छवियों में कैद मोदी विदेश नीति
प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी बनाई विदेश नीति में कैमरे में कैद छवियों को अहम बना दिया है।

हर संगठन अपनी स्थापना को लेकर नेक इरादे ही प्रकट करता है, लेकिन उसका विस्तार या प्रभाव दिखाना होता है, तो फिर उसमें उन देशों को निशाने पर लिया जाता है, जिनसे हित टकराते हैं। यूक्रेन और रूस के बीच पिछले चार सालों से चल रही जंग इसका उदाहरण है। नाटो देश यूक्रेन को अपने प्रभाव में लेना चाहते हैं।
किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में शंघाई सहयोग संगठन की शिखर बैठक में शामिल होने पहुंचे प्रधानमंत्री मोदी के बयानों और व्यवहार को लेकर फिर सुर्खियां बन रही हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी बनाई विदेश नीति में कैमरे में कैद छवियों को अहम बना दिया है। अब तक देश में जितने भी प्रधानमंत्री हुए, सबकी विदेश यात्राओं में इस बात पर ध्यान दिया जाता था कि भारत के हित में कौन से समझौते हुए, वैश्विक मंच पर उसकी स्थिति मजबूत करने के लिए किन देशों के साथ उसके मैत्री संबंध प्रगाढ़ हुए हैं, गुटनिरेपक्षता के सिद्धांत को इन संबंधों में कितनी तरजीह दी जा रही है। लेकिन अब ऐसे सारे सवाल उठते ही नहीं। बेशक व्यापार और रक्षा समझौतों की बात होती है, लेकिन उसके अलावा खबरों में यही दिखाया जाता है कि नरेन्द्र मोदी ने किस देश के राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री से हाथ मिलाया, गले मिले, किसके साथ एक कार में सफर किया, कौन से उपहार दिए या लिए और हां इन सबसे पहले यह बताया जाता है कि कौन से देश ने प्रधानमंत्री मोदी को सर्वोच्च सम्मान दिया। गोया, यह भारत के प्रधानमंत्री की नहीं, नरेन्द्र मोदी की विशेष उपलब्धि हो।
बहरहाल, बिश्केक में भी नरेन्द्र मोदी के अन्य नेताओं के साथ मिलने और बात करने की तस्वीरें, वीडियो आते रहे। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ नरेन्द्र मोदी ने एक कार में सफर किया, उसकी तस्वीरें सामने आईं। फिर एक वीडियो आया जिसमें चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और व्लादिमीर पुतिन साथ आते हैं और सामने से नरेन्द्र मोदी जिनपिंग से हाथ मिलाते हैं और उसी समय दूसरे हाथ से पुतिन का हाथ भी थामते हैं। विश्व की दो महाशक्तियों के साथ एक हाथ मिलाते नरेन्द्र मोदी काफी शक्तिशाली प्रधानमंत्री लग सकते हैं। लेकिन ये शक्ति तब भी नजर आनी चाहिए जब अरुणाचल प्रदेश समेत कई हिस्सों में चीन अपनी घुसपैठ करता है या फिर पाकिस्तान को भारत के खिलाफ मदद करता है। एक समूह चित्र खिंचवाने से पहले का भी वीडियो आया, जिसमें नरेन्द्र मोदी पुतिन से हाथ मिलाते हुए आगे बढ़ते हैं, उन्हें लगता है कि पुतिन उनके साथ खड़े रहेंगे, लेकिन पुतिन उन्हें दूसरी तरफ कर खुद लगभग केंद्र में आ जाते हैं, फिर उनके बगल में आकर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ को खड़ा कर दिया जाता है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री किस तरह पुतिन के बाजू में खड़े किए गए और नरेन्द्र मोदी लगभग किनारे क्यों खड़े किए गए, यह क्रम किस आधार पर तय हुआ, यह विदेश मंत्रालय ही बेहतर बता सकेगा। हालांकि इस समूह चित्र को जब पाकिस्तान प्रधानमंत्री कार्यालय ने सोशल मीडिया पर शेयर किया तो इसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को हटा दिया और लिखा 'प्रधानमंत्री मोहम्मद शहबाज शरीफ 1 सितंबर 2026 को किर्गिस्तान के बिश्केक में एससीओ काउंसिल ऑफ हेड्स ऑफ स्टेट समिट में राष्ट्राध्यक्षों के साथ एक ग्रुप फोटो में।Ó फिर शाहबाज शरीफ ने पूरी निर्लज्जता के साथ अपने एक्स हैंडल पर उसी फोटो को शेयर किया है। वहीं दूसरी ओर प्रधानमंत्री मोदी ने इस तस्वीर को वैसे ही शेयर किया, जैसे वह खींची गई थी। मोदी के हैंडल से शेयर हुई फोटो में शाहबाज शरीफ भी हैं। अच्छा है कि भारत ऐसे ओछेपन से अब तक बचा हुआ है। क्योंकि पाकिस्तान की सरकार लगातार इसी तरह का ओछापन दिखाती रही है और अब मक्का रक्षा समझौते के बाद उसके ऐसे दुस्साहस कुछ और बढ़ सकते हैं, क्योंकि इसमें शुरुआती तीन सालों के लिए जिम्मेदारी पाकिस्तानी के सैन्य प्रमुख जनरल आसिम मुनीर को ही मिली है।
गौरतलब है कि नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गेनाइजेशन (नाटो) की तर्ज पर सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान के बीच 7 अगस्त 2026 को एक त्रिपक्षीय सामूहिक रक्षा समझौता हस्ताक्षरित किया गया है। इस समझौते के तहत यदि किसी एक देश पर बाहरी हमला होता है, तो उसे तीनों देशों पर हमला माना जाएगा (जो नाटो के आर्टिकल-5 की तरह है)। इसे 'इस्लामिक नाटोÓ भी कहा जा रहा है। इस समझौते का दायरा बढ़ाए जाने की संभावना है और संभव है कि निकट भविष्य में बांग्लादेश भी इसका सदस्य बन जाए। तुर्की के विदेश मंत्री हाकान फिदान ने दावा किया है कि मक्का समझौता किसी भी देश के खिलाफ नहीं है। इस समझौते से क्षेत्रीय स्थिरता में वृद्धि होगी और अनिश्चितता में कमी आएगी।
हर संगठन अपनी स्थापना को लेकर नेक इरादे ही प्रकट करता है, लेकिन उसका विस्तार या प्रभाव दिखाना होता है, तो फिर उसमें उन देशों को निशाने पर लिया जाता है, जिनसे हित टकराते हैं। यूक्रेन और रूस के बीच पिछले चार सालों से चल रही जंग इसका उदाहरण है। नाटो देश यूक्रेन को अपने प्रभाव में लेना चाहते हैं। यूक्रेन भी नाटो का सदस्य होना चाहता है, लेकिन रूस इसका विरोध कर रहा है, क्योंकि वह जानता है कि एक बार नाटो का प्रभाव उसकी सीमाओं तक आ गया तो फिर शीतयुद्ध के दौर जैसे हालात बन जाएंगे। यूक्रेन जिस तरह बार-बार अमेरिका समेत तमाम पश्चिमी देशों से सहानुभूति बटोरते हुए युद्ध में टिके रहने के लिए उनसे सामरिक मदद मांग रहा है, यह इस बात का उदाहरण है कि रूस केवल यूक्रेन से नहीं लड़ रहा, पर्दे के पीछे नाटो की शक्ति भी काम कर रही है। इस मिसाल को देखते हुए मक्का समझौते के बाद भारत को विशेष तौर पर सचेत रहने की जरूरत है। क्योंकि ऑपरेशन सिंदूर के वक्त ही हमने देखा है कि कैसे अमेरिका ने भारत और पाकिस्तान के बीच दखलंदाजी की और पाकिस्तान ने इसका स्वागत किया। अब क्षेत्रीय स्थिरता और शांति के नाम पर अगर पाकिस्तान फिर किसी अनावश्यक संघर्ष को बढ़ाएगा तब भारत केवल पाकिस्तान से मुकाबला नहीं करेगा, हो सकता है पीछे से सऊदी अरब और तुर्की भी साथ रहें।
भारत के लिए विदेश नीति की चुनौतियां अब पहले से कहीं अधिक बढ़ चुकी हैं, इसलिए प्रधानमंत्री मोदी से उम्मीद की जाती है कि वे फोटो-वीडियो, हाथ मिलाने-गले मिलने पर ध्यान देने की जगह इन चुनौतियों की जटिलताओं को समझें। अभी बिश्केक में नरेंद्र मोदी ने व्लादिमीर पुतिन से अपील की कि वे यूक्रेन के ख़िलाफ़ रूस के युद्ध को ख़त्म करने की दिशा में कदम बढ़ाएं। मोदी ने एंडलेस वॉर की जगह वॉर के एंड पर जोर दिया। ऐसी लफ्फाजी से बेहतर है कि वे ठोस तथ्यों पर बात करें। यह सही है कि चार सालों से युद्ध चल रहा है, लेकिन उसे मोदी क्यों एंडलेस यानी अंतहीन बता रहे हैं। इसका मतलब वे रूस पर दोषारोपण कर रहे हैं कि वह युद्ध खत्म नहीं कर रहा। इससे पहले भी मोदी पुतिन से कई बार इसी तरह की अपील कर चुके हैं, हालांकि उसका कोई नतीजा नहीं निकला। बल्कि 2024 में जब मोदी यूक्रेन गए और वहां जेलेंस्की से मुलाकात की, तो इसके करीब ढाई महीने बाद राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल को रूस में पुतिन के सामने बैठकर इस मुलाकात पर सफाई पेश करनी पड़ी थी।
भारत वैश्विक शांति का हमेशा से पक्षधर रहा है। प.नेहरू ने गुटनिरपेक्ष और पंचशील का सिद्धांत शांति के मद्देनजर ही दिया था। लेकिन खुद मोदी सरकार ने विदेश नीति में गुटनिरपेक्षता को गौण बना दिया है, यह जाहिर है। इसलिए अगर मोदी पुतिन को युद्ध खत्म करने कह सकते हैं, तो यही रवैया उन्हें इजरायल और अमेरिका के साथ भी अपनाना चाहिए। फिलीस्तीन पर नरेन्द्र मोदी सरकार ने न केवल चुप्पी बरती बल्कि मोदी इजरायल जाकर बेंजामिन नेतन्याहू से मिले, उनसे सम्मान ग्रहण किया, आतंकवाद के खात्मे की बात की, तो यह सब गज़ा में चल रहे नरसंहार को समर्थन जैसा ही है। क्योंकि इजरायल के लिए आतंकवाद का दूसरा नाम हमास है। इसके बाद ईरान पर इजरायल और अमेरिका के हमले में भी मोदी ने प्रतिक्रिया देने में न केवल देर की, बल्कि इस तरह प्रतिक्रिया दी कि कहीं से इजरायल और अमेरिका की हरकत का विरोध नजर नहीं आया। अयातुल्लाह अली खामेनेई की हत्या के बावजूद नरेन्द्र मोदी ने अफसोस जाहिर नहीं किया। तो रूस से अगर मोदी कह रहे हैं कि यूक्रेन के साथ युद्ध को खत्म किया जाए, तो यही बात उन्हें खुल कर इजरायल और अमेरिका को भी कहनी होगी। वैश्विक मंच पर भारत का इकबाल इसी तरह नजर आएगा।


