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मोदी की बंगाल जीत ने खोल दी विपक्षी एकजुटता की नई राह

देश के सामने यह बहुत कठिन घड़ी है। लोकतंत्र के वास्तविक अर्थों में बने रहने का सवाल पैदा हो गया है।

मोदी की बंगाल जीत ने खोल दी विपक्षी एकजुटता की नई राह
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  • शकील अख्तर

देश के सामने यह बहुत कठिन घड़ी है। लोकतंत्र के वास्तविक अर्थों में बने रहने का सवाल पैदा हो गया है। चुनाव किसी भी तरह से जीता जाना है। ऐसे में बड़े संघर्ष मजबूत इरादों की जरूरत है। अगले साल तक कोई चुनाव नहीं है। बहुत समय है। पहले खुद विपक्ष को एकजुट होना होगा और फिर संघर्ष की रूपरेखा ऐसी तैयार करनी होगी जिसमें युवा, मजदूर, किसान, छोटा रोजगार करने वालों की भागीदारी बने।

प्रधानमंत्री मोदी ने वह हासिल कर लिया जो वे चाहते थे। अमेरिका के साथ की गई डील, ट्रंप द्वारा उनके और भारत के खिलाफ की गई अपमानजनक टिप्पणियां और ईरान एवं अमेरिका के बीच मध्यस्थ की भूमिका में उभरकर पाक की मजबूत अन्तरराष्ट्रीय स्थिति से उनके नेतृत्व पर उठे सवाल सब पृष्ठभूमि में चले गए।

केवल बंगाल बंगाल रह गया। बंगाल में वे इसलिए जीत चाहते थे और यह उसी दिन तय हो गया था जब एपस्टीन फाइल से लेकर बाकी जो सारे सवाल ऊपर लिखे हैं, उठना शुरू हो गए थे और मोदी के पास उनका जवाब नहीं था। 'कहें खेत की, सुनें खलिहान की'! मोदी जी यह खूब करते हैं। घर परिवार को बेवकूफ बनाने के लिए हमेशा से गैरजिम्मेदार लोग ऐसा ही करते थे। मोदी जी ने भी अपने और अपने से भी ज्यादा देश के खिलाफ जाने वाली डील और देश के खिलाफ इतनी बड़ी बात कि यह नरककुंड है, का जवाब देने के बदले बंगाल में पहली बार भाजपा की सरकार बनाकर बड़े सवालों को जीत के कालीन के नीचे छुपाने की कोशिश कर दी।

अब यह विपक्ष पर है कि वह कैसे देश के सम्मान, हित के सवाल वापस जनता के ध्यान में लाए। बंगाल चुनाव से पहले मोदी बहुत बड़े संकट में थे। लोकसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव का जवाब देने तक आने का साहस नहीं कर पाए थे। यह इतिहास में पहली बार हुआ है कि प्रधानमंत्री राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव का जवाब न दे पाए। और कारण ऐसा कि जिस पर खुद बीजेपी के लोग यकीन नहीं कर पाए कि प्रधानमंत्री को सदन के अंदर विपक्ष की महिला सदस्यों से खतरा है!

लेकिन बंगाल जीतकर आप देखिए कि कैसी हिम्मत आई कि अपनी पार्टी की सबसे ताकतवर रही महिला नेता का नमस्कार भी स्वीकार नहीं। वह नेता जो दस साल सरकार में सबसे ताकतवर रही हो। एक समय ऐसा भी था कि नंबर दो जैसी हैसियत थी। अब वह बंगाल जीत के बाद कोलकाता के शपथ ग्रहण समारोह में एक बार नहीं दो दो बार हाथ जोड़ रही है मगर अब उसकी तरफ देखना भी गवारा नहीं। आंख में आंसू आ गए।

बाकी सपा के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने अपने राज्य उत्तर प्रदेश पर ही ध्यान केन्द्रित करके यह ट्वीट कर ही दिया है कि नमस्कार का भी जवाब नहीं! महिला नेता ही अपमान झेलने को अकेली नहीं थीं एक मुख्यमंत्री भी थे। लेकिन अब मोदी को इन चीजों की कोई परवाह नहीं। बंगाल जीत कर वे खुद को विश्वविजयी समझने लगे हैं। बंगाल ही वह आखिरी किला था जहां भाजपा ने कभी सरकार का मुंह नहीं देखा था। जम्मू कश्मीर में भी वे उपमुख्यमंत्री पद तक पहुंच गए थे। पंजाब में भी सरकार में रहे। एक केरल जरूर बचा है मगर उसका राष्ट्रीय राजनीति में कोई ऐसा महत्व नहीं है जिस की वजह से वहां न जीतना किसी नकारात्मकता में आता हो। तमिलनाडु में भी भाजपा का दोनों द्रविड़ पार्टियों एआईडीएमके और डीएमके के साथ गठबंधन रहा है। बाकी और छोटी-छोटी बातों की डिटेल का कोई मतलब नहीं है। मुख्य बात यही है कि एक बंगाल ऐसा राज्य था जहां जीतकर मोदी यह बता सकते थे कि उनकी लोकप्रियता अभी भी बरकरार है।

56 इंच की छाती और लाल आंखों के रहने न रहने का कोई मतलब नहीं था। ऐसी तमाम कहानियां और गढ़ी जा सकेंगी। जैसे विश्वगुरू पर सवाल उठने लगे तो अब बंगाल जीत कर विश्वविजयी। उपमाएं बहुत गढ़ी जा सकेंगी। लेकिन जो बीजेपी और संघ में सवाल शुरू हो गया था कि जनता में मोदी की लोकप्रियता खत्म होने लगी है उसका जवाब उन्हें देना था। और बंगाल जीत कर वह उन्होंने दे दिया।

बंगाल किस तरह जीता यह सबको मालूम है और यह भी मालूम है कि बंगाल जीतना ही था। बहुत बड़ा दांव लगा था। पहले चीन को सर्टिफिकेट देना कि कोई घुसा ही नहीं था, फिर ट्रंप के सीज फायर को मानना उसकी डील को, खुद पर देश पर कमेंट करने को, और अंत में अमेरिका और चीन द्वारा मिलकर पाकिस्तान को अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर उठाना इसके बाद खुद का ग्राफ गिरना ही था।

लेकिन मोदी जानते हैं कि सबको बेवकूफ बनाया जा सकता है। भाजपा संघ को केवल जीत दिलाने वाला व्यक्ति चाहिए। सत्ता अब उनसे छोड़ी नहीं जा रही। पार्टी विद डिफरेन्स, राष्ट्र पहले यह सब बातें वे भूल चुके हैं और मोदी इस बात को अच्छी तरह जानते हैं। बंगाल चुनाव उन्होंने मैनेज किया। और देखिए आज कहीं अमेरिका ट्रंप, चीन, पाकिस्तान के सवाल नहीं हैं। किसान मजदूर बेरोजगारी युवा के तो पहले ही खतम हो गए थे।

गैस की प्राब्लम का तो बन ही नहीं पाया। हजारों मजदूर, मिस्त्री, छोटा कारोबार करने वाले शहर छोड़कर वापस गांवों में चले गए कि रोटी बनाने के लिए गैस नहीं मिल रही थी। मगर कोई सवाल नहीं। यह भी नहीं कि गांव में करेंगे क्या? मनरेगा खतम होने के बाद गांव में काम ही नहीं।

अभी राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की रिपोर्ट आई है कि भारत में हर एक घंटे में एक किसान या खेत मजदूर आत्महत्या कर रहा है। यह 2024 के आंकड़े हैं। और इनमें 56 प्रतिशत खेत मजदूर हैं। खेत मजदूरों के पास गांवों में कोई काम नहीं है। उन्हीं के भाई, बेटे शहरों में आकर छोटा मोटा काम कर रहे थे। कुछ पैसे बचाकर घर भी भेज देते थे। मगर इन्हें भी गैस की समस्या की वजह से वापस जाना पड़ा। वहां कहां काम है? मनरेगा जो यूपीए सरकार के समय शुरू ही इस उद्देश्य से की गई था कि गांव वालों को उनके घर में ही रोजगार मिले वह मोदी सरकार ने बंद कर दी। पहले धीरे-धीरे इस योजना में पैसा देना कम किया फिर बंद ही कर दी। इसके बदले जी राम जी योजना शुरु करने की घोषणा तो बड़े जोर शोर से की गई मगर उसमें काम किसी को नहीं मिल रहा है। कुछ समय बाद लोग काम करना नहीं चाहते कह कर इसको उसी तरह बंद कर दिया जाएगा जैसे कई जगह सरकारी भर्तियां यह कह कर बंद कर दीं कि इनके लिए उपयुक्त लोग ही नहीं हैं। या जो आते हैं वे योग्य नहीं हैं।

खासतौर से दलित, पिछड़ों, आदिवासियों के आरक्षित पदों को यह कहकर ही नहीं भरा जा रहा कि नाट फाउंड सुटेबल। अब सवाल यह है कि क्या बंगाल का काला जादू ऐसा है कि सबकी आंखों पर परदा पड़ जाए? इसका जवाब केवल विपक्ष को ही देना होगा। क्योंकि वही ऐसा है जिसे इस जादू की काट करना है या जो कर सकता है। बाकी मीडिया तो पहले ही नशे में झूम रहा था अब और गहरा नशा चढ़ गया है। चुनाव आयोग, न्याय व्यवस्था बाकी संवैधानिक संस्थाएं मोदी के सामने कुछ भी बोलने की अपनी ताकत पहले ही गंवा चुकी है।

बस विपक्ष ही है जो अभी भी लड़ सकता है। वह लड़ भी रहा है। मगर अब उसे एकजुट होकर लड़ना होगा। ममता बनर्जी ने हार के बाद यह स्वीकार किया कि पहला दुश्मन बीजेपी ही है। अगर पहले कर लेतीं तो शायद अभी भी मुख्यमंत्री बनी रहतीं। मगर तब तो वे कांग्रेस को पहला शत्रु मानती थीं। और लेफ्ट को तो दुश्मन से भी आगे मैं उनका नाम भी सुनना पसंद नहीं करती कि श्रेणी में रखती थीं। मगर अब लेफ्ट की तरफ भी दोस्ती का हाथ बढ़ा रही हैं।

देश के सामने यह बहुत कठिन घड़ी है। लोकतंत्र के वास्तविक अर्थों में बने रहने का सवाल पैदा हो गया है। चुनाव किसी भी तरह से जीता जाना है। ऐसे में बड़े संघर्ष मजबूत इरादों की जरूरत है। अगले साल तक कोई चुनाव नहीं है। बहुत समय है। पहले खुद विपक्ष को एकजुट होना होगा और फिर संघर्ष की रूपरेखा ऐसी तैयार करनी होगी जिसमें युवा, मजदूर, किसान, छोटा रोजगार करने वालों की भागीदारी बने। फिर जनता का बड़ा वर्ग साथ आए। करना पड़ेगा। नहीं तो अकेले अकेले सब खत्म हो जाएंगे।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार है)


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