप्पी दीवाली क्यों कहा। बिस्वासरमा ने राहुल के ज्ञान में इजाफा किया कि राहुल गांधी गुलाब का फूल तो वैलेंटाइन डे पर दिया जाता है, दिवाली पर नहीं.. खैर आप भारतीय संस्कृति से कहां परिचित हैं। अब कोई हिमंता बिस्वासरमा से पूछे कि वैलेंटाइन डे कब से भारतीय संस्कृति का हिस्सा हो गया। उन्हें यह क्यों पता है कि वैलेंटाइन डे पर कौन से रंग का गुलाब दिया जाता है। गनीमत है कि बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी इस मामले में अब तक बोलने के लिए आगे नहीं किए गए हैं, वर्ना जैसे उन्होंने कहा था कि बिहार में क्राइम हो सकता है, लेकिन अपराध नहीं। वैसे ही वे कहते कि मोदी डिबेट के लिए तो आ सकते हैं बहस के लिए नहीं।
खैर अपने बचाव में जिन मोहरों को मोदी ने आगे किया है, वो सब अपने बयानों से खुद ही बिसात से बाहर निकलने की तैयारी कर चुके हैं। भाजपा जितना ज्यादा राहुल गांधी पर आक्रामक होगी, उतनी तेजी से मोदी की छवि बिखरेगी। क्योंकि सवाल मोदी से हो और जवाब भाजपा नेता दें, यह रवैया देश के नौजवानों को रास नहीं आएगा। नयी पीढ़ी तो अब मां-बाप की टालमटोल पर भी फौरन अपनी असंतुष्टि जाहिर कर देती है। उसे साफ-साफ हां या ना सुनने की आदत है। अगर मोदी राहुल से बहस के लिए आ सकते हैं तो हां कर दें, वर्ना ना कह कर बता दें कि उन्हें डर लगता है।


